जरूरी नहीं कि कोई अभिनेता पूरी फिल्म में छाया रहे और तभी मशहूर हो। कभी कभी छोटे किरदार भी लोगों के दिलों में अपनी छाप छोड़ जाते हैं। ‘हाशिये के सुपरस्टार’ के जरिये हम आज से एक नई श्रृंखला शुरू कर रहे हैं। इस सीरीज में हम आपको हर हफ्ते उन ‘सितारों’ से मिलवाएंगे, जिन्हें आप चेहरा देखते ही पहचान जाते हैं। लेकिन, जिनके बारे में आप ज्यादा जानते नहीं। ऐसा ही एक किरदार है फिल्म 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' के मकसूद भाई का। सफाईकर्मी का ये किरदार छोटा था लेकिन आज भी फिल्म में उन्हें मुन्नाभाई से मिली जादू की झप्पी करोड़ों लोगों को याद है। मकसूद भाई के इस किरदार को परदे पर जीवंत किया अभिनेता सुरेंद्र राजन ने। सुरेंद्र राजन को हिंदी सिनेमा मकसूद भाई के किरदार से ही जानता है, हालांकि इससे पहले सुरेंद्र राजन को लोग गांधी के किरदार के लिए ही ज्यादा जानते थे।
हाशिये के सुपरस्टार: पूरी दिल्ली में हुई इस अभिनेता की तलाश, मुन्नाभाई एमबीबीएस से पाया करोड़ों दर्शकों का प्यार
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आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर 15 अगस्त को हुए एक कार्यक्रम में सुरेंद्र राजन को गांधी की भूमिका निभाने का मौका मिला। इसके बाद उन्होंने फिल्म 'लेजेंड ऑफ भगत' सिंह में भी गांधी का किरदार निभाया। लेकिन 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' में मकसूद भाई का किरदार निभाने के बाद सुरेंद्र राजन को लोग गांधी के बजाय मकसूद भाई के नाम से जानने लगे। फिल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी फिल्म 'लगे रहो मुन्नाभाई' में सुरेंद्र राजन को गांधी की भूमिका ही देना चाह रहे थे। सुरेंद्र राजन बताते हैं, ‘उन दिनों मैं एक हॉलीवुड फिल्म 'वन नाइट विद द किंग' कर रहा था । उस फिल्म के लिए मैं कमिटमेंट कर चुका था। मैंने कहा कि मैं तो नहीं कर पाऊंगा। इस पर राजकुमार हिरानी का कहना था कि आप मेरी फिल्म के लिए लकी साबित हुए हैं, गांधी का रोल नहीं कर पा रहे हैं, तो एक छोटा सा लाइब्रेरियन का रोल है उसे कर दीजिए, फिर मैंने वो रोल किया।’
नहीं रहा अभिनय का शौक
सुरेंद्र राजन कहते हैं, ‘अब तक जितने भी काम किए उनमें मेरी दिलचस्पी रही है और मजे लेकर काम करता था। जीविका चलाने के लिए कला के क्षेत्र में कुछ न कुछ करता रहा। इसी दौरान मुझे फिल्म 'परिणीति' में कला निर्देशन का मौका मिला। इसी दौरान फिल्म के लोगों क मेरी शक्ल में दिलचस्पी हो गई। उस फिल्म के लिए एक किरदार की जरूरत थी, मेरी शक्ल उनके उस किरदार के लिए फिट बैठ रही थी, इससे पहले वे कई लोगों से मिल चुके थे, लेकिन उस किरदार के हिसाब से उन्हें कोई मिला नहीं, उन्होंने मुझसे पूछा तो मैंने कहा कि न तो मुझे एक्टिंग करनी आती है और ना ही मैंने पहले कभी एक्टिंग की है। उन्होंने कहा कि आप उसकी चिंता छोड़ दीजिए हम करा लेंगे, बहुत प्रेशर दिया तो मैंने डरते डरते उस फिल्म में छोटा सा रोल कर लिया।’
28 साल से कायम दाढ़ी काट दी
सुरेंद्र राजन बताते हैं, ‘फिल्म ‘परिणीति' में काम करने के बाद मैं अपनी दुनिया में व्यस्त हो गया । अरुंधति रॉय ने मेरा काम उस फिल्म में कहीं देखा होगा। वह 'इलेक्ट्रिक मून' फिल्म लिख रही थी, उनको लगा कि मैं वो रोल कर सकता हूं। मुझे बुलाया गया। इस फिल्म के लिए मुझे दाढ़ी कटवानी थी, मैने 28 साल से दाढ़ी नहीं काटी थी। दाढ़ी काटना भी नहीं चाह रहा था। लोगों ने कहा कि दाढ़ी का क्या है, घर की खेती है फिर उग आएगी। बिना दाढ़ी के अपनी शक्ल देखकर मुझे बड़ी घबराहट हुई, मुझे अपनी ही शक्ल अजनबी सी लग रही थी।’
15 दिन के लिए आए और 15 साल रह गए
सुरेंद्र राजन कहते हैं, ‘फिल्म 'इलेक्ट्रिक में बड़ी तारीफ हुई मेरे किरदार की। कई अखबारों और मैगजीन में मेरे फोटो छपे। इसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक वामन केंद्रे ने देखा। बामन जब एनएसडी के स्टूडेंट थे उन दिनों मैं वहां फोटोग्राफी डिपार्टमेंट में था। वह आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर एक शो कर रहे थे। उन्हें सारे कैरेक्टर मिल गए थे, लेकिन गांधी के किरदार के लिए कोई नहीं मिल रहा था। मेरा पता किसी के पास नहीं था क्योंकि मैं हमेशा ही इधर उधर घूमता रहता था, तो उन्होंने दिल्ली में खबर भिजवा दी कि राजन जी कहीं पाए जाए तो उन्हें मुंबई पार्सल कर दिया जाए। जिससे भी दिल्ली में मिलूं तो लोग कहते कि अरे, आप को मुंबई बुलाया गया है गांधी के रोल के लिए। मैं 15 दिन के लिए मुंबई आया और 15 साल मुंबई में रह गया। उसके बाद एक्टिंग में काम मिलता गया और काम करता गया।’