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Hunt For Veerappan Interview: 20 साल बाद कैमरे पर आकर बोली वीरप्पन की पत्नी, मेरे पति को मारनेवालों ने...

Fri, 04 Aug 2023 08:40 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Fri, 04 Aug 2023 08:40 AM IST
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Hunt For Veerappan director Selvamani Selvaraj exclusive interview with Pankaj Shukla muthulakshmi awedacious
मुथुलक्ष्मी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
नेटफ्लिक्स पर शुक्रवार से प्रसारित होने जा रही डॉक्युसीरीज ‘द हंट फॉर वीरप्पन’ को देखना, तमाम ऐसी जानकारियों से रूबरू होना है जो शायद वीरप्पन पर लगातार लिखते रहने वाले भी नहीं जानते होंगे। पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने से पहले जहां जहां वह रहा, वहां के गांव वालों को किन हालात से गुजरना पड़ा, या फिर लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) प्रमुख प्रभाकरण के पास शरण पाने की उसकी उम्मीद और इसी उम्मीद में उसका जंगल से बाहर आना, ये सब इस डॉक्यूमेंट्री को देखते समय सोचने को मजबूर करता है। चार हिस्सों में बनी इस डॉक्यूसीरीज के निर्देशक सेल्वमणि सेल्वराज ने इन्हीं सारे मुद्दों पर ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने ये एक्सक्लूसिव बातचीत की।
Hunt For Veerappan director Selvamani Selvaraj exclusive interview with Pankaj Shukla muthulakshmi awedacious
द हंट फॉर वीरप्पन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वीरप्पन पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने का ख्याल आपको पहली बार कब और क्यों आया?

एक शख्सियत के रूप में वीरप्पन से मैं हमेशा प्रभावित रहा। मुझे उसे लेकर बनी बिल्कुल विपरीत धारणाओं में भी दिलचस्पी रही। सरकार की नजर में वह एक खतरनाक अपराधी था लेकिन जहां वह रहता था वहां के लोग उसे प्यार करते थे। मैं इसी को लेकर भ्रमित रहा। फिर मैंने उसके ऊपर लिखे आलेख पढ़े, खबरें पढ़ी। उसके इंटरव्यू देखे और पढ़े और इस सबका मेरे ऊपर एक अलग असर हुआ। कोई पांच साल पहले मैंने वीरप्पन के बारे में गंभीरता से पढ़ना शुरू किया। एक किताब पढ़ी मैंने एसपीजी के अधिकारी रहे के विजय कुमार की, वीरप्पन: चेजिंग द ब्रिगैंड। इसमें पुलिस के नजरिये से पूरी कहानी है और ये कही इस तरह गई है जो पढ़ने वाले को सम्मोहित करती है।

Hunt For Veerappan director Selvamani Selvaraj exclusive interview with Pankaj Shukla muthulakshmi awedacious
द हंट फॉर वीरप्पन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
औरइसके अलावा..
इसके अलावा मैंने तमिल में लिखी एक किताब पढ़ी जिसे कुछ वकीलों ने लिखा है, ये वीरप्पन के बारे में नहीं बल्कि जंगलों में रहने वाली जनजातियों के बारे में है। इसमें वीरप्पन का उल्लेख सिर्फ दो बार आया है लेकिन बहुत ही होशियारी से। और, इसे पढ़ने के बाद मेरे मन में वीरप्पन को लेकर उत्सुकता और बढ़ गई। जंगल में और वीरप्पन को शरण देने वाले गावों में रहने वाले लोगों के साथ उन दिनों क्या हुआ, मुझे नहीं पता था।

 

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द हंट फॉर वीरप्पन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपका संदर्भ क्या उस तरफ है जहां गांव वालों से पूछताछ के लिए वर्कशॉप’ नाम का एक कथित यंत्रणा गृह बनाने की बात आती है?

ये भी, और सामान्य रूप से कहें तो उन सारे गांवों के बारे में भी। एक वांछित अपराधी था, ये सच है। लेकिन, धीरे धीरे मुझे एहसास हुआ कि ये कहानी सिर्फ उतनी नहीं है जितनी नजर आती रही है। इसकी तमाम परतें और भी हैं। बस, यही जानने की इच्छा ने इस डॉक्युसीरीज ‘हंट फॉर वीरप्पन’ को जन्म दिया। जब मैं इन लोगों से मिल रहा था तो मुझे इस बात का एहसास हुआ कि ये बातें बताई जानी जरूरी हैं।

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द हंट फॉर वीरप्पन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

तो आपको कितने साल लगे इस डॉक्युसीरीज को बनाने में?

दो साल मैंने सिर्फ इसके शोध में बिताए और दो साल लगे मुझे इसकी शूटिंग पूरी करने में। हमने हर शोध को भली भांति परखा, जांचा और तसल्ली होने के बाद ही उस पर काम किया। एक घटना है इसमें एक पुलिस थाने पर हमला करने की। तो इसे लेकर एक पुलिसवाले की सोच अलग होगी जबकि जिन गांव वालों ने ये सब देखा और इसके बाद जो भुगता, उनके लिए ये अलग अनुभव है। इसमें उन लोगों की बातें भी हैं जिनका पूरा जीवन सिर्फ एक अपराधी के उनके आसपास होने से हमेशा के लिए बदल गया। लेकिन, इसके बावजूद हमारा उद्देश्य किसी तरह की धारणा बनाना कभी नहीं रहा। हम अपनी तरफ से कुछ नहीं कह रहे। हम सिर्फ तथ्यों को दर्शकों के सामने परोस रहे हैं और बाकी सब कुछ दर्शकों के विवेक पर छोड़ रहे हैं।
 
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