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ऋतिक रोशन के नाना J Omprakash की फिल्मों के नाम 'ए' अक्षर से ही क्यों थे?
Sun, 11 Aug 2019 03:49 PM IST
anand anand
बीबीसी हिंदी, नई दिल्ली
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Published by: anand anand
Updated Sun, 11 Aug 2019 03:49 PM IST
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J Om Prakash
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फिल्म संगीत के लगभग सभी प्रेमी, फिल्म 'अपनापन' के इस सुपर हिट गीत से परिचित होंगे। निर्माता निर्देशक जे ओमप्रकाश की 'अपनापन' जब 1978 में प्रदर्शित हुई थी तब इस गीत और इस फिल्म ने सफलता-लोकप्रियता के कई नए आयाम बनाकर धूम मचा दी थी। और अब... 'अपनापन' सहित 'आया सावन झूम के','आन मिलो सजना', 'आप की कसम','आशा' और 'आखिर क्यों' जैसी अन्य कई सुपर हिट फिल्मों के फिल्मकार जे ओमप्रकाश इस दुनिया को अलविदा कह सभी को गमगीन कर गए हैं। साथ ही जिंदगी के इन आते जाते रस्तों में अपनी बहुत सी यादें छोड़ गए हैं। यूं जे ओमप्रकाश की सभी फिल्मों के गीत लोकप्रिय होने के साथ-साथ अपने सुंदर शब्दों-बोलों के लिए भी याद किए जाते हैं। लेकिन अपनी फिल्मों के गीतों में जो गीत उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था, वह गीत- 'आदमी मुसाफिर है' ही था। आज बहुत से लोग जब भी जे ओमप्रकाश की बात करते हैं तो उन्हें मशहूर अभिनेता ऋतिक रोशन के नाना के रूप में याद करते हैं।
j om prakash
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आजादी से पहले के अविभाजित भारत के सियालकोट में 24 जनवरी 1927 को जन्मे जे ओमप्रकाश के पिता लाहौर के एक स्कूल में शिक्षक थे। इसलिए जे ओमप्रकाश को भी पढ़ने का शौक बचपन से था। देश आजाद होने के बाद ओमप्रकाश मुंबई आ गए। जहां उन्होंने फिल्म लाइन में कुछ करने की ठानी। लेकिन राह आसान नहीं थी। ओमप्रकाश को एक स्पॉट ब्वॉय के रूप में काम करना पड़ा। अपनी एक व्यक्तिगत बातचीत में जे ओमप्रकाश ने एक बार कहा था, "मैं स्पॉट ब्वॉय रहा या फिल्मों में कुछ और छोटे मोटे काम किए लेकिन मैं हमेशा यह देखता था कि निर्देशक किसी दृश्य को कैसे फिल्मांकित करते हैं। इससे मैं काफी कुछ सीखता रहा।" उधर जे ओमप्रकाश शुरू से अपने सबसे बड़े गुरु के रूप में अपने पिता को ही देखते थे।
पढ़ें: सुनील शेट्टी-अक्षय कुमार ही नहीं, इन 4 सितारों के बीच भी भाइयों से बढ़कर रिश्ता
एक बार उन्होंने कहा था, "मैंने अपने पिता से सीखा था कि आप जिंदगी में क्या कर रहे हैं, उससे ज्यादा जरूरी यह है कि आपको खुद को हमेशा छात्र समझते हुए, हर काम में अपना ज्ञान बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। हमको यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि हमको सब कुछ आता है, बल्कि हर पल कुछ नया सीखने की ललक होनी चाहिए।" फिल्मी दुनिया में करीब 10 साल संघर्ष करके जब जे ओमप्रकाश को फिल्म विधा की समझ आ गयी तब सन 1960 में उन्होंने खुद निर्माता बनकर अपनी फिल्म बनाने का फै़सला किया। फिल्म का नाम रखा गया 'आस का पंछी', जिसे मशहूर लेखक राजेन्द्र सिंह बेदी ने लिखा था।
फिल्म में उस समय के उभरते नायक राजेंद्र कुमार को हीरो लिया और तब तक 'नागिन','देवदास' 'नया दौर' और 'मधुमती' जैसी फिल्मों से सुपर स्टार बन चुकी वैजयंती माला को हीरोइन लिया गया। 'आस का पंछी' का निर्माण तो जे ओमप्रकाश ने किया, लेकिन इसके निर्देशन के लिए उन्होंने पहला मौका मोहन कुमार को दिया। जब एक जनवरी 1961 को यह फिल्म प्रदर्शित हुई तो यह हिट साबित हुई। हालांकि अपनी दूसरी फिल्म 'आई मिलन की बेला' को बनाने और उसे प्रदर्शित करने में उन्हें तीन साल लग गए। हीरो इस बार भी राजेन्द्र कुमार थे लेकिन फिल्म की नायिका थी सायरा बानो और उनके साथ शशि कला भी थीं। उधर फिल्म में धर्मेंद्र भी थे। यहाँ यह भी दिलचस्प है कि धर्मेन्द्र के करियर की यह एक ऐसी फिल्म है जिसमें वह नेगेटिव रोल में थे। जबकि फिल्म का निर्देशन इस बार भी मोहन कुमार को सौंपा गया। यह फिल्म भी सुपर हिट साबित हुई और इसके बाद जे ओमप्रकाश ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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एक बार उन्होंने कहा था, "मैंने अपने पिता से सीखा था कि आप जिंदगी में क्या कर रहे हैं, उससे ज्यादा जरूरी यह है कि आपको खुद को हमेशा छात्र समझते हुए, हर काम में अपना ज्ञान बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। हमको यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि हमको सब कुछ आता है, बल्कि हर पल कुछ नया सीखने की ललक होनी चाहिए।" फिल्मी दुनिया में करीब 10 साल संघर्ष करके जब जे ओमप्रकाश को फिल्म विधा की समझ आ गयी तब सन 1960 में उन्होंने खुद निर्माता बनकर अपनी फिल्म बनाने का फै़सला किया। फिल्म का नाम रखा गया 'आस का पंछी', जिसे मशहूर लेखक राजेन्द्र सिंह बेदी ने लिखा था।
फिल्म में उस समय के उभरते नायक राजेंद्र कुमार को हीरो लिया और तब तक 'नागिन','देवदास' 'नया दौर' और 'मधुमती' जैसी फिल्मों से सुपर स्टार बन चुकी वैजयंती माला को हीरोइन लिया गया। 'आस का पंछी' का निर्माण तो जे ओमप्रकाश ने किया, लेकिन इसके निर्देशन के लिए उन्होंने पहला मौका मोहन कुमार को दिया। जब एक जनवरी 1961 को यह फिल्म प्रदर्शित हुई तो यह हिट साबित हुई। हालांकि अपनी दूसरी फिल्म 'आई मिलन की बेला' को बनाने और उसे प्रदर्शित करने में उन्हें तीन साल लग गए। हीरो इस बार भी राजेन्द्र कुमार थे लेकिन फिल्म की नायिका थी सायरा बानो और उनके साथ शशि कला भी थीं। उधर फिल्म में धर्मेंद्र भी थे। यहाँ यह भी दिलचस्प है कि धर्मेन्द्र के करियर की यह एक ऐसी फिल्म है जिसमें वह नेगेटिव रोल में थे। जबकि फिल्म का निर्देशन इस बार भी मोहन कुमार को सौंपा गया। यह फिल्म भी सुपर हिट साबित हुई और इसके बाद जे ओमप्रकाश ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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फिल्म इंडस्ट्री में जे ओमप्रकाश की पहचान एक अच्छे और सफल फिल्मकार के रूप में तो होती ही है। साथ ही उनके बारे में मेरी जितने भी लोगों से जब भी बात हुई तो सभी ने उन्हें एक अच्छा इंसान बताया। वह रिश्ते बनाने और निभाने के लिए मशहूर थे। मोहन कुमार को भी ओमप्रकाश ने अपनी फिल्म से पहली बार निर्देशक बनने का मौका दिया। इन दोनों की जान पहचान और मित्रता यूं तो सियालकोट के जमाने से थी। लेकिन मुंबई में साथ काम करते करते दोनों बेहद करीबी दोस्त बन गए। यह दोस्ती इतनी घनिष्ठ हुई कि जे ओमप्रकाश की पत्नी पद्मा ने अपनी बहन की शादी मोहन कुमार से करा दी, जिससे ओमप्रकाश और मोहन कुमार साडू बन गए। आगे चलकर मोहन कुमार खुद भी निर्माता बन गए और उन्होंने 'अंजाना', 'आप आए बहार आई', 'अमीर गरीब' और 'अवतार' जैसी कई लोकप्रिय फिल्में दीं।जे ओमप्रकाश की फिल्मों की एक सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह अपनी सभी फिल्मों के नाम 'ए' अक्षर से रखते थे।
असल में अपनी पहली दोनों फिल्में 'आस का पंछी' और 'आई मिलन की बेला' की सफलता के बाद उन्हें लगा कि 'ए' अक्षर उनके लिए लकी है। तबसे उन्होंने 'ए' को पूरी तरह अपना लिया। इसके बाद जे ओमप्रकाश ने जो भी फिल्में बनाईं मसलन 'आए दिन बहार के', 'आया सावन झूम के','आन मिलो सजना', 'आँखों आँखों में', 'आप की कसम', ''आक्रमण', 'अपनापन', 'आशिक हूँ बहारों का', 'आशा', 'आस पास', 'अपना बना लो', 'अर्पण', 'आखिर क्यों', 'आप के साथ' और 'आदमी खिलौना है' आदि सभी 'ए' अक्षर से रहीं। यहाँ तक कि मोहन कुमार ने भी अपने दोस्त जे ओमप्रकाश को फॉलो करते हुए अपनी लगभग सभी फिल्मों को 'ए' अक्षर के नाम से बनाया। मोहन कुमार भी अपनी फिल्मों में कई ऐसे कलाकारों को लेते थे जो ओमप्रकाश की फिल्मों में भी होते थे। इससे कई बार पहली नजर में जे ओमप्रकाश और मोहन कुमार की फिल्मों में भ्रम हो जाता था। उधर एक लकी शब्द का जे ओमप्रकाश का फॉर्मूला उनके दामाद राकेश रोशन ने भी अपनाया।
रोशन भी अपनी लगभग सभी फिल्मों के नाम एक ही अक्षर 'के' से रखते आए हैं। मसलन 'खुदगर्ज', 'कामचोर', 'खून भरी मांग', 'कहो न प्यार है', 'कोई मिल गया', 'कृष' और 'काबिल'। बाद में जे ओमप्रकाश के प्रिय हीरो जीतेंद्र और उनकी बेटी एकता कपूर ने भी लंबे समय तक अपने तमाम सीरियल और कुछ फिल्मों के नाम 'के' अक्षर से ही रखकर सफलता का नया इतिहास रच दिया था। बहरहाल, दो फिल्मों के बाद अपनी तीसरी फिल्म 'आए दिन बहार के' से जे ओमप्रकाश ने अपनी टीम में कुछ बड़े बदलाव किए। एक तो यह कि इस बार उन्होंने राजेन्द्र कुमार के स्थान पर धर्मेंद्र को हीरो और आशा पारिख को हीरोइन लिया। साथ ही फिल्म का निर्देशन रघुनाथ झालानी को दिया। उधर जहां पहले इनकी फिल्मों में संगीतकार शंकर जयकिशन थे वहाँ अब लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आ गए। 'आए दिन बहार के' (1966) भी सुपर हिट साबित हुई तो उन्होंने अपनी अगली फिल्म 'आया सावन झूम के' (1969) में भी धर्मेंद्र, आशा पारिख सहित इसी टीम को दोहराया। इस फिल्म ने तो बॉक्स ऑफिस पर सफलता की बड़ी पताका फहरा दी थी। अपने जमाने की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री आशा पारिख से जब मैंने फोन पर बात करके जे ओमप्रकाश के बारे में पूछा तो आशा पारिख भी भाव विभोर हो गईं।
असल में अपनी पहली दोनों फिल्में 'आस का पंछी' और 'आई मिलन की बेला' की सफलता के बाद उन्हें लगा कि 'ए' अक्षर उनके लिए लकी है। तबसे उन्होंने 'ए' को पूरी तरह अपना लिया। इसके बाद जे ओमप्रकाश ने जो भी फिल्में बनाईं मसलन 'आए दिन बहार के', 'आया सावन झूम के','आन मिलो सजना', 'आँखों आँखों में', 'आप की कसम', ''आक्रमण', 'अपनापन', 'आशिक हूँ बहारों का', 'आशा', 'आस पास', 'अपना बना लो', 'अर्पण', 'आखिर क्यों', 'आप के साथ' और 'आदमी खिलौना है' आदि सभी 'ए' अक्षर से रहीं। यहाँ तक कि मोहन कुमार ने भी अपने दोस्त जे ओमप्रकाश को फॉलो करते हुए अपनी लगभग सभी फिल्मों को 'ए' अक्षर के नाम से बनाया। मोहन कुमार भी अपनी फिल्मों में कई ऐसे कलाकारों को लेते थे जो ओमप्रकाश की फिल्मों में भी होते थे। इससे कई बार पहली नजर में जे ओमप्रकाश और मोहन कुमार की फिल्मों में भ्रम हो जाता था। उधर एक लकी शब्द का जे ओमप्रकाश का फॉर्मूला उनके दामाद राकेश रोशन ने भी अपनाया।
रोशन भी अपनी लगभग सभी फिल्मों के नाम एक ही अक्षर 'के' से रखते आए हैं। मसलन 'खुदगर्ज', 'कामचोर', 'खून भरी मांग', 'कहो न प्यार है', 'कोई मिल गया', 'कृष' और 'काबिल'। बाद में जे ओमप्रकाश के प्रिय हीरो जीतेंद्र और उनकी बेटी एकता कपूर ने भी लंबे समय तक अपने तमाम सीरियल और कुछ फिल्मों के नाम 'के' अक्षर से ही रखकर सफलता का नया इतिहास रच दिया था। बहरहाल, दो फिल्मों के बाद अपनी तीसरी फिल्म 'आए दिन बहार के' से जे ओमप्रकाश ने अपनी टीम में कुछ बड़े बदलाव किए। एक तो यह कि इस बार उन्होंने राजेन्द्र कुमार के स्थान पर धर्मेंद्र को हीरो और आशा पारिख को हीरोइन लिया। साथ ही फिल्म का निर्देशन रघुनाथ झालानी को दिया। उधर जहां पहले इनकी फिल्मों में संगीतकार शंकर जयकिशन थे वहाँ अब लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आ गए। 'आए दिन बहार के' (1966) भी सुपर हिट साबित हुई तो उन्होंने अपनी अगली फिल्म 'आया सावन झूम के' (1969) में भी धर्मेंद्र, आशा पारिख सहित इसी टीम को दोहराया। इस फिल्म ने तो बॉक्स ऑफिस पर सफलता की बड़ी पताका फहरा दी थी। अपने जमाने की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री आशा पारिख से जब मैंने फोन पर बात करके जे ओमप्रकाश के बारे में पूछा तो आशा पारिख भी भाव विभोर हो गईं।
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hrithik roshan
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आशा पारिख ने बताया, " मैंने ओमजी के साथ तीन फिल्म की हैं। संयोग से इन तीनों फिल्मों की शूटिंग आउटडोर थी। इनमें 'आए दिन बहार के' की शूटिंग दार्जिलिंग में, 'आया सावन झूम के' की केरल में और 'आन मिलो सजना' की कश्मीर में हुई थी। मैंने उस दौरान देखा कि वह सभी का इतना ख्याल रखते थे कि किसी को कहीं जरा भी परेशानी न हो।" आशा पारिख यह भी बताती हैं, "उनसे अभी तक बहुत अच्छे संबंध थे। मैं जब 'फिल्म इंडस्ट्री वेलफेयर ट्रस्ट' में ट्रस्टी थी तो वह भी ट्रस्टी थे और उसकी मीटिंग के दौरान हमारी मुलाकात अक्सर हो जाती थी।
लेकिन जब से वह ज्यदा बीमार हुए तब से उनसे नहीं मिल सकी। मैं उनसे मिलने का काफी दिनों से सोच रही थी लेकिन जा नहीं सकी। इस बात का अफसोस हमेशा रहेगा।" जे ओमप्रकाश के साथ अपनी एक और याद साझा करते हुए आशा बताती हैं," 'आन मिलो सजना' की मुंबई की शूटिंग के दौरान मेरे पैर की उंगली में फ्रैकचर हो गया। लेकिन मैं शूटिंग पर चली गयी। शूटिंग टालने से काफी नुकसान हो जाना था। जबकि मेरे पैर में बहुत दर्द था और मैं जूते तक नहीं पहन पा रही थी।" "ओमप्रकाश जी को जब यह पता लगा तो उन्होंने मुझसे कहा शूटिंग की चिंता मत करो। पहले एक्सरे कराओ। वह मुझे अस्पताल ले गए मेरा एक्सरे कराया तो पता लगा फ्रेकचर है, तब मुझे उन्होंने आराम करने की सलाह दी।"
ओमजी ने जब अपनी अगली फिल्म 'आप की कसम' शुरू की तो इसके निर्देशन की बागडोर भी उन्होंने खुद ही संभाल ली। हालांकि तब कुछ लोगों को उनके नर्देशन में सफल होने पर शंका थी। राजेश खन्ना, मुमताज और संजीव कुमार इस फिल्म का बड़ा आकर्षण थे। साथ ही इस बार फिल्म के संगीत के लिए उन्होंने आर डी बर्मन को चुना। सन 1974 में जब 'आप की कसम' प्रदर्शित हुई तो फिल्म ने सफलता के कई पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। इंटरवल से पहले खूब हँसाने, रोमांस दिखाने और जमकर मनोरंजन करने वाली 'आप की कसम' इंटरवल के बाद दर्शकों को कितनी ही बार आँखें नम कर देती है। फिल्म का संगीत तो इतना लोकप्रिय हुआ कि जहां देखो हर किसी की जुबां पर जय जय शिवशंकर, करवटें बदलते रहें सारी रात हम, जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मुकाम और सुनो सुना कहो कहा कुछ हुआ क्या, जैसे गीत हर तरफ गूँजते सुनाई देते थे।
ओमप्रकाश की फिल्मों को ध्यान से देखें तो उनकी पहली फिल्म 'आस का पंछी' से लेकर उनकी अंतिम हिट फिल्म 'आखिर क्यों' तक, सभी फिल्मों का गीत-संगीत काफी लोकप्रिय रहा। असल में ओमजी को कविता और संगीत दोनों की बहुत अच्छी समझ थी। वह दर्शकों की नब्ज अच्छे से पहचानते थे और अपनी फिल्मों के संगीत पर भी वह बड़ा फोकस रखते थे। उनकी फिल्म 'आशा' का शीशा हो या दिल हो आखिर टूट जाता है और 'आन मिलो सजना' का अच्छा तो हम चलते हैं, 'आए दिन बहार के' का मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे, 'आया सावन झूम के' शीर्षक गीत के साथ साथिया नहीं जाना की बात हो या फिर 'आखिर क्यों' के गीत दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है, सभी ने जो लोकप्रियता पाई है वह किसी से छिपी नहीं है। आज भी ये गीत कानों में रस घोल कर मन और मस्तिक तक पहुँचने का दम रखते हैं।
लेकिन जब से वह ज्यदा बीमार हुए तब से उनसे नहीं मिल सकी। मैं उनसे मिलने का काफी दिनों से सोच रही थी लेकिन जा नहीं सकी। इस बात का अफसोस हमेशा रहेगा।" जे ओमप्रकाश के साथ अपनी एक और याद साझा करते हुए आशा बताती हैं," 'आन मिलो सजना' की मुंबई की शूटिंग के दौरान मेरे पैर की उंगली में फ्रैकचर हो गया। लेकिन मैं शूटिंग पर चली गयी। शूटिंग टालने से काफी नुकसान हो जाना था। जबकि मेरे पैर में बहुत दर्द था और मैं जूते तक नहीं पहन पा रही थी।" "ओमप्रकाश जी को जब यह पता लगा तो उन्होंने मुझसे कहा शूटिंग की चिंता मत करो। पहले एक्सरे कराओ। वह मुझे अस्पताल ले गए मेरा एक्सरे कराया तो पता लगा फ्रेकचर है, तब मुझे उन्होंने आराम करने की सलाह दी।"
ओमजी ने जब अपनी अगली फिल्म 'आप की कसम' शुरू की तो इसके निर्देशन की बागडोर भी उन्होंने खुद ही संभाल ली। हालांकि तब कुछ लोगों को उनके नर्देशन में सफल होने पर शंका थी। राजेश खन्ना, मुमताज और संजीव कुमार इस फिल्म का बड़ा आकर्षण थे। साथ ही इस बार फिल्म के संगीत के लिए उन्होंने आर डी बर्मन को चुना। सन 1974 में जब 'आप की कसम' प्रदर्शित हुई तो फिल्म ने सफलता के कई पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। इंटरवल से पहले खूब हँसाने, रोमांस दिखाने और जमकर मनोरंजन करने वाली 'आप की कसम' इंटरवल के बाद दर्शकों को कितनी ही बार आँखें नम कर देती है। फिल्म का संगीत तो इतना लोकप्रिय हुआ कि जहां देखो हर किसी की जुबां पर जय जय शिवशंकर, करवटें बदलते रहें सारी रात हम, जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मुकाम और सुनो सुना कहो कहा कुछ हुआ क्या, जैसे गीत हर तरफ गूँजते सुनाई देते थे।
ओमप्रकाश की फिल्मों को ध्यान से देखें तो उनकी पहली फिल्म 'आस का पंछी' से लेकर उनकी अंतिम हिट फिल्म 'आखिर क्यों' तक, सभी फिल्मों का गीत-संगीत काफी लोकप्रिय रहा। असल में ओमजी को कविता और संगीत दोनों की बहुत अच्छी समझ थी। वह दर्शकों की नब्ज अच्छे से पहचानते थे और अपनी फिल्मों के संगीत पर भी वह बड़ा फोकस रखते थे। उनकी फिल्म 'आशा' का शीशा हो या दिल हो आखिर टूट जाता है और 'आन मिलो सजना' का अच्छा तो हम चलते हैं, 'आए दिन बहार के' का मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे, 'आया सावन झूम के' शीर्षक गीत के साथ साथिया नहीं जाना की बात हो या फिर 'आखिर क्यों' के गीत दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है, सभी ने जो लोकप्रियता पाई है वह किसी से छिपी नहीं है। आज भी ये गीत कानों में रस घोल कर मन और मस्तिक तक पहुँचने का दम रखते हैं।
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जे ओमप्रकाश इस बात को कहते रहे और राजेश खन्ना के निधन पर भी उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि "राजेश खन्ना मुझे सबसे ज्यादा पसंद रहे।" काका के साथ ओमजी ने सबसे पहली फिल्म 1970 में 'आन मिलो सजना'' की थी। हालांकि कुछ कारणों से इस फिल्म को उन्होंने अपने फिल्म युग के बैनर से न बनाकर फिल्म कुंज के बैनर से बनाया था। फिल्म में उनका नाम 'जे ओमप्रकाश प्रेजेंट्स' के रूप में गया था। जबकि 'आप की कसम' राजेश खन्ना के साथ उनके अपने निर्देशन में बनी पहली फिल्म थी। इसके बाद 'आक्रमण' में काका को उन्होंने मेहमान भूमिका में लिया। लेकिन ओमजी काका को इतना पसंद करते थे कि मेहमान भूमिका के बाद उन्होंने 'आक्रमण' में राजेश खन्ना पर दो गीत फिल्मांकित किए थे। यहाँ यह भी बता दें कि ओमप्रकाश अपनी फिल्म 'आशा' और 'अर्पण' में भी राजेश खन्ना को लेना चाहते थे। लेकिन उनकी डेट्स न मिलने के कारण जीतेंद्र को लिया। जीतेंद्र के साथ भी उनकी 'अपनापन' और 'आशा' तो सुपर हिट रहीं।
पढ़ें: इन अभिनेत्रियों के भाई हैं बड़े बिजनेसमैन, परदे के पीछे रहकर चला रहे करोड़ों की कंपनी
'अर्पण' भी हिट थी लेकिन 'अपना बना लो' और 'आदमी खिलौना है' नहीं चल सकीं। जे ओमप्रकाश फिल्में तो सन 2001 तक बनाते रहे। लेकिन सही अर्थों में 1985 में प्रदर्शित उनकी 'आखिर क्यों' की अपार सफलता के बाद उनकी कोई और फिल्म चली नहीं। यहाँ तक उनकी अंतिम फिल्म 'अफसाना दिलवालों' पर तो किसी का ध्यान ही नहीं गया। पिछले एक बरस से जे ओमप्रकाश ज्यादा बीमार थे। जे ओमप्रकाश के रिश्तेदार मोहन कुमार के भांजे और 'इंसाफ का तराजू', 'आप तो ऐसे न थे' और 'निकाह' फिल्मों के अभिनेता दीपक पाराशर ने मुझे अपनी बातचीत में फोन पर बताया, "ओम अंकल पिछले सात आठ महीनों से तो कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे, उनका खाना पीना भी नली के सहारे चल रहा था। हालांकि वह कोमा में तो नहीं थे।
पर अपनी आँखें कभी कभार ही खोलते थे।" इधर बरसों से जे ओमप्रकाश के सबसे करीबी पड़ोसी रहे सुप्रसिद्द फिल्मकार स्वर्गीय रामानन्द सागर के पुत्र प्रेम सागर भी जे ओमप्रकाश के गुणों और उनकी भलमानसता की प्रशंसा करते नहीं थकते। सागर ने बताया, ''मैं बरसों से जे ओमजी को बहुत करीब से देख रहा हूँ। उन्हें फिल्म लाइन के हर क्षेत्र का पूरा ज्ञान था। इतनी सुपर हिट फिल्में देने के बाद भी उनमें कभी अहंकार नहीं आया।" ओमप्रकाश जी की अधिकतर फिल्में पारिवारिक होने के साथ-साथ पति पत्नी के संबंधों पर ज्यादा जोर देती थीं। पति पत्नी के संबंधों को अपनी फिल्मों में दिखाने वाले जे ओमप्रकाश का अपना दाम्पत्य जीवन भी बेहद अच्छा रहा। अपनी पत्नी पद्मा रानी और उनके बीच परस्पर समझ और मधुर संबंध अंत तक बरकरार रहे।
पढ़ें: इन अभिनेत्रियों के भाई हैं बड़े बिजनेसमैन, परदे के पीछे रहकर चला रहे करोड़ों की कंपनी
'अर्पण' भी हिट थी लेकिन 'अपना बना लो' और 'आदमी खिलौना है' नहीं चल सकीं। जे ओमप्रकाश फिल्में तो सन 2001 तक बनाते रहे। लेकिन सही अर्थों में 1985 में प्रदर्शित उनकी 'आखिर क्यों' की अपार सफलता के बाद उनकी कोई और फिल्म चली नहीं। यहाँ तक उनकी अंतिम फिल्म 'अफसाना दिलवालों' पर तो किसी का ध्यान ही नहीं गया। पिछले एक बरस से जे ओमप्रकाश ज्यादा बीमार थे। जे ओमप्रकाश के रिश्तेदार मोहन कुमार के भांजे और 'इंसाफ का तराजू', 'आप तो ऐसे न थे' और 'निकाह' फिल्मों के अभिनेता दीपक पाराशर ने मुझे अपनी बातचीत में फोन पर बताया, "ओम अंकल पिछले सात आठ महीनों से तो कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे, उनका खाना पीना भी नली के सहारे चल रहा था। हालांकि वह कोमा में तो नहीं थे।
पर अपनी आँखें कभी कभार ही खोलते थे।" इधर बरसों से जे ओमप्रकाश के सबसे करीबी पड़ोसी रहे सुप्रसिद्द फिल्मकार स्वर्गीय रामानन्द सागर के पुत्र प्रेम सागर भी जे ओमप्रकाश के गुणों और उनकी भलमानसता की प्रशंसा करते नहीं थकते। सागर ने बताया, ''मैं बरसों से जे ओमजी को बहुत करीब से देख रहा हूँ। उन्हें फिल्म लाइन के हर क्षेत्र का पूरा ज्ञान था। इतनी सुपर हिट फिल्में देने के बाद भी उनमें कभी अहंकार नहीं आया।" ओमप्रकाश जी की अधिकतर फिल्में पारिवारिक होने के साथ-साथ पति पत्नी के संबंधों पर ज्यादा जोर देती थीं। पति पत्नी के संबंधों को अपनी फिल्मों में दिखाने वाले जे ओमप्रकाश का अपना दाम्पत्य जीवन भी बेहद अच्छा रहा। अपनी पत्नी पद्मा रानी और उनके बीच परस्पर समझ और मधुर संबंध अंत तक बरकरार रहे।