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जेब में 27 पैसे लेकर मुंबई निकले थे जावेद अख्तर, गुफाओं में गुजारनी पड़ी थी रातें

एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: अरविंद अरविंद Updated Wed, 16 Jan 2019 03:30 PM IST
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javed akhtar 74th birthday on 17 january
javed akhtar - फोटो : social media

हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार जावेद अख्तर का 17 जनवरी को 74वां जन्मदिन है। उनका जन्म 1945 को ब्रिटिश इंडिया के अधीन ग्वालियर (मध्यप्रदेश) शहर में हुआ था। वह एक गीतकार ही नहीं बल्कि प्रख्यात कवि और स्क्रिप्टराइटर भी हैं। उन्हें साल 1999 में पद्मश्री, 2007 में पद्म भूषण, साहित्य अकादमी अवॉर्ड के साथ-साथ पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरुस्कारों से नवाजा जा चुका है। ऐसे में उनके जन्मदिन पर पढ़ेंगे उनकी किताब 'तरकश' के कुछ अंश जिनमें उनकी कामयाबी से पहले का संघर्ष साफ-साफ नजर आता है।

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javed akhtar 74th birthday on 17 january
Javed Akhtar - फोटो : amar ujala
शहर बंबई……..किरदार, फिल्म इंडस्ट्री, दोस्त, दुश्मन और मैं……….4 अक्टूबर 1964, मैं बम्बई सेंट्रल स्टेशन पर उतरा हूँ। अब इस अदालत में मेरी जिंदगी का फैसला होना है।

बम्बई आने के छह दिन बाद बाप का घर छोडना पडता है। जेब में सत्ताईस नए पैसे हैं। मैं खुश हूँ कि जिंदगी में कभी अट्ठाईस नए पैसे भी जेब में आ गए तो मैं फायदे में रहूँगा और दुनिया घाटे में।

बम्बई में दो बरस होने को आए, न रहने का ठिकाना है न खाने का। यूँ तो एक छोटी सी फिल्म में सौ रूपये महीने पर डॉयलॉग लिख चुका हूँ। कभी कहीं असिस्टेंट हो जाता हूँ, कभी एकाध छोटा-मोटा काम मिल जाता है, अक्सर वो भी नहीं मिलता।

दादर एक प्रोडयूसर के ऑफिस अपने पैसे माँगने आया हूँ, जिसने मुझसे अपनी पिक्चर के कॉमेडी सीन लिखवाए थे।

ये सीन उस मशहूर राइटर के नाम से ही फिल्म में आएंगे जो ये फिल्म लिख रहा है। ऑफिस बंद है। वापस बांदरा जाना है जो काफी दूर है। पैसे बस इतने हैं कि या तो बस का टिकट ले लूँ या कुछ खा लूँ, मगर फिर पैदल वापस जाना पडेगा।
 
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javed akhtar 74th birthday on 17 january
javed akhtar
चने खरीदकर जेब में भरता हूँ और पैदल सफर शुरू करता हूँ। कोहेनूर मिल्स के गेट के सामने से गुजरते हुए सोचता हूँ कि शायद सब बदल जाए लेकिन यह गेट तो रहेगा। एक दिन इसी के सामने से अपनी कार से गुजरूँगा।

एक फिल्म में डॉयलॉग लिखने का काम मिला है। कुछ सीन लिखकर डायरेक्टर के घर जाता हूँ। वो बैठा नाश्ते में अनानास खा रहा है, सीन लेकर पढता है और सारे कागज मेरे मुँह पर फेंक देता है और फिल्म से निकालते हुए मुझे बताता है कि मैं जिंदगी में कभी राइटर नहीं बन सकता ।

तपती धूप में एक सडक पर चलते हुए मैं अपनी आँख के कोने में आया एक आँसू पोछता हूँ और सोचता हूँ कि मैं एक दिन इस डायरेक्टर को दिखाउंगा कि मैं ……..फिर जाने क्यों ख्याल आता है कि क्या ये डायरेक्टर नाश्ते में रोज अनानास खाता होगा।
javed akhtar 74th birthday on 17 january
जावेद अख्तर - फोटो : amar ujala

रात के शायद दो बजे होंगे। बंबई की बरसात, लगता है आसमान से समंदर बरस रहा है। मैं खार स्टेशन के पोर्टिको की सीढियों पर एक कमजोर से बल्ब की कमजोर सी रौशनी में बैठा हूँ। पास ही जमीन पर इस आँधी-तूफान से बेखबर तीन आदमी सो रहे हैं।

दूर कोने में एक भीगा हुआ कुत्ता ठिठुर रहा है। बारिश लगता है अब कभी नहीं रूकेगी। दूर तक खाली अँधेरी सडकों पर मूसलाधार पानी बरस रहा है। खामोश बिल्डिंगों की रौशनियां कब की बुझ चुकी हैं।

लोग अपने अपने घरों में सो रहे होंगे। इसी शहर में मेरे बाप का भी घर है। बंबई कितना बडा शहर है और मैं कितना छोटा हूँ, जैसे कुछ भी नहीं हूँ। आदमी कितनी भी हिम्मत रखे, कभी-कभी बहुत डर लगता है।

मैं अब साल भर से कमाल स्टूडियो ( जो कि अब नटराज स्टूडियो है) में रहता हूँ। कम्पाउंड में कहीं भी सो जाता हूँ। कभी किसी बरामदे में, कभी किसी पेड के नीचे, कभी किसी बेंच पर, कभी किसी कॉरिडोर में।

यहाँ मेरे जैसे और कई बेघर और बेरोजगार इसी तरह रहते हैं। उन्हीं में से एक जगदीश है, जिससे मेरी अच्छी दोस्ती हो जाती है। वो रोज एक नई तरकीब सोचता कि आज खाना कहाँ से और कैसे मिल सकता है, आज दारू कौन और क्यों पिला सकता है। जगदीश ने बुरे हालात में जिंदा रहने को एक आर्ट बना लिया है।
            

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javed akhtar 74th birthday on 17 january
जावेद अख़्तर
मेरी जान पहचान अँधेरी स्टेशन के पास फुटपाथ पर एक सेकंड हैंड किताब बेचने वाले से हो गई है। इसलिए किताबों की कोई कमी नहीं है। रात-रात भर कम्पाउंड में जहाँ भी थोडी रौशनी होती है, वहीं बैठकर पढता रहता हूँ।

दोस्त मजाक करते हैं कि मैं इतनी कम रौशनी में अगर इतना ज्यादा पढता रहा तो कुछ दिनों में अंधा हो जाउंगा.....आजकल एक कमरे में सोने का मौका मिल गया है। स्टूडियो के इस कमरे में चारों तरफ दीवारों से लगी बडी-बडी अलमारियाँ हैं जिनमें फिल्म पाकीजा की दर्जनों कस्ट्यूम रखे हैं।

मीना कुमारी कमाल साहब से अलग हो गई हैं इसलिए इन दिनों फिल्म की शूटिंग बंद है। एक दिन मैं अल्मारी का खाना खोलता हूँ, इसमें फिल्म में इस्तेमाल होनेवाले पुरानी तरह के जूते-चप्पल और सैंडिल भरे हैं और उन्हीं में मीना कुमारी के तीन फिल्मफेयर अवार्ड भी पडे हैं।
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