वक्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे न तुम हम रहे न हम... जब भी कैफी आजमी की कलम चलती उनकी लेखनी लोगों के दिलों को छू जाती। कैफी आजमी एक ऐसे शायर हैं, जिन्होंने न सिर्फ अपनी शायरी से बल्कि फिल्मों में दिए गानों से भी लोगों के दिलों में एक खास जगह बनाई है। कैफी आजमी 20वीं सदी के मशहूर शायर हैं, जिन्होंने हर शय से मोहब्बत की और उसकी तारीफ में कसीदे लिख दिए। 1919 में आज ही के दिन इस मशहूर हस्ती का जन्म हुआ था। तो चलिए इस खास अवसर पर जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें...
Kaifi Azmi: उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे...जब मुशायरे में कैफी आजमी की गजल सुन हसीना ने तोड़ी थी मंगनी
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11 साल की उम्र में लिखी पहली गजल
साल 1919 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में जन्मे कैफी आजमी का असली नाम सैयद अतहर हुसैन रिजवी था। 11 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली गजल लिखी और फिर मुशायरों में शामिल होने लगे। अपनी शायरी से कैफी आजमी हर उम्र के लोगों को भा जाते थे। आजादी के बाद कैफी आजमी के पिता ने पाकिस्तान जाने का फैसला किया, तो वह भारत में ही रह गए। उर्दू शायरी की तरक्कीपसंद धारा की सबसे मजबूत आवाज माने जाने वाले कैफी आजमी एक बहुत ही सशक्त मार्मिक रोमांटिक शायर भी थे। अपने अंदाज के चलते ही वह महफिलों में छा जाते थे। वहीं, उन्होंने देशभक्ति से लेकर प्यार-मोहब्बत तक के गीतों को भी लिखा है।
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हसीना ने क्यों तोड़ दी थी मंगनी?
1947 में हैदराबाद में आयोजित एक मुशायरे ने कैफी आजमी की जिंदगी बदल दी। मुशायरे में कैफी आजमी की नज्म ‘औरत’ ने एक हसीना को अपनी मंगनी तोड़ने के लिए ही मजबूर कर दिया था। अपनी मंगनी तोड़ने वाली वह हसीना कोई और नहीं शौकत आजमी थीं। हैदराबाद में कैफी और शौकत की मुलाकात जल्द ही शादी में भी तब्दील हो गई थी। दोनों के दो बच्चे शबाना आजमी और बाबा आजमी हुए। वहीं, वो नज्म कुछ इस तरह थी...
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे
कद्र अब तक तेरी तारीख ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्क-फिशानी ही नहीं
तू हकीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज जवानी ही नहीं
अपनी तारीख का उन्वान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे ...
पैसों के लिए शुरू किया फिल्मी गीत लिखना
शौकत आजमी से शादी के बाद कैफी आजमी ने उर्दू अखबार के लिए लिखना शुरू कर दिया, जहां उन्हें हर महीने 150 रुपये वेतन मिलता था। जब घर के खर्चे बढ़ने लगे तो उन्होंने फिल्मों में गीत लिखना का इरादा बनाया। शायराना मिजाज वाले कैफी आजमी के फिल्मी गीतों में भी शायराना रंग और साहित्यिक रंग देखने को मिलता, जिसे लोग भी काफी पसंद करते। उन्होंने करीब 250 गीत लिखे हैं, जो काफी लोकप्रिय हुए। फिल्मी गीत लिखने के सफर की शुरुआत उन्होंने शाहिद लतीफ की 'बुजदिल' से की और दो गीत लिखे। इसके बाद उनका सफर चलता गया और वह अपने गानों से लोगों के दिलों तक पहुंचने लगे।
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इन फिल्मों के लिए लिखे गाने
कैफी आजमी के कुछ मशहूर गानों में 1959 की 'कागज के फूल' का गाना 'वक्त ने किया क्या हसीं सितम' और 1958 की 'हकीकत' का 'कर चले हम फिदा जानो तन साथियों' का नाम सबसे पहले आता है। उन्होंने गीतकार के रूप में ‘शोला और शबनम, 'कागज के फूल, ‘सात हिंदुस्तानी', ‘अनुपमा', ‘हिंदुस्तान की कसम', ‘पाकीजा', ‘हीर रांझा', ‘बावर्ची', ‘अर्थ' सहित कई फिल्मों के लिए गाने लिखे हैं। इसके अलावा उन्होंने 'गरम हवा' की कहानी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग भी लिखे थे, जिसके लिए उन्हें फिल्मफेयर मिला था। 'हीर-रांझा' के डायलॉग और श्याम बेनेगल की 'मंथन' की पटकथा भी कैफी आजमी ने लिखी थी। वहीं, मशहूर शायर ने मई 2002 में इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।
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