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KGF 2: मुंबई के इस स्ट्रगलर ने बदल दी कन्नड़ सुपरस्टार की किस्मत, एक एक डायलॉग में भरा बारूद, आरडीएक्स जैसा पंच

Wed, 20 Apr 2022 05:12 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Wed, 20 Apr 2022 05:12 PM IST
सार

 14 साल से आवाज की दुनिया में संघर्ष करते रहे सचिन को मुंबई की झोपड़ियों में खोज निकाला ‘अमर उजाला’ ने।

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KGF Chapter 2: KGF Yash Hindi Dubbing Artist Sachin Gole Exclusive Interview With Amar Ujala in Hindi
सचिन गोले और यश - फोटो : अमर उजाला

फिल्म ‘बाहुबली 2’ में अभिनेता प्रभास के संवादों की हिंदी में डबिंग करने वाले कलाकार शरद केलकर को सब जानते हैं लेकिन हिंदी में रिलीज होकर सिर्फ पांच दिन में 200 करोड़ रुपये की कमाई का धमाका कर देने वाली फिल्म ‘केजीएफ चैप्टर 2’ में इसके हीरो यश के संवाद हिंदी में डब करने वाले कलाकार सचिन गोले का शायद आपने नाम भी न सुना हो। 14 साल से आवाज की दुनिया में संघर्ष करते रहे सचिन को मुंबई की झोपड़ियों में खोज निकाला ‘अमर उजाला’ ने। मुंबई में गोरेगांव पश्चिम मोतीलाल नगर 2 स्थित अपने पुराने दोस्त मनोरंजन दास के एक छोटे से स्टूडियो में मिले सचिन ने ‘अमर उजाला’ के सहायक संपादक पंकज शुक्ल को अपनी पूरी रामकहानी विस्तार से सुनाई। पेश है फिल्म ‘केजीएफ चैप्टर 2’ और उससे पहले ‘केजीएफ चैप्टर 1’ में अभिनेता यश के संवाद हिंदी में डब करने वाले आवाज की दुनिया के बेहतरीन कलाकार सचिन गोले की कहानी, उन्हीं की जुबानी।

KGF Chapter 2: KGF Yash Hindi Dubbing Artist Sachin Gole Exclusive Interview With Amar Ujala in Hindi
सचिन गोले - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

14 साल से चला आ रहा संघर्ष

‘आवाज की दुनिया में शुरुआत मैंने साल 2008 में की। ये उन दिनों की बात है जब मैं पनवेल में रहता था। मैं मुंबई आया था हीरो बनने। माता पिता ने भी मेरा बहुत साथ दिया। पिता जी बोले कि अगर तेरा ये सपना है। तो तू कर। उनके आशीर्वाद से ही मैं यहां तक आ पाया। दुख ये है कि 2010 में ही उनका देहांत हो गया। मुंबई आए तो किराए पर रहते। बसों में धक्के खाते। पैसे थे नहीं। एक्टिंग भी कोई दे नहीं रहा था। मेरे एक दोस्त थे अनिल म्हात्रे। उन्होंने ही मेरा डबिंग की दुनिया से परिचय कराया। उनके साथ मैं नाटक करता था। गणेश दिवेकर नाम के बहुत बड़े डबिंग आर्टिस्ट हैं, उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। महेंद्र भटनागर और सुमंत जामदार जैसे उस्तादों ने मुझे साउंड स्टूडियो में बैठकर इस तकनीक को समझने का मौका दिया। इस दौरान मैंने तमाम बैंकों में भी काम किया। होम लोन वगैरह का काम होता था फील्ड में, लेकिन मैं हाजिरी लगाकर साउंड स्टूडियो आ बैठता था।

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सचिन गोले - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

जब पकड़ी गई चोरी
फिर एक दिन मेरी चोरी पकड़ी गई गए। मेरे सीनियर ने मुझे समझाया कि जो करना है, दिल से करो। आधा इधर, आधा उधर मत करो। तब मैंने तब से ठान लिया कि अभी कुछ भी हो, जीवन के अगले छह से आठ महीने मुम्बई को देने हैं। इसने कुछ बनाया तो ठीक नहीं तो अपने गांव वापस आएंगे। पनवेल जाकर अपना खुद का काम करूंगा। कोई नौकरी कर लेंगे। उसके बाद मैं फिर पूरी तरह से लग गया। स्टूडियो स्टूडियो के चक्कर काटने लगा। खूब ताने सुनने को मिलते। आपका लहजा मराठी है। जुबान साफ नहीं है। धीरे बोलते हो। आपके संवाद कलाकार के होठों के साथ मैच (लिप सिंक) नहीं कर रहे। लेकिन, इस बीच ऐसे भी लोग मिले जिन्होंने मेरा उच्चारण, मेरा बोलने का लहजा दुरुस्त करने में खूब मदद की।

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KGF Chapter 2: KGF Yash Hindi Dubbing Artist Sachin Gole Exclusive Interview With Amar Ujala in Hindi
अमर अजाला के कंसल्टिंग एडिटर पंकज शुक्ल के साथ सचिन गोले - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

क्षिण भारतीय फिल्मों का सहारा

फिर छोटी छोटी डबिंग मुझे मिलने लगी। फिल्मों का काम मुझे जब मिलना शुरू हुआ तो मैं भीड़ में खड़े लोगों की आवाजें निकालता था। फिर मेरी मुलाकात आवाज की दुनिया के कुछ नामचीन लोगों से हुई जैसे, कि मैं अंजू पिंकी का नाम लेना चाहूंगा। डबिंग कोऑर्डिनेटर अल्पना जी का नाम लेना चाहूंगा। फिर करते करते छोटे छोटे ऑडिशन तो मैं देता ही था तो यही आस पास में, तिलक नगर में और अंधेरी में कुछ कुछ ऐसे स्टूडियोज हैं जो साउथ इंडियन फिल्मों की डबिंग करते हैं। उन्होंने सोचा कि क्यों ना थोड़ा सा अपना भी बजट कम है। कुछ कुछ नए नए आर्टिस्ट आ रहे हैं, जिसमें सचिन गोले का भी नाम शामिल है तो चलो उसे हीरो के लिए ट्राई करते हैं। मेरी जुबान भी साफ हो चुकी थी और डबिंग की टेक्नीक मुझे आ गई थी। वहां से गाड़ी चल निकली।

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सचिन गोले - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

धनुष की फिल्म से मिला बड़ा ब्रेक

मेरा पहला बड़ा ब्रेक कहेंगे तो वह था फिल्म ‘मेरी ताकत मेरा फैसला’ के लिए। ये साउथ की फिल्म का हिंदी में नाम था। हीरो थे धनुष। ऑडिशन पास हुआ और पास होने से मेरी एक नई शुरुआत हो गई।  बड़े प्रोडक्शन में ये मेरी पहली फिल्म थी। फिर धीरे धीरे धनुष की जितनी फिल्में आती चली गई तो वो मैं करता चला गया। इससे मेरा नाम हुआ। धनुष की एक फिल्म थी ‘मारी’ जिसका नाम हिंदी में था ‘राउडी हीरो’। इसके अंदर मैंने एक स्टाइल पकड़ी। किरदार एक मवाली का था और उसे मैंने वो हिंदी फिल्मों वाला बंबइया टच दिया। वो स्टाइल लोगों को बहुत अच्छा लगा। खूब फोन आए। यूट्यूब पर भी अच्छे कमेंट आने लगे। इसी बीच इंडस्ट्री भी चेंज होने लगी। वेब सीरीज का जमाना आ गया। कार्टून्स मिलने लगे और जिंदगी चल निकली।

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