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INTERVIEW: मनोज मुंतशिर ने खोले 'बाहुबली' के राज, बोले-हां, मेरी फितरत है मस्ताना
Tue, 01 Jan 2019 03:05 PM IST
विजय जैन
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: विजय जैन
Updated Tue, 01 Jan 2019 03:05 PM IST
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मनोज मुंतशिर
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टेलीविजन से निकले मनोज मुंतशिर हिंदी सिनेमा के गीतकार बने टेलीविजन से निकले मनोज मुंतशिर हिंदी सिनेमा के गीतकार बने, फिर बाहुबली सीरीज से संवाद लेखक और अब वह हिंदी फिल्मों की पटकथाएं भी लिख रहे हैं। उनकी आने वाली बाहुबली सीरीज, नई किताब मेरी फितरत है मस्ताना और साहिर के अलावा किन गीतकारों को वह करते हैं पसंद, बता रहे हैं मनोज मुंतशिर अमर उजाला से इस मुलाकात में।
मनोज मुंतशिर
- फोटो : SELF
इधर आपके गाने कम सुनाई दे रहे हैं आपने जानबूझकर ब्रेक लिया है या कोई और वजह?
साल 2018 में मेरे तमाम गाने चार्ट बस्टर्स रहे। अभी देखते देखते चल रहा है इसके पहले मैनूं इश्क तेरा ले डूबा सुपरहिट हुआ। हां मेरा काम थोड़ा बदला है। अब मैं पूरी की पूरी फिल्में लिख रहा हूं। पहले मैं सिर्फ गाने लिखता था। अब मेरे करियर का एक नया अध्याय शुरू हो रहा है। साल 2019 में आपको मेरे कई नए पहलू देखने को मिलेंगे।
साल 2018 में मेरे तमाम गाने चार्ट बस्टर्स रहे। अभी देखते देखते चल रहा है इसके पहले मैनूं इश्क तेरा ले डूबा सुपरहिट हुआ। हां मेरा काम थोड़ा बदला है। अब मैं पूरी की पूरी फिल्में लिख रहा हूं। पहले मैं सिर्फ गाने लिखता था। अब मेरे करियर का एक नया अध्याय शुरू हो रहा है। साल 2019 में आपको मेरे कई नए पहलू देखने को मिलेंगे।
संवाद: मनोज मुंतशिर
- फोटो : Self
इन दिनों आपकी किताब 'मेरी फितरत है मस्ताना' की भी खूब चर्चाएं हैं। पहला एडीशन बिक चुका है। अमेजॉन पर ये बेस्ट सेलर हो चुकी है इतनी अलग अलग कविताओं की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
मैंने किताब में कहीं लिखा है मैं कब छोड़ूंगा रोना यह अभी सोचा नहीं है दिल की आग तक अभी पानी पहुंचा नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि हिंदी की किताब कोई नहीं पढ़ता या हिंदी के पास पाठक ही नहीं है। हिंदी से पाठक सचमुच दूर हुए हैं पर ज़रूरी नहीं कि हम पीठ मोड़कर खड़े हो जाएं। दोष कभी पढ़ने वालों का नहीं होताए दोष हमेशा लिखने वालों का होता है। मैंने इसी किताब में लिखा है, खयालों की ज़बानए लफ्ज़ों की नस्लें कौन समझेगा, मोहब्बत तुम समझते हो तो गज़लें कौन समझेगा। लोग तैयार हैं पढ़ने के लिएए बशर्ते हम उनके ऊपर अपने ज्ञान का रौब डालने के बजाए उनको समझने की कोशिश करें, उनकी तरह का कंटेंट उन्हें देने की कोशिश करें।
मैंने किताब में कहीं लिखा है मैं कब छोड़ूंगा रोना यह अभी सोचा नहीं है दिल की आग तक अभी पानी पहुंचा नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि हिंदी की किताब कोई नहीं पढ़ता या हिंदी के पास पाठक ही नहीं है। हिंदी से पाठक सचमुच दूर हुए हैं पर ज़रूरी नहीं कि हम पीठ मोड़कर खड़े हो जाएं। दोष कभी पढ़ने वालों का नहीं होताए दोष हमेशा लिखने वालों का होता है। मैंने इसी किताब में लिखा है, खयालों की ज़बानए लफ्ज़ों की नस्लें कौन समझेगा, मोहब्बत तुम समझते हो तो गज़लें कौन समझेगा। लोग तैयार हैं पढ़ने के लिएए बशर्ते हम उनके ऊपर अपने ज्ञान का रौब डालने के बजाए उनको समझने की कोशिश करें, उनकी तरह का कंटेंट उन्हें देने की कोशिश करें।
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मनोज मुंतशिर
तमाम बड़े गीतकार अच्छे गायक भी रहे हैं, जैसे आनंद बक्षी, गुलज़ार और अमिताभ भट्टाचार्य। आपने कभी सोचा गायन के बारे में?
आपने जो तीनों नाम लिए ये शौकिया तौर पर गाते रहे हैं। अमिताभ को छोड़कर बाकी किसी ने गायन को करियर के तौर पर नहीं लिया। लिखना अपने आप में फुल टाइम काम है। मेरे ख्याल से मुमकिन नहीं है कि आप सब कुछ कर लें और जो लोग कर पाए हैं जैसे रवींद्र दादू, रवींद्र जैनद्ध जैसे लोग। उनको देखकर मैं भौचक्का रह सकता हूं पर मैं कभी ना वैसा बन सकता हूं और ना कभी सोच सकता हूं।
आपने जो तीनों नाम लिए ये शौकिया तौर पर गाते रहे हैं। अमिताभ को छोड़कर बाकी किसी ने गायन को करियर के तौर पर नहीं लिया। लिखना अपने आप में फुल टाइम काम है। मेरे ख्याल से मुमकिन नहीं है कि आप सब कुछ कर लें और जो लोग कर पाए हैं जैसे रवींद्र दादू, रवींद्र जैनद्ध जैसे लोग। उनको देखकर मैं भौचक्का रह सकता हूं पर मैं कभी ना वैसा बन सकता हूं और ना कभी सोच सकता हूं।
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मनोज मुंतशिर
- फोटो : Self
हिंदी सिनेमा के गायकों में साहिर आपके पसंदीदा शायर रहे हैं और किसी से भी कभी प्रभावित हुए?
मैं साहिर का दीवाना बना तो गीतकार बना। बाकी सोचूं तो बहुत लंबी लिस्ट है। लेकिन साहिर के अलावा भी अगर आप देखें तो शैलेंद्र। मुझे ताज्जुब होता है। इतनी बड़ी बड़ी बाते एक दम आसान भाषा में कह देना, ये शैलेंद्र और आनंद बक्षी जी के ही बस का काम है। होंगे राजे राज कुंवर हम बिगड़े दिल शहज़ादे हम सिंहासन पर जा बैठे जब जब करें इरादे यह लोकतंत्र की मिसाल आज के गानों में कहां मिलती है।
मैं साहिर का दीवाना बना तो गीतकार बना। बाकी सोचूं तो बहुत लंबी लिस्ट है। लेकिन साहिर के अलावा भी अगर आप देखें तो शैलेंद्र। मुझे ताज्जुब होता है। इतनी बड़ी बड़ी बाते एक दम आसान भाषा में कह देना, ये शैलेंद्र और आनंद बक्षी जी के ही बस का काम है। होंगे राजे राज कुंवर हम बिगड़े दिल शहज़ादे हम सिंहासन पर जा बैठे जब जब करें इरादे यह लोकतंत्र की मिसाल आज के गानों में कहां मिलती है।