छोटे परदे के मशहूर सीरियल 'मेरी आशिकी तुमसे ही' से अपनी अभिनय यात्रा शुरू करने वाली राधिका मदान दिल्ली में पली बढ़ीं। उन्हें बड़े परदे पर पहला मौका विशाल भारद्वाज की फिल्म पटाखा में मिला। लेकिन, असली धमाका राधिका ने निर्देशक वासन बाला की फिल्म 'मर्द को दर्द नहीं होता' में किया है। फिल्म में उनके अभिनय की तारीफ हो रही है।
अभिमन्यु दसानी को लेकर राधिका मदान ने किया खुलासा, कहा- घर जाकर पता चली सच्चाई
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बचपन से ही हीरोइन बनने का सपना पालने वालीं राधिका मदान दबंग टाइप की लड़की रही हैं। आठवीं क्लास से डांस सीखने वाली राधिका मुंबई आने से पहले दूसरों को भी नाचना सिखाती रही है। लेकिन, जिंदगी ने उन्हें असल तरीके से मुंबई में ही नचाया है। राधिका कहती हैं, ‘स्टार किड्स के मुकाबले हमें खूब पापड़ बेलने होते हैं। सदियां लग जाती हैं सिर्फ यह पता करने में कि किसी फिल्म के लिए नए चेहरे की ज़रूरत भी है। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि कास्टिंग एजेंसी जैसी कोई चीज भी होती है। लेकिन, इन स्टार किड्स को सब कुछ तश्तरी में सजाकर मिलता है। फिर कहेंगे कि हमने खूब मेहनत की है। अरे इतना बड़ा प्रोजेक्ट मिलेगा तो मेहनत कौन नहीं करेगा भला?’
राधिका को वासन बाला की फिल्म 'मर्द को दर्द नहीं होता' मिली भी बड़े इत्तेफाक से। राधिका कहती हैं, 'मैं तो लैला मजनू के लिए ऑडीशन देने गई थी वहां इस फिल्म के लिए ऑडीशन चल रहे थे। मुझे कहा गया कि किक मारकर दिखाओ। फिर लैला मजनू का ऑडीशन दिया और उसमें भी सिलेक्ट हो गई। मैं लैला मजनू करना चाहती थी क्योंकि बचपन से ही मुझे मसाला फिल्में पसंद हैं। लेकिन वासन सर से मिलने के बाद मेरा मूड बदल गया।'
नेपोटिज्म के खिलाफ काफी कुछ बोलते रहने वाली राधिका मदान की दूसरी फिल्म में उनके हीरो भाग्यश्री के बेटे अभिमन्यु हैं। राधिका बताती हैं, 'फिल्म साइन करने तक मुझे इस बारे में बिलकुल नहीं पता था, अभिमन्यु तो ऑटो से चलता था। मुझे लगा कि कोई स्ट्रगलर होगा। फिर जब फिल्म की स्क्रिप्ट की सामूहिक रीडिंग की तारीख तय हुई और हम सब एक आलीशान बंगले में इकट्ठे हुए तो मुझे बताया गया कि ये महल जैसा दिखने वाला घर अभिमन्यु का है। पूरी फिल्म में अभिमन्यु ने कहीं भी स्टार किड्स जैसा रवैया नहीं दिखाया।'
थोड़ा और कुरेदने पर वंशवाद का दर्द राधिका की बातों में झलक आ ही जाता है। टेलीविजन से फिल्मों तक के सफर पर बातें करते हुए वह बताती हैं, 'मैंने ना जाने कितनी फिल्मों के लिए ऑडीशन दिए होंगे। लेकिन, रोल हमेशा किसी न किसी स्टार किड को ही मिला। पर मैंने हार नहीं मानी। यहां संघर्ष बहुत है। डेढ़ साल तक मैं भी बेरोजगार रही तो घरवाले वापस आने को कहते रहे। मर्द को दर्द नहीं होता भी तीन साल से तैयार थी, अब जाकर इसकी किस्मत चमकी और ये रिलीज हो पाई है। पटाखा इसके बाद बनी और रिलीज हो गई।'