बॉलीवुड अभिनेता आयुष्मान खुराना ने इस साल टाइम मैगजीन की 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में अपनी जगह बना ली है। इस सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम है। अपने एक्टिंग करियर के शुरुआती दौर से ही वो उन फिल्मों से जुड़े हैं, जो समाज की खोखली धारणाओं को तोड़ती नजर आती हैं। विक्की डोनर, दम लगाके हइशा, बधाई हो, शुभ मंगल सावधान, आर्टिकल 15, अंधाधुन, ड्रीम गर्ल, बाला, गुलाबो सीताबो - ऐसी तमाम फिल्में हैं, जो समाज को आईना दिखाने का काम करती हैं। इन्ही फिल्मों की कामयाबी ने आज आयुष्मान खुराना को एक बड़ा कलाकार बना दिया है, लेकिन उनकी कामयाबी का सफर इतना आसान नहीं था।
अनिल कपूर की इस फिल्म को देखकर आयुष्मान खुराना ने एक्टर बनने का किया था फैसला, फिर यूं मिली सफलता
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अभिनय के अलावा आयुष्मान की गायकी भी लोगों को बेहद पसंद है। चंडीगढ़ के रहने वाले आयुष्मान को अभिनेता बनने की प्रेरणा उनकी दादी से मिली। उनकी दादी घर पर ही अभिनेता राज कपूर और दिलीप कुमार की मिमिक्री करती थीं। आयुष्मान जब 6 साल के थे, तब वो माता-पिता के साथ पहली बार थिएटर गए, वहां उन्होंने अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित की फिल्म 'तेजाब' देखी थी। तभी उन्होंने अभिनेता बनने का निश्चय कर लिया था। इसके बाद आयुष्मान ने अपने अभिनय कौशल को बढ़ाने के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी में थिएटर किया और नुक्कड़ नाटकों में भी हिस्सा भी लिया।
आयुष्मान ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा था, "मुझे मंच पर आकर बात करने का भय रहता था। मुझे मंच से बहुत डर लगता था। मेरे पिता जी को लगता था कि मुझमें गाने और नाचने का टैलेंट है। इसलिए वो मुझे हर जन्मदिन की पार्टी पर गाने और नाचने के लिए कहते थे, जिससे मेरे अंदर विश्वास आए और मंच का जो डर है, वो निकल जाए। उन्होंने मुझसे कई अभ्यास कराए, जिसके चलते मंच पर जाने का जो डर था, वो हट गया।"
एक्टिंग के शुरुआती दौर में आयुष्मान को कई ऑडिशन्स में रिजेक्ट कर दिया गया था, जिसकी वजह थी उनकी मोटी भौंहें और उनका पंजाबी लहजा। शुरुआत में जब कुछ बात नहीं बनी, तो उन्होंने आरजे के तौर पर काम करना शुरू किया। वर्ष 2004 में मशहूर शो एमटीवी रोडीज से उन्हें लाइमलाइट में आने का मौका मिला। वो इस शो के दूसरे सीजन के विजेता बने। इसके बाद उन्होंने वीडियो जॉकी और टीवी होस्ट बन कई कार्यक्रमों में काम किया। फिर साल 2012 किस्मत ने करवट बदली। सुजीत सरकार के निर्देशन में आई उनकी पहली फिल्म विक्की डोनर सुपरहिट रही।
इसके बाद 2013 में आई फिल्में नौटंकी साला ,बेवकूफियां और 2014 में आई 'हवाईजादा' बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाईं। इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा था, "मैं जब नया-नया आया था, तो मैं लोगों की बातों को ज्यादा सुनता था जो मुझसे ज्यादा अनुभवी थे। मुझे लगता था कि इनको ज्यादा पता है, लेकिन पता किसी को नहीं होता है। क्योंकि एक मंझा हुआ निर्देशक भी असफल फिल्म बना सकता है और एक नया निर्देशक भी सफल फिल्म बना सकता है। इस इंडस्ट्री में कोई नियम नहीं है। इस बात को मैंने समझा और तब से खुद की यानी अपने अंदर की आवाज सुननी शुरू की और तभी से मेरी फिल्में भी चलनी शुरू हुई।"