बॉलीवुड की स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपना पहला गीत भले ही मराठी में सदाशिव राव नार्वेकर और हिंदी में दत्ता दावजेकर के निर्देशन में गाया हो पर ख्याति उन्हें संगीतकार खेमचंद प्रकाश की संगीतबद्ध फिल्म जिद्दी (1948) के गीत 'चंदा रे जा रे जारे' से मिली। यही नहीं, आगे चल कर इसी कंपोजर ने मधुबाला और अशोक कुमार की 1949 में आई क्लासिक फिल्म 'महल' का गाना गवाया, जिसके बोल थे, 'आएगाए आएगा आने वाला।' यह गीत इतना मशहूर हुआ कि आज 70 साल बाद भी अगर कहीं बज रहा हो तो सुनने वाले इसे गुनगुनाने को मजबूर हो जाते हैं।
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संगीतकार खेमचंद ने किया था लता मंगेशकर को हिंदी सिनेमा में मशहूर
सुनीता कपूर, अमर उजाला
Updated Thu, 09 Aug 2018 11:12 PM IST
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Musician Khemchand prakash
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लता मंगेशकर
- फोटो : YouTube
लता मंगेशकर भी इस गीत को अपना सर्वश्रेष्ठ गीत मानती हैं। सिर्फ लता को नहीं, खेमपंद प्रकाश ने 'जिद्दी' फिल्म में किशोर कुमार को भी पहला ब्रेक दिया था और किशोर दा ने गीत गाया था, 'जीने की दुआएं क्यूं मांगू।'
Musician Khemchand prakash and Lata Mangeshkar
सिने जगत के महान संगीतकार खेमचंद प्रकाश का जन्म 12 दिसंबर 1907 को राजस्थान के राजपूताना परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित गोवर्धन प्रसार जयपुर महल के दरबारी गायक थे। खेमनंद ने कम उम्र में कथक नृत्य सीखा था। जब वे 19 साल के हुए तब बीकानेर के महाराज ने उन्हें दरबारी गायक नियूक्त कर लिया। उन्होंने नेपाल के सम्राट के यहां भी गायन का काम किया। बाद में वे कलकत्ता रेडियो की संगीत टीम से जुड़ गए।
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Musician Khemchand prakash
1948 में वे बॉम्बे टॉकीज में आ गए। 'जिद्दी' में उन्होंने जलतंरग का व्यापक प्रयोग किया। माना जाता है कि उस दौरान के संगीतकारों ने खेमचंद से यह बात सीखी कि गीत में वाद्यसंत्रों का उपयोग एक सीमा में ही होना चाहिए।
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महल
1935-40 के दशक में खेमचंद सबसे व्यस्त संगीतकार थे। उम्मीद हॉलीडे इन बॉम्बे, परदेसी, प्यास, शादी दुख-सुख, चांदनी, फरियाद, इकरार, खिलौना, मेहमान, चिराग, गौरी, तानसेन, धनवान, भृर्तहरि, मुमताज महल, शहंशाह बाबर, धन्ना भगत, गांव, मेरा गांव, मुलाकता, समाज को बदल डालों, सिंदूर और आशा जैसी मशहूर फिल्मों में संगीत दिया। उनको फिल्मी धुनों की इंडस्ट्री कहा जाता था। कहते हैं कि ज्यादा फिल्में करने के चक्कर में वे संगीत की धुनों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे सके और 1945 में उनका करियर ढलान पर आ गया। नौशाद खेमचंद को अपना गुरु मानते थे। उनके करीबियों को ये अफसोस रहा कि खेमचंद जीते-जी महल के गीतों को मिली अपार सफलता को पूरा आनंद नहीं उठा पाए थे कि 10 अगस्त 1950 को उनका निधन हो गया।