Nikhil Bhat Exclusive: वकालत पढ़ते पढ़ते बना पत्रकार, विनोद कापड़ी बोले, तुम्हारी जगह यहां नहीं फिल्मों में है
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वैसे तो ये नाम भट्ट नहीं बल्कि भट ही है और मैं कुल से कोंकणस्थ ब्राह्मण हूं। परवरिश मेरी बिहार में हुई। सिंधिया राजघराने की मदद के लिए मराठों का जाना तो आपको याद ही होगा। वहां महाराष्ट्र से लड़ने गए तमाम मराठा परिवार फिर वहीं उत्तर भारत में ही बस गए। हमारा परिवार बिहारशरीफ में बसा। दादा मेरे वहां के नामी वकील रहे। पिताजी ने भी वकालत की। एक चाचा हमारे जज बने।
ये भी दिलचस्प कहानी है। कोशिश तो मैंने भी की थी वकील बनने की। हालांकि, उससे पहले घरवालों के दबाव में मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं भी दी। फिर साइंस से मोह टूटा तो कॉमर्स से स्नातक किया। एलएलबी भी दो साल पढ़ा लेकिन उसमें मन नहीं लगा तो मॉस कॉम में दाखिला ले लिया। नोएडा में जी न्यूज की इंटर्नशिप के दौरान तत्कालीन संपादक विनोद कापड़ी ने मुझे फिक्शन की तरफ जाने के लिए प्रेरित किया। हालांकि, उसे बाद मैंने एक दो इंटर्नशिप दिल्ली में और कीं लेकिन जब मैं मुंबई आया और एमटीवी से जुड़ा तो मुझे समझ आया कि मुझे जाना कहां है।
जी नहीं। उन दिनों में मिडडे में काम करता था और वहीं मुझे अंडरवर्ल्ड पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने का मौका मिला। उसमें एक हिस्सा बबलू श्रीवास्तव के ऊपर भी था। हिंदी मेरी अच्छी थी तो मैंने इसकी पटकथा लिखी थी और बात निर्देशन की आई तो मुझसे कहा गया कि लिख लिया है तो बना भी लो। ‘ब्लैक फ्राइडे’ के निर्माता ही मेरे मिडडे में बॉस थे। इस फिल्म से मेरे जुड़ने तक ये फिल्म बन चुकी थी। मैंने और मेरे मित्र देबोलय ने इस फिल्म के ट्रेलर काटे थे और इसकी पैकेजिंग में मदद की थी।
जी यही कह सकते हैं। मैं गाहे बेगाहे उनसे मिलता रहा हूं लेकिन उनके साथ काम कभी नहीं किया। अभी हाल ही में जब हम लोग ‘किल’ के प्रीमियर से लौटे तो उनका फोन आया और उन्होंने ये फिल्म देखने की इच्छा जताई तब उनसे मिला।