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बॉलीवुड में कहां गायब हो गईं गैंगस्टर्स की फिल्में? गजब होते थे सीन, हिट होने का पूरा यकीन

Sun, 08 Sep 2019 07:36 AM IST
Avinash Pal एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: Avinash Pal Updated Sun, 08 Sep 2019 07:36 AM IST
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बॉलीवुड में गुम होता गैंगस्टर फिल्मों का क्रेज - फोटो : सोशल मीडिया

फोन की घंटी बजती है और सामने से आवाज आती है- अन्ना...। यहां से जवाब जाता है- 'किसका आदमी है ? ठीक है मेरे आने तक उसे जिंदा रखना...' ये लाइन पढ़ने के बाद आपके भी जेहन में जरूर किसी ने किसी गैंगस्टर का ख्याल आया होगा। या मैं कहूं एक असली गैंगस्टर का ख्याल। एक दौर था जब फिल्में गैंगस्टर्स के इर्द गिर्द घूमा करती थीं, उसमें आपको ड्रामा और सस्पेंस तो मिलता ही था लेकिन साथ ही मिलता था ओरिजनल एक्शन, जिसे आप महसूस कर सकें। हॉलीवुड में गैंगस्टा फिल्मों का ट्रेंड काफी पुराना है लेकिन भारत में ऐसी फिल्मों का ट्रेंड करीबन साल 1950 से शुरू हुआ था। उसके पहले फिल्मों में गैंगस्टर होता था लेकिन फिल्म गैंगस्टर की नहीं होती थी।

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किस्मत और संग्राम - फोटो : सोशल मीडिया

1989 में रिलीज हुई फिल्म परिंदा और 1998 में रिलीज हुई फिल्म सत्या को कल्ट क्लासिक गैंगस्टा फिल्म कहा जा सकता है। लेकिन ये भी कहना गलत नहीं होगा कि इन दो फिल्मों के बाद दर्शकों को कुछ ऐसा क्लासी देखने को नहीं मिला। हालांकि अनुराग कश्यप ने फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर से काबिल ए तारीफ कोशिश की लेकिन शायद एक गैंगस्टा फिल्म बनाने से थोड़ा चूक गए। वहीं वेब सीरीज में सेक्रेड गेम्स और मिर्जापुर ने दर्शकों को वहीं खून चखाया है, जिसका नशा चढ़ जाए तो उतरना थोड़ा मुश्किल होता है। लेकिन ये सुपरहिट वेब सीरीज एक बड़ा सवाल अपने साथ में लाती हैं कि क्या बड़े पर्दे पर गैंगस्टर्स की मौत हो चुकी है ?

आखिर कैसे हुई गैंग्स की शुरुआत
साल 1947 के आस पास से ही पूरे देश से ही धीरे-धीरे लोगों ने मुंबई की ओर रुख करना शुरू कर दिया था। छोटे शहर में बढ़ती बेरोजगार आबादी ने क्राइम की शुरुआत की। शुरुआत में ये क्राइम छोटे रूप में था, जैसे छोटी-मोटी चोरी करना, पॉकेट मारना या फिर डकैती डालना। 1940-50's में बनी फिल्में भी इस बात की गवाही देती हैं। उन फिल्मों की लिस्ट में किस्मत (1943), संग्राम (1950), पॉकेट मार (1956), हाउस नंबर 44 (1955), आवारा (1951), श्री 420(1955) और बाजी (1951) शामिल हैं। इन सभी फिल्मों में करीबन एक ही चीज दिखाई गई है। लेकिन वक्त करवट लेता है शुरु होता है अवैध शराब का धंधा, वो भी अंटियों द्वारा। इस सीन को सेक्रेड गेम्स की कांता बाई की स्टोरी से भी समझा जा सकता है। जब अलग अलग अपने इलाके और राज्य के हिसाब से छोटे छोटे गैंग बनने लगे, जैसे अलाहबादी गैंग, रामपुरी गैंग या फिर कनपुरिया गैंग।

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काला बाजार और टैक्सी ड्राइवर - फोटो : सोशल मीडिया

हॉलीवुड कर चुका था पहले ही शुरुआत
साल 1920-30 के दशक में ही हॉलीवुड ने गैंगस्टर फिल्मों पर काम करना शुरू कर दिया था। यहां तक की उस वक्त ही उनकी फिल्मों में क्राइम कैसे आयोजित होता है, इस बात की झलक भी दिखने लगी थी। एक ही तरह का सूट, महंगी गाड़ियां और बंदूके.. ये हॉलीवुड गैंगस्टर फिल्मों का पैटर्न बन गया था। लेकिन बॉलीवुड ने परिंदा, सत्या और काला जैसी फिल्मों में गैंगस्टर्स को अपने ही अंदाज में दिखाया।

नवकेतन फिल्म स्टाइल
साल 1950 के करीब चेतन आनंद और उनके भाई देव आनंद ने नवकेतन प्रोडक्शन हाउस की शुरुआत की थी। इस प्रोडक्शन हाउस के बैनर तले ही बनी गुरु दत्त की फिल्म बाजी (1951)। इस फिल्म में रोमांस और कॉमेडी के साथ था थ्रिल। इसके बाद इस थीम पर टैक्सी ड्राइवर (1954), हाउस नंबर 44 (1960), काला बाजार (1960), आर पार (1954) और  सीआईडी (1956) जैसी कई फिल्में रिलीज हुईं। हालांकि दूसरे प्रोडक्शन हाउस ने देखा कि नवकेतन की फिल्मों में कोई हार्ड कोर हीरो इमेज नहीं होता है जिसके बाद पोस्ट बॉक्स 999 (1958), ब्लैक कैट (1959), हावड़ा ब्रिज (1958), उस्तादों के उस्ताद (1963) और शम्मी कपूर की चायना टाउन (1962) रिलीज हुईं। इन फिल्मों में तेज तर्रार कार और ताबड़तोड़ शूटिंग से हॉलीवुड गैंगस्टर्स फिल्मों की कुछ झलक दिखाई दी। 1960 के दशक के आसपास हॉलीवुड फिल्मों का ट्रेंड भी बदल गया था और गैंगस्टर्स का स्टाइल भी हीरो की तरह दिखने लगा था जो हकीकत में तो गैंगस्टर्स होते हैं लेकिन समाज के सामने एक इज्जतदार शख्स। ऐसा ही कुछ उस वक्त  जॉनी मेरा नाम और तीसरी मंजिल जैसी बॉलीवुड फिल्मों में देखने को मिला। 

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कंपनी और सत्या - फोटो : सोशल मीडिया

डॉन का हुआ आगाज
1970 के दशक के करीब से बॉलीवुड में बड़ा बदलाव देखने को मिला। फिल्में असल जिंदगी के गैंगस्टर्स पर बनाई जाने लगीं। जंजीर (1973) में चाहें प्राण का शेर खान का किरदार हो या फिर दीवार (1975) में अमिताभ का विजय का किरदार शेर खान का किरदार करीम खान की तरह था तो वहीं विजय का किरदार हाजी मस्तान की तरह। वहीं कमल हासन ने भी फिल्म नायकन (1987) में वेलू नायकर की तरह का किरदार निभाया था। जैसे बॉलीवुड को गैंगस्टर्स भी दिलचस्पी हो रही थी वैसे ही गैंगस्टर्स को भी बॉलीवुड का जुनून चढ़ रहा था। कई गैंगस्टर्स के फोटोज बड़े बड़े सुपरस्टार्स के साथ देखने को मिले। वहीं ऐसा भी सुनने को मिला की गैंगस्टर्स ने फिल्मों को प्रोड्यूस करना भी शुरू कर दिया। चूंकि सीधे तौर पर फिल्म का निर्माण नहीं कर सकते थे तो रातों रात ऐसे प्रोड्यूसर्स सामने आए जिनका पहले किसी ने नाम भी नहीं सुना था। लेकिन उनके पास पैसा तगड़ा था। धीरे धीरे वक्त आगे बढ़ा और बॉलीवुड को सुभाष घई, जेपी दत्ता और राहुल रवैल जैसे निर्देशक मिले। जिन्होंने फिल्मों को एक कदम आगे ले जाने का काम किया। गैंगस्टर्स के पुराने तौर तरीकों को बदलते हुए  विधाता (1982) में दिलीप कुमार, अंगार (1992) में कादर खान और शिवा (1990) में रघुवरन ने एक अलग छाप छोड़ी। 

मॉर्डन हिंदी गैंगस्टर्स की हुई शुरुआत
1990 के दशक के आसपास से हुई मॉर्डन हिंदी गैंगस्टर्स की शुरुआत। संजय दत्त की फिल्म हथियार और विधु विनोद चोपड़ा की परिंदा ने मुंबई के अंडरवर्ल्ड को जनता के सामने लाने का काम किया। इसके साथ ही फिल्मों में दिखाया गया कि अंडरवर्ल्ड काम कैसे करता है। हालांकि दोनों फिल्में एक जैसी होकर भी काफी अलग थीं। परिंदा में जहां अन्ना (नाना पाटेकर), किशन (जैकी श्रॉफ) और करण (अनिल कपूर) को हाई क्लास दिखाया गया था तो वहीं हथियार में अवि (संजय दत्त) के पास जरूरत की चीजें भी नहीं होती थीं। परिंदा में करण जहां अन्ना को दोस्ती के खातिर मारना चाहता है तो वहीं हथियार में अवि खाने के चलते पहला खून करता है। इन फिल्मों के अलावा राम गोपाल वर्मा ने स्ट्रीट गैंग फाइट्स पर शिवा, द्रोही और रंगीला जैसी फिल्में बनाईं। इन फिल्मों के अलावा फिल्म सत्या ने अंडरवर्ल्ड को बखूबी दिखाया। फिल्म में अंडरवर्ल्ड कैसे काम करता है से लेकर कैसे शराब पार्टी करता है, सब मौजूद था। फिल्म में अंडरवर्ल्ड की भाषा पर भी अच्छी तरह से काम किया गया जिसमें बंदूक के लिए घोड़ा, पेजर के लिए चिड़िया और मोबाइल के लिए कौआ जैसे शब्दों का इस्तेमाल था। बताया जाता है कि फिल्म की रिलीज के कुछ वक्त बाद एक शख्स मनोज बाजपेयी से मिला था और कहा था- 'क्या काम किया, फाड़ डाला।' वो मनोज से किसी 'भाई' की तरह बात कर रहे थे और भाई मतलब अंडरवर्ल्ड वाला भाई। बता दें कि उस वक्त 2.5 करोड़ के बजट वाली इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 18.59 करोड़ रुपये की कमाई की थी। सत्या के बाद 1999 में वास्तव और 2002 में कंपनी जैसी फिल्में सामने आईं। जिन्होंने गैंगस्टर को बड़े पर्दे पर बड़ा दिखाया।

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मुन्ना भाई एमबीबीएस और शूटआउट एट लोखंडवाला - फोटो : सोशल मीडिया

जब बुलंदी पर थीं गैंगस्टर फिल्में
साल 2002-2005 के आसपास तक गैंगस्टर फिल्में बुलंदी पर थीं लेकिन इसके बाद नए निर्देशकों ने इसमें अलग अलग एंगल ढूढ़ना शुरू कर दिए। गैंगस्टर फिल्मों में पुलिसवाले पर ध्यान दिया जाने लगा, जिसमें अब तक छप्पन (2004) और  कांटे (2002) जैसी फिल्में शामिल हैं। वहीं गैंगस्टर्स को ही कुछ अलग ढंग से दिखाते हुए ब्लैक फ्राइडे (2004), मुन्ना भाई एमबीबीएस (2003), वैसा भी होता है (2003) और मकबूल (2003) जैसी फिल्में सामने आईं। वहीं 2005 में रिलीज हुई अमिताभ बच्चन स्टारर सरकार, जिसे हॉलीवुड फिल्म द गॉडफादर से प्रेरित बताया गया। जिसमें शिवसेना के तत्कालीन मुखिया बाल ठाकरे की जिंदगी को दर्शाया गया। 2007 में विवेक ओबेरॉय की शूटआउट एट लोखंडवाला रिलीज हुई, जिसमें गैंग्स की आपसी रंजिश को दिखाया गया। निर्देशकों की क्रिएटिवी यहीं पर खत्म नहीं हुई और उन्होंने सिर्फ मुंबई के अलावा देश के बाकी हिस्सों से भी क्राइम ढूंढ़ना शुरू कर दिया। जिसके एवज में 2006 में विशाल भारद्वाज की उत्तर प्रदेश से 'ओमकारा' रिलीज हुई। तो वहीं 2010 में चंबल से पान सिंह तोमर भी बड़ी स्क्रीन पर पहुंचे। इसके साथ ही 2011 में तिग्मांशु धूलिया शागिर्द और साहेब बीवी और गैंगस्टर लेकर आए। इन सभी फिल्मों के बीच झारखंड की कहानी 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के माध्यम से लेकर आए अनुराग कश्यप।फिल्म को लोगों का जबदस्त प्यार मिला। जिसके बाद कश्यप ने फिल्म बॉम्बे वेलवट बनाने का फैसला किया। 120 करोड़ के बजट की फिल्म का सेट श्रीलंका में बनाया गया। जहां पर 1950's का मुंबई दिखाया गया। फिल्म में रणबीर कपूर से लेकर करण जौहर तक नजर आए। लेकिन इतने बड़े बजट की फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धड़ाम हो गई और सिर्फ 43 करोड़ रुपये ही कमा पाई। इसके बाद प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स के दिल में एक डर सा बैठ गया और इसके साथ ही शूट आउट और फिरौती जैसी घटनाएं भी एक दम कम सी होती गईं। जिसके बाद कुछ नया बनाने की जगह डायरेक्टर्स ने पुराने को ही पॉलिश करने की कोशिश की और अग्निपथ (2012), वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा (2013), शूटआउट एट वडाला (2013) , सत्या 2 (2013) और अब तक छप्पन 2 (2015) जैसी फिल्में सामने आईं।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर चढ़ता गैंगस्टर्स का खुमार
हाल के सिनेमा की बात करें तो रोमांस, एक्शन और बायोपिक के दौर में गैंगस्टर्स कहीं गुम से होते नजर आते हैं। लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म्स  पर इसका असर देखने को मिलने लगा है। जब से वेब सीरीज ने भारत में बूम पकड़ा है तबसे कई ऐसी सीरीज सामने आई हैं जो गैंगस्टर्स पर आधारित रही हैं और हिट साबित हुई हैं। अमेजन से लेकर नेटफ्लिक्स और जी5 कोई भी इसमें पीछे नहीं है। इस लिस्ट में सेक्रेड गेम्स, मिर्जापुर, अपहरण और रंगबाज जैसी वेब सीरीज शामिल हैं।


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