मुंबई का अंधेरी पश्चिम इलाका सिनेमा, वेब सीरीज और टेलीविजन में काम करने के इच्छुक कलाकारों और तकनीशियनों के संघर्ष का साथी है। इसी इलाके में इतनी कहानियां हैं कि इन पर फिल्में या वेब सीरीज बननी शुरू हों तो न किसी दूसरी भारतीय भाषा की फिल्म के हिंदी रीमेक की जरूरत पड़ेगी और न ही किसी विदेशी फिल्म से प्रेरित होने की। छत्तीसगढ़ से आए सोनू कुमार बंजारे के पास भी ऐसी ही एक कहानी है। उस दौर की कहानी जब पेड़ों की सुरक्षा के लिए लिपटे बिश्नोई समाज के तीन सौ से ज्यादा लोगों को पेड़ों समेत जिंदा कटवा दिया गया। इस कहानी में अब तक सोनू सूद से लेकर साजिद नाडियाडवाला तक दिलचस्पी दिखा चुके हैं लेकिन इस पर फिल्म बनाने को अब तक कोई राजी नहीं हुआ है।
Mumbai Diaries: बिश्नोई समाज के बलिदान की कहानी लिए भटकता छत्तीसगढ़ का लेखक, मिली हवालात में बंद करने की धमकी
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निवेशक की तलाश
जी स्टूडियोज, बालाजी टेलीफिल्म्स और यशराज फिल्म्स जैसे बड़े हिंदी फिल्म स्टूडियोज जिस गली में स्थित हैं, उसी गली में सोनू कुमार बंजारे मिले हाथ में एक प्लेकार्ड लेकर धूप में खड़े हुए। प्लेकार्ड पर उनकी विनती लिखी है, ‘जरूरत है निर्माता या निवेशक की, सत्य घटना से प्रेरित नया विचार चिपको मूवमेंट, द ट्री मैन, फीचर फिल्म स्क्रिप्ट।’ नीचे उनका नाम और फोन नंबर लिखा है। डिज्नी की नई फिल्म ‘द लिटिल मरमेड’ देखकर निकलते समय अचानक ही नजर इस प्लेकार्ड पर गई तो सोनू से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ।
घर चलाने को बने सफाईकर्मी
सोनू बंजारे बताते हैं, ‘बचपन से मेरा झुकाव फिल्मों की तरफ रहा। माता पिता मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे लेकिन उनको किसी तरह समझा बुझाकर मैं मध्य प्रदेश आया और वहां के एक एक्टिंग स्कूल में दाखिला लिया। इस दौरान कविताएं भी लिखता रहा और एक पुस्तक भी प्रकाशित हो गई तो मुझे लगा लेखन मेरा पेशा बन सकता है। कोरोना संक्रमण काल के ठीक पहले मुंबई आया। लेकिन लॉकडाउन के दौरान जब कमाने का कोई जरिया नहीं बना तो कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में सफाई कर्मचारी की नौकरी करके गुजारा किया।’
बिश्नोई समाज के बलिदान की कहानी
लेकिन, सोनू ने फिल्म लिखने का अपना सपना नहीं छोड़ा। वह बताते हैं, ‘मेरे पास तीन कहानियां तैयार हैं लेकिन 1730 में राजस्थान में हुई एक घटना पर लिखी मेरी फिल्म ‘द ट्री मैन’ मेरे दिल के सबसे करीब है। यही देश का पहला ‘चिपको आंदोलन’ है। इसमें वहां के राजा ने 363 लोगों को पेड़ों को बचाते समय जिंदा ही पेड़ों के साथ कटवा दिया था। मेरे हिसाब से पेड़ लगाना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी होनी चाहिए लेकिन हमें साफ ऑक्सीजन तो चाहिए पर पेड़ कोई नही लगाना चाहता। मेरी ये फिल्म इसी पर आधारित है।’ अपनी इस कहानी के लिए फिल्म निर्माता की तलाश में वह बीते छह महीने से भटक रहे हैं और इस दौरान उनको तरह तरह के अनुभव भी फिल्म जगत के बारे में हुए।
सोनू सूद से हुई पहली मुलाकात
सोनू बंजारे बताते हैं, ‘सबसे पहले मैं सोनू सूद के घर के सामने खड़ा हुआ। उनकी टीम ने मुझे बुलाकर बात की और मेरी कहानी की तारीफ भी की लेकिन फिर उन्होंने बात को टाल दिया। नील नितिन मुकेश और प्रकाश झा के दफ्तर भी मैं गया। अक्षय कुमार के घर के बाहर मैं 21 दिन खड़ा रहा। इस बीच मुझे साजिद नाडियाडवाला मिले और उन्होंने मुझे अपने दफ्तर भी बुलाया लेकिन उनकी टीम ने मुझसे ‘पठान’ जैसी कोई स्क्रिप्ट मांगी। रोहित शेट्टी और सलमान खान के घर के बाहर भी मैं दिन-दिन रात-रात भर खड़ा रहा हूं।’