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गीता दत्त और वहीदा रहमान को गुरुदत्त के शव के सामने ही लगाई थी डांट, ऐसे थे ओपी नैयर

Wed, 16 Jan 2019 07:25 AM IST
विजय जैन बीबीसी
बीबीसी Published by: विजय जैन Updated Wed, 16 Jan 2019 07:25 AM IST
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op nayyar's birthday
OP Nayyar - फोटो : social media

73 फ़िल्मों में संगीत देने वाले ओमकार प्रसाद मदनगोपाल नैयर को हिंदी फ़िल्मों का मोहम्मद अली कहा जाता था. फ़िल्म संगीत के रसिया उनकी हर धुन में एक ख़ास किस्म का पंच देने की अदा पर मर मिटते थे। कहीं उनको 'रिदम किंग' कहा जाता था तो कहीं 'ताल का बादशाह.' ओपी नैयर को छोड़ कर किसी भी भारतीय संगीतकार ने लता मंगेश्कर की आवाज़ का इस्तेमाल किए बगैर इतना सुरीला संगीत नहीं दिया है.

op nayyar's birthday
bollywood - फोटो : self

गुरुदत्त की फ़िल्मों से मिली पहचान

1926 में लाहौर में जन्मे ओ पी नैयर ने 1952 में आसमान फ़िल्म से अपना करियर शुरू किया था. लेकिन उनको राष्ट्रीय पहचान मिली थी गुरुदत्त की फ़िल्मों आरपार, मिस्टर एंड मिसेज़ 55, सीआई डी और तुम सा नहीं देखा से.

ओ पी नैयर को नज़दीक से जानने वाले और इस समय दुबई में रह रहे सिराज ख़ाँ बताते हैं, ''गीता दत्त ने ओपी की ये कहते हुए अपने मंगेतर गुरु दत्त से सिफ़ारिश की थी कि ये संगीतकार एक दिन बहुत ऊपर जाएगा. इस के बाद की घटनाएं इतिहास हैं. गुरु दत्त अक्सर अपनी निजी बातें भी मुझसे साझा किया करते थे.''

''उनकी पत्नी गीता दत्त और उनकी प्रेमिका वहीदा रहमान दोनों ने उन्हें आख़िरी में छोड़ दिया था और वो अपने आख़िरी दिनों में काफ़ी परेशान थे. उनकी मौत पर अपने स्वभाव के अनुसार ओ पी नैयर ने गीता दत्त और वहीदा रहमान को उनके शव के सामने ही खरी खोटी सुनाई थी. ओ पी नैयर से जब भी मेरी बात होती थी गुरु दत्त का ज़िक्र हर थोड़ी देर बाद आ जाया करता था."

op nayyar's birthday
bollywood - फोटो : self

फ़ीफ़ी शब्द की वजह बैन हुए ओपी

पचास के दशक में ऑल इंडिया रेडियो ने उनके कुछ गानों पर प्रतिबंध लगा दिया. उनकी नज़र में वो कुछ ज़्यादा ही आधुनिक थे. ये अलग बात है कि रेडियो सीलोन पर वो गाने इतने लोकप्रिय हुए कि उन्होंने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए.

सिराज ख़ाँ बताते हैं, "सीआईडी फ़िल्म में उन्होंने एक गाना बनाया था जाता कहाँ है दीवाने. उसमें एक शब्द था फ़ीफ़ी, जिसे एआईआर वालों ने समझा कि इसका कोई द्विअर्थी मतलब है. इसलिए उसे बैन कर दिया गया. लेकिन ये गाना बहुत लोकप्रिय हुआ और इसे पिछले दिनों प्रदर्शित हुई फ़िल्म बॉम्बे वेलवेट में दोबारा इस्तेमाल किया गया."

आशा भोसले को आशा भोसले बनाने का श्रेय अगर किसी को दिया जा सकता है तो वो थे ओ पी नैयर. उन्होंने आशा की आवाज़ के वैविध्य और रेंज का पूरा फ़ायदा उठाया. उनके रूमानी संबंधों ने भी उनके गानों में एक ख़ास किस्म की चिंगारी भर दी.

सिराज ख़ाँ कहते हैं, "मेरा ख़्याल है इस तरह का रिश्ता बॉलीवुड क्या हॉलीवुड में भी नहीं हुआ है. उनकी प्रोफ़ेशनल रिलेशनशिप रोमांस में बदल गई और 1958 से लेकर 1972 तक यानी 14 सालों तक उनका साथ रहा. ये बहुत गहन साथ था. आप सोचिये एक शादीशुदा शख्स जिसके चार बच्चे हैं और एक तलाकशुदा महिला खुलेआम बंबई में घूमा करते थे.''

''नैयर साहब ने एक पत्रकार से कहा था, 'ये तो सुना था कि लंव इज़ ब्लाइंड, लेकिन मेरे मामले में लव ब्लाइंड के अलावा डेफ़ यानी बहरा भी था क्योंकि आशा की आवाज़ के अलावा मैं और कोई आवाज़ सुन नहीं पाता था. इसी वजह से उन्होंने शमशाद बेगम और गीता दत्त से किनाराकशी अख़ित्यार कर ली."

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asha bhosle

'14 साल आशा संग चला प्रेम संबंध'

मशहूर संगीत इतिहासकार राजू भारतन अपनी किताब 'अ जर्नी डाउन मेमोरी लेन' में लिखते हैं, ''ओ पी नैयर की आशा भोंसले के प्रति आसक्ति इस हद तक थी कि एक बार उन्होंने बिना कोई शब्द कहे गीता दत्त का फ़ोन रख दिया था. गीता दत्त ने सिर्फ़ ये पूछने के लिए फ़ोन किया था कि मैंने ऐसी क्या ख़ता की कि अब आप मुझे गाने के लिए नहीं बुलाते?''

''ये वही गीता दत्त थीं, जिन्होंने ओ पी नैयर की पहले पहल गुरु दत्त से सिफ़ारिश की थी. ओ पी नैयर का आशा भोंसले के साथ प्रेम संबंध 14 सालों तक चला. एक ज़माने में ओ पी नैयर की कैडलक कार में घूमने वाली आशा भोंसले ने 1972 में अपने जीवन के इस संगीतमय अध्याय को ख़त्म करने का फ़ैसला किया."

इसके बाद आशा भोंसले और ओपी नैयर ने एक छत के नीचे कभी क़दम नहीं रखा. लेकिन इससे पहले उन्होंने 'प्राण जाए पर वचन न जाए' फ़िल्म के लिए एक गाना रिकॉर्ड किया, जिसे 1973 का फ़िल्म पुरस्कार मिला. आशा उस समारोह में नहीं गईं. ओपी नैयर ने उनकी तरफ़ से ट्रॉफ़ी ली. घर वापस लौटते समय उन्होंने वो ट्रॉफ़ी चलती कार से सड़क पर फेंक दी.

सिराज खाँ याद करते हैं, "नैयर साहब अपनी कार से वापस लौट रहे थे. उनकी कार में गीतकार एसएच बिहारी बैठे हुए थे. सड़क पर उस समय सन्नाटा था. अचानक नैयर साहब ने कार का शीशा नीचा किया और वो ट्राफ़ी फेंक दी जो एक खंबे से टकराई. आखिरी आवाज़ जो उन्होंने सुनी, जैसे कोई चीज़ चूरचूर हो जाती है. उन्होंने बगल में बैठे हुए बिहारी साहब से कहा कि ये जो आपने ट्रॉफ़ी टूटने की आवाज़ सुनी, इसके साथ ही आशा इज़ आउट ऑफ़ माई लाइफ़... फ़ॉर एवर..."

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lata mangeshkar

'लता के नाम पर नहीं लेना पुरस्कार'

ओपी नैयर ने अपने पूरे करियर में लता मंगेशकर से कोई गाना नहीं गवाया.

नैयर को नज़दीक से जानने वाले एक और शख़्स रोहन पुसलकर बताते हैं, ''उनका कहना था कि जो आवाज़ और आवाज़ का जो कैरेक्टर उन्हें चाहिए था वो लता में नहीं था. उनकी आवाज़ मेरे संगीत को सूट नहीं करती थी, इसलिए मैंने उनसे नहीं गवाया. मामला इतना सरल नहीं था जितना ऊपर से दीखता था. एक बार स्क्रीन अख़बार को दिए गए इंटरव्यू में लता मंगेशकर ने कहा था कि वो ओपी नैयर के लिए कभी कोई गाना नहीं गाएंगीं.

स्क्रीन के अगले ही अंक में ओ पी नैयर ने कहा, "लेकिन लताजी मैंने आपसे गाने के लिए कब कहा?"

राजू भारतन लिखते हैं, "एक बार मध्य प्रदेश सरकार ने नैयर को एक लाख रुपए का लता मंगेशकर पुरस्कार देने का फ़ैसला किया. जब राज्य सरकार का एक अधिकारी इस संबंध में उनसे मिलने आया तो उन्होंने उसके मुंह पर ही कहा कि लता मंगेशकर के नाम पर पुरस्कार लेने के बारे में दूर, वो उसके बारे में सोचना भी पसंद नहीं करेंगें. हाँ ये पुरस्कार अगर गीता दत्त के नाम पर होता तो उन्हें इसे ग्रहण करने में कोई आपत्ति नहीं होती."

 

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