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हरफनमौला कलाकार, बेमिसाल अदाकार लेकिन इन वजहों के चलते पीयूष मिश्रा को नहीं मिला वाजिब सम्मान
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
Published by: विजयाश्री गौर
Updated Wed, 13 Jan 2021 03:22 PM IST
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पीयूष मिश्रा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
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पीयूष मिश्रा का जमाना दीवाना रहा है। युवाओं की एक बड़ी जमात उनकी अदाओं की कायल है। गायिकी और अदाकारी उनकी बेमिसाल रही है लेकिन दिल्ली से निकला इतना काबिल कलाकार आखिर मुंबई में जाकर आराम नगर की गलियों में गुम कैसे हो गया, ये भी समझने वाली बात है। निर्माता निर्देशक अनुराग कश्यप के दफ्तर के बाहर यूं ही जमीन पर उकड़ू बैठ मिल जाने वाले पीयूष की सादगी के सब कायल रहे हैं, लेकिन उनकी आदतों के? आइए उनके जन्मदिन पर समझने की कोशिश करते हैं कि वह एक महान कलाकार क्यों नहीं कहला सके।
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पीयूष मिश्रा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अभिनेता पीयूष मिश्रा अक्खड़ मिजाज हैं। सीधे मुंह बात न करना, बात बात पर गुस्सा हो जाना, सच्ची झूठी गप्पें मारने में समय बिताना और विपरीत सेक्स के प्रति आवश्यकता से अधिक आकर्षण रखना, ये सब बातें पीयूष मिश्रा के बारे में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में जगजाहिर हैं। उनके साथ वाले बताते हैं कि अपनी पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी भी वह सौ फीसदी निभा नहीं सके।
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पीयूष मिश्रा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
13 जनवरी 1963 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में प्रकटे पीयूष का असली नाम प्रियकांत शर्मा है। बाद में उनका नाम भी बदला और उपनाम भी। बुआ तारादेवी मिश्रा ने उन्हें गोद ले लिया था और इसी के बाद उनको नाम मिला पीयूष मिश्रा। तारा देवी ने अपने से 32 साल बड़े आदमी से शादी की थी जो कि पीयूष के जन्म के पहले ही चल बसे। बुआ के कोई संतान न थी तभी उन्होंने पीयूष को गोद ले लिया। ये उन दिनों की बात है जब बताते हैं कि पीयूष का परिवार आर्थिक समस्याओं से गुजर रहा था इसलिए सब के सब तारादेवी के यहां ही रहने लगे थे।
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पीयूष मिश्रा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
पीयूष बचपन से कलाकार रहे हैं। शुरू से इस बात का गुस्सा पनपता रहा कि घर वाले उन्हें कलाकार नहीं मानते। जिद्दी ऐसे कि कभी ब्लेड से हाथ काट लेते तो कभी किसी और चीज से खुद को घायल कर लेते। बात मनवाने का उनका यही तरीका था। 1983 में दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पीयूष दाखिल हुए और 1986 में पास भी हो गए।
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पीयूष मिश्रा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
एनएसडी से निकलने के बाद पीयूष मुंबई पहुंचे साल 2003 में। इसके बीच का वक्त उन्होंने कहां बिताया इसके बारे में दिल्ली के श्रीराम रंग सेंटर या एनएसडी कैंटीन में हर किसी को सब कुछ पता है। दिल्ली में रहकर 20 साल तक थिएटर किया लेकिन उनकी पहचान बनी एक ऐसे कलाकार की जिसके मुंह से हमेशा एक अलग रस की ‘खुशबू’ आती रहती थी।
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