सोनम कपूर की फिल्म ‘आयशा’ याद है आपको, इस फिल्म की निर्देशक राजश्री ओझा ने हिंदी सिनेमा में अपनी एक अलग राह अपने बूते बनाई है। इन दिनों उनकी चर्चा वेब सीरीज ‘पॉटलक’ के दूसरे सीजन को लेकर ह रही है। बिना किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के हिंदी सिनेमा में आने वालों को जो संघर्ष करना पड़ता है, वैसा ही संघर्ष राजश्री ने भी किया। लेकिन, इस दौरान उनका सबसे बड़ा मानसिक सहारा बने उनके पिता प्रमोद ओझा। यहां तक कि जब उनकी पहली फिल्म के निर्माता ने बीच में ही हाथ खींच लिए तो उनके पिता ने ही ये फिल्म पूरी कराई।
Rajshree Ojha: पिता का साथ मिले तो बेटियां हर कामयाबी पा सकती हैं, निर्देशक राजश्री ओझा ने सुनाई दिल की बात
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राजश्री ओझा ने जब इंडस्ट्री में आने का मन बनाया तो वह सोच नहीं पा रही थी कि अपने पिता को कैसे बताए कि वह डायरेक्टर बनना चाह रही हैं। बाद में अपनी पहली फिल्म 'चौराहें' को पूरी करने के लिए उन्हें अपने पिता की मदद लेनी पड़ी। राजश्री बताती हैं, 'मुझे बचपन से ही सत्यजीत रे की फिल्में बहुत पसंद थी। मुझे लगता है तभी से मेरे अंदर एक निर्देशक बनने की चाह उत्पन्न हो गई थी, फिर तय किया कि न्यूयॉर्क जाकर फिल्म निर्माण की ट्रेनिंग लेनी चाहिए। काफी समय से सोच रही थी कि पिताजी को यह बात बताऊं, लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी। इसी दौरान कोलकाता से बेंगलुरु आ गई आगे की पढ़ाई के लिए। कंप्यूटर विज्ञान में स्नातक करने के बाद पिताजी को न्यूयॉर्क जाकर फिल्म में डिप्लोमा करने की बात बताई तो उन्होंने अपने दिल पर पत्थर रखकर जाने की इजाजत दी।’
न्यूयार्क से आने के बाद राजश्री ओझा ने साल 2005 में अपनी पहली फिल्म 'चौराहें' शुरू की जिसमें सोहा अली खान, जीनत अमान, कीरा चैपलिन, नेदुमुदी वेणु आदि कलाकारों की मुख्य भूमिकाएं थी। राजश्री ओझा कहती हैं, 'पहले इस फिल्म को दूसरे प्रोड्यूसर प्रोड्यूस कर रहे थे। जब फिल्म की शूटिंग की पूरी तैयारी हो गई तो वह धोखा दे गए। फिर मैंने अपने पिताजी से कहा कि एक शेड्यूल की शूटिंग पूरी करा दें बाकी मैं मैनेज कर लूंगी। इस फिल्म की शूटिंग कोलकाता, मुंबई और केरल में होनी थी। पिताजी ने कोलकाता वाले शेड्यूल की शूटिंग पूरी करा दी।’
कोलकाता में 'चौराहें' की एक शेड्यूल की शूटिंग के बाद राजश्री ओझा ने कई इन्वेस्टर से फिल्म में पैसा लगाने की बात की, लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ। राजश्री ओझा कहती हैं, 'इस दौरान मैने 'आयशा' की स्क्रिप्ट भी लिख ली। 'चौराहें' के लिए कई प्रोडक्शन हाउस के दरवाजे खटखटाए, लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ, फिर मैंने पिताजी से कहा कि आप ही फिल्म पूरी करवा दीजिए। मैने बजट को कंट्रोल में रखा और एक करोड़ रूपये में फिल्म बना ली। हमने फिल्म की शूटिंग साल 2007 में पूरी कर ली। लेकिन फिल्म 'आयशा' के बाद साल 2011 में रिलीज हुई।’
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राजश्री ओझा मानती है कि अगर 'आयशा' नहीं बनती तो शायद 'चौराहें' कभी भी थियेटर तक नहीं पहुंच पाती। राजश्री ओझा कहती हैं, ‘मेरी पहली फिल्म 'चौराहें' तभी रिलीज हो पाई जब 'आयशा' रिलीज हुई। लेकिन 'आयशा' का निर्माण करना मेरे लिए इतना आसान नहीं था। इंडस्ट्री का ऐसा कोई बड़ा प्रोडक्शन हाउस नहीं है जहां मैं आयशा की स्क्रिप्ट लेकर नहीं गई। लेकिन इस सब्जेक्ट पर कोई भी फिल्म बनाने को तैयार नहीं था। फिल्म की कहानी एक महिला के इर्द गिर्द थी। लोगों को लग रहा था कि ऐसी फिल्मों में पैसा लगाने का मतलब घाटे का सौदा। कुछ लोग इतना चिढ़ गए थे कि ऑफिस का दरवाजा खोलते ही बोलते थे कि 'आयशा' की स्क्रिप्ट मत सुनना। लेकिन मुझे इस स्क्रिप्ट पर भरोसा था और मुझे इसी स्क्रिप्ट पर फिल्म बनानी थी।’