हिंदी सिनेमा की कालजयी फिल्मों में शुमार ‘अंदाज’, ‘सीता और गीता’, ‘शोले’, ‘शक्ति’ और ‘सागर’ के निर्देशक रमेश सिप्पी आज अपना 79वां जन्मदिन मना रहे हैं। हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्म निर्माता जी पी सिप्पी के बेटे रमेश सिप्पी ने अपने जन्मदिन पर ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल से इस लंबी बातचीत में अपनी हिट फिल्मों की मेकिंग के दिलचस्प किस्से तो सुनाए ही, साथ ही वह वाकया भी सुनाया जब ‘शोले’ के प्रीमियर पर उनकी बगल वाली सीट पर बैठे दिलीप कुमार दूसरी रील देखकर ही चौंक गए थे कि ये तो क्लाइमेक्स होना चाहिए था फिल्म। इंटरव्यू थोड़ा लंबा है लेकिन है बहुत ही रोचक, चलिए जानते हैं रमेश सिप्पी का सफरनामा...
Ramesh Sippy EXCLUSIVE: रमेश सिप्पी ने सुनाईं करियर की दिलचस्प दास्तां, पहला जवाब सीधे विकीपीडिया वालों के लिए
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नहीं, ये जानकारी सही नहीं है। मेरी पैदाइश कराची में हुई 1944 में। 1947 में बंटवारे के बाद हम बंबई आए थे। पिताजी (जी पी सिप्पी) को यहां आने के बाद चीजें समझने और परिवार को व्यवस्थित करने में थोड़ा समय लगा। इधर उधर के काम करने के बाद उन्होंने भवन निर्माण में काम शुरू किया और 1951 में पहली फिल्म बनाई, ‘सजा’। मिस्त्री ब्रदर्स, यानी कि फली मिस्त्री और जाल मिस्त्री उस फिल्म के कैमरामैन और निर्देशक थे। देवानंद हीरो थे और निम्मी हीरोइन। और, इसी फिल्म के सेट पर पहली बार मेरा सिनेमा से सामना हुआ।
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जब मैं फिल्म ‘सजा’ के सेट पर गया तो छह-सात साल का था। उससे पहले मुझे कुछ पता नहीं था कि फिल्म क्या होती है, शूटिंग क्या होती है? महालक्ष्मी के फेमस स्टूडियो गया तो वहां जो माहौल था, उसने मुझे मोहित कर लिया। सोचने लगा कि ये क्या दुनिया है! सवाल भी उठे लेकिन किससे पूछूं, वहां सब लोग काम कर रहे हैं। ये भी नहीं कि प्रोड्यूसर का बेटा है तो अलग से ख्याल रखे कोई। सब तार इधर उधर बिखरे रहते। सुरक्षा के खास इंतजाम भी तब नहीं होते थे। स्कूल जाना प्राथमिकता थी उन दिनों लेकिन इसका असर ये हुआ कि अब जब भी मुझे मौका मिलता तो मैं भाग निकलता पिताजी के साथ। बस देखते देखते कहीं दिमाग में सिनेमा चलना शुरू हो गया।
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बताता हूं ये वाकया भी। हुआ क्या कि उस दिन मैं सेट पर था और जिस बच्चे को ये किरदार करना था, वह ठीक से कर नहीं पा रहा था। तो ये हुआ कि कोई और ढूंढ लो। अभिनेता रंजन के बचपन का रोल था। एक सीन या कहें कि एक शॉट था। दो शब्द का मेरा संवाद था, ‘अम्मी अम्मी’ और जाकर मुझे मां का किरदार कर रहीं अचला सचदेव से लिपट जाना था। लेकिन, मुझे कभी अभिनय का चस्का नहीं लगा। फिर एक और फिल्म बनी थी, ‘भाई बहन’। उसमें मैंने गली के गुंडे जग्गू दादा का रोल किया। रंगीन पट्टियों वाली गंजी और गले में गांठ वाला रूमाल। रास्ते पर आवारागर्दी करनी थी, दो तीन सीन थे तो कर लिए। लेकिन ये कभी ख्याल नहीं आया कि मुझे अदाकारी ही करनी है। मुझे कैमरे के पीछे का काम जादुई लगता था।
कैमरे के पीछे काफी काम किया मैंने। फिल्म निर्माण की जिम्मेदारियां संभाली। निर्देशन में भी हाथ बंटाता था। लेकिन, आधिकारिक तौर पर पूछें तो मैं निर्देशक एच एस रवैल का सहायक बना फिल्म ‘मेरे महबूब’ के सेट पर। वहां मैं उनका सातवां और आखिरी सहायक था। सारा काम करता था। साधना जी के चप्पल उठाए हैं मैंने। दो चार दिन का काम था। एक गाना था। बाकी सब डैडी की फिल्मों के सेट्स पर ही सीखा। 50 के दशक में डैडी काफी फिल्में बना चुके थे। फिर 60 के दशक में आई एस जौहर के साथ जुड़कर उन्होंने खूब काम किया। ‘जौहर महमूद इन गोवा’ में जो सहायक निर्देशक थे, डी आर ठक्कर, उनको मैं देखता रहा कि क्या करते हैं। और, एक खलिश मियां थे जो संवादों पर नजर रखते और उर्दू में लिखकर संवाद कलाकारों को देते थे। फिर हमारी अगली फिल्म शुरू हो गई ‘मेरे सनम’, आशा पारेख और बिस्वजीत के साथ। उसकी आउटडोर शूटिंग में काफी कुछ सीखा। हम लोग इस फिल्म की शूटिंग करने मनाली गए थे लेकिन वहां बारिश लगातार होती रही तो सारे ट्रकों को लेकर हम कश्मीर निकल गए। काफी काम हो गया। गाने वाने सब शूट हो गए। कुछ सीन्स हो गए। फिर आकर बंबई में काम किया। ये दोनों फिल्में 1965 में रिलीज हुई और दोनों सुपरहिट रहीं। फिर और फिल्में बनीं। राजेश खन्ना जिस कंपटीशन में जीते उसे आयोजित करने वाली संस्था यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स में डैडी भी थे। राजेश खन्ना के के साथ हमारी पहली फिल्म थी ‘राज’, तो उनसे भी मेल मुलाकात होती रही।