मनोरंजन का संसार तेजी से बदल रहा है और फिल्मों में जमे सितारे वेब सीरीज पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। वेब की बढ़ती लोकप्रियता का नतीजा है कि अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने 'वीरे दी वेडिंग' के बाद कोई फिल्म साइन करने के बजाय तीन वेब सीरीज साइन कर लीं। एंटरटेनमेंट की बदलती दुनिया में वेब के बढ़ते दबदबे को लेकर स्वरा भास्कर की रवि बुले से विशेष बातचीत....
वेब सीरीज के बोल्ड सीन पर बोलीं स्वरा भास्कर, 'आजादी बेहद जरूरी है'
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सफल होने के बाद एक्टर ज्यादा से ज्यादा फिल्में साइन करते हैं। आप एक के बाद एक वेब सीरीज कर रही हैं। क्या वजह है?
मेरा फिल्मी सफर देखें तो 2016 में 'निल बटे सन्नाटा' आई, 2017 में 'अनारकली ऑफ आरा' और 2018 में 'वीरे दी वेडिंग'। ग्राफ लगातार ऊपर है। नए-नए किरदार मिले। मैं नहीं चाहती कि वीरे के बाद ऐसी फिल्म करूं जो उन्नीस-बीस हो। मैं चाहती हूं क्वालिटी बनी रहे। मैंने पाया कि फिल्मों से ज्यादा वेब में दिलचस्प ऑफर थे। एक्सपेरिमेंट से मुझे डर नहीं लगता। वेब में इसकी खूब गुंजाइश है। खुला माध्यम है। सेंसर बॉक्स ऑफिस टीआरपी की दिक्कत नहीं है।
कैसे एक्सपेरिमेंट कर रही हैं वेब में?
तीन सीरीज कर रही हूं। 'इट्स नॉट दैट सिंपल सीजन-2' कल ही रिलीज हुई। यह मॉडर्न दुनिया की महिला की कहानी है जो रिश्तों और कामकाज के बीच अपना अस्तित्व ढूंढ रही है। रसभरी है स्टूडेंट-टीचर की कहानी। फिर 'फ्लैश' मानव तस्करी पर है। सारे किरदार अलग-अलग हैं जो कम से कम मैंने नहीं किए। मेरी वेब में प्रयोग करना चाहती हूं और फिल्मों को एक्सक्लूसिव रखना चाहती हूं। फिल्म में तभी किसी रोल को हां कहूं जब उसके बारे में निश्चिंत हो जाऊं।
इन कड़ी कसौटियों में लेखकों-निर्देशकों के लिए आपके वास्ते रोल निकालना कड़ी चुनौती बन जाएगा?
मैं समझती हूं। लेकिन कभी कभी हां-ना इस पर निर्भर नहीं होती कि स्क्रिप्ट कैसी है। यह अहम हो जाता है कि जीवन के सफर में आप किस मोड़ पर हैं। जो रोल मैं कर चुकी हूं अनुभव कर चुकी हूं वो बार-बार क्यों करूं।
रोल का चयन निजी होने पर भी एक्टर दर्शक से कनेक्ट होना चाहता है। वेब में इसकी कितनी गुंजाइश है?
सबसे पहले तो वेब प्लेटफॉर्म दे रहा है। मैं फिल्म नहीं कर रही तो डर नहीं है कि भुला दी जाऊंगी। दर्शक मेरा काम यहां देख सकते हैं। वेब दर्शकों से अंतरंग ढंग से जोड़ता है। वेब पर्सनल एक्सपीरियंस है जिसमें दर्शक एकांत में आपसे जुड़ता है। वेब की पहुंच उस दर्शक तक है जिस तक मेरी फिल्म नहीं पहुंची या जिसने मेरी फिल्म पहले नहीं देखी।
वेब पर सेंसर नहीं होने से कुछ ऐसी सीरीज बनी हैं जिनमें दिखाई हिंसा या सेक्स दृश्य कई लोगों को अनावश्यक लगे। अनियंत्रित होने पर वेब पर सेंसरशिप का खतरा है?
फिल्म टीवी पर सेंसरशिप के दौर में वेब की आजादी जरूरी है। कुछ गाइडलाइंस तो आ चुकी हैं। देश में 130 करोड़ लोग हैं तो सोचने वाली बात है कि कितनी अलग-अलग राय भावनाएं और आदर्श मूल्य होंगे। लोकतांत्रिक समाज की खूबसूरती यही है कि तमाम राय के बीच सब अपनी-अपनी अभिव्यक्ति कर सकते हैं। हालांकि हमारे समाज में इसकी स्पेस कम हो रही है। यह कला के लिए अच्छा नहीं है। कलाकार भी डर के मारे खुद को सेंसर करना शुरू कर देते हैं।