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मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां: जिनकी आवाज के दीवाने थे पाकिस्तानी राष्ट्रपति, लता मंगेशकर भी हैं बड़ी फैन
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: अमरीन हुसैन
Updated Tue, 23 Mar 2021 02:39 PM IST
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नूरजहां, याहया खान
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मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां, मौसिकी की दुनिया का वो चमकता नाम हैं, जिसकी दमक आज भी फीकी नहीं पड़ी है। गायिकी के इतिहास में दुनिया को ये नाम आज भी याद है। नूजहां से जुड़े वैसे तो कई किस्से हैं, जो अबतक अनसुने और अनकहे हैं, लेकिन एक घटना ऐसी है जो उनके नाम से लिपटी है। जब-जब नूरजहां का जिक्र होता है, लोग इसे लोग दोहरा ही देते हैं। वैसे तो नूर की शोहरत, आवाज और नाम की कोई सीमा नहीं थी, लेकिन वो ब्रिटिश भारत में पैदा हुई थीं जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। अविभाजित भारत में जन्म लेने के कारण उन्हें हिंदुस्तान में भी उतना ही चाहा जाता है। खुद गायिका को भी इस देश से बहुत लगाव था। क्योंकि वे कभी स्वीकार ही नहीं कर पाईं कि हम अलग हो गए हैं। उनका मानना था कि सीमाएं हमें जुदा नहीं कर सकती हैं।
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नूरजहां
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नूरजहां का जन्म 21 सितंबर 1926 को लाहौर से लगभग 45 किलोमीटर दूर कसूर में हुआ था। एक निर्धन परिवार में जन्मीं नूरजहां दो बहनों, ईदन बाई और हैदरी बांदी में सबसे छोटी थीं। उनका परिवार संगीत के सहारे भरण-पोषण करता था। किसी तरह नूरजहां कलकत्ता आ गई थीं, जहां उन्होंने कला की दुनिया में कदम रखा। नूरजहां का असली नाम अल्लाह वसाई था, जो यहीं आकर नूरजहां बन गया था। वे ब्रिटिश हिंदुस्तान की आला तरीन फनकारा के तौर पर उभरी थीं।
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नूरजहां
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नूरजहां के चाहने वाले उन्हें लता मंगेशकर से एक कदम आगे पाते हैं। बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान चली गई थीं, लेकिन सरहद भारत में उनकी लोकप्रियता को बांध नहीं पाई। सन 1935 में नौ साल की नूरजहां ने मदान थियेटर की फिल्म गैबी गोला से फिल्मी सफर की शुरुआत की थी। इसके बाद मिस्र का सितारा (1935), फख्रे इस्लाम, तारणहार (1937), सजनी (1940) और रेड सिग्नल (1941) जैसी फिल्मों में भी काम किया। 1936 में आई फिल्म शीला में उन्होंने पहली बार एक्टिंग के साथ गाना भी गाया था।
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नूरजहां
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नूरजहां सिर्फ गायिका ही नहीं थीं, बल्कि अदाकार भी थीं। सुंदरता की मूरत दिखने वालीं नूर ने रणजीत मूवीटोन की कई फिल्मों में काम किया। इनमें ससुराल, उम्मीद, चांदनी, धीरज, फरियाद और दुहाई जैसी फिल्मों में गाने के साथ ही मंझा हुआ अभिनय भी दिखाया। 1942 में ही आई फिल्म ‘खानदान’ नूरजहां के करियर के लिए मील का पत्थर साबित हुई थी। इसके बाद तो मानों उनकी तूती बोलने लगी। इस फिल्म के संगीतकार गुलाम हैदर थे। ये वही गुलाम हैदर हैं, जिन्होंने लता मंगेशकर की किस्मत भी पलट दी और लता राष्ट्रीय स्वरकोकिला बन गईं।
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नूरजहां
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नूरजहां की लोकप्रियता और उनके चाहने वालों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति भी उनकी आवाज के दीवाने थे। यहां तक तो खैर सबकुछ ठीक था, लेकिन राष्ट्रपति को लेकर वे चर्चा में तब आईं जब नूरजहां ने खुद उन्हें बेधड़क फोन घुमा दिया था।
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