कालजयी गीतकार शकील बदायूंनी ने जब अपनी कलम से दुलार का दरिया बहाते हुए लिखा, भैया बाबा ने सुख मोहे सारे दिए, मोरे गौने में चाँद और सितारे दिए, साथ ले के मैं सारा गगनवा चली, पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली.... तो साल 1957 में निर्देशक महबूब खान को भी और फिल्म मदर इंडिया के संगीतकार नौशाद को भी समझ आ गया कि इस गाने को गला खोल के अगर कोई गा सकता है तो वह हैं सुरों की बेगम, शमशाद बेगम.....
किस्सागोई: मीडिया ने दो बार मारा इस मशहूर सिंगर को जिसने गाया, ‘पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली..’
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पहले ब्रेक में ही मिले 12 गाने
शमशाद बेगम ने मदर इंडिया का गाना पी के घर आज ... तो खैर महबूब खान की मिन्नतों पर और उन्हें लाहौर से मुंबई लाने की बातें याद दिलाने पर गाया ही, इसके बाद भी तमाम सुपर डुपर हिट गाने गाए। और, ऐसे गाने भी गाए जिनमें कोरस गाने वालों की भीड़ में कभी किशोर कुमार तो कभी लता मंगेशकर खड़े दिख जाते थे। संगीतकार मदन मोहन ने भी शमशाद बेगम के गानों में कोरस खूब गाया है। ये तब सब बच्चे थे और बच्ची ही तो थीं शमशाद बेगम जब उन्हें गाना गाने का पहला बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हासिल हुआ। स्कूल में अपने गानों के लिए खूब तारीफ पाने वाली शमशाद को कव्वालियों का शौक रखने वाले उनके एक चाचा लाहौर की एक बड़ी म्यूजिक कंपनी में ऑडीशन दिलाने ले गए।
ये वाकया है साल 1931 का और 14 अप्रैल 1919 को पैदा हुईं शमशाद तब सिर्फ 12 साल की थीं। मशहूर संगीतकार गुलाम हैदर ने बच्ची का टेस्ट लिया और टेस्ट पास होते ही मिला उसे 12 गानों का कॉन्ट्रैक्ट और हर गाने के एवज में मिले 15 रुपये। अलबम पूरा होने पर शमशाद को बाद में 500 रुपये और इनाम में भी मिले। लेकिन, ये तब हो सका जब शमशाद के चच्चा ने उनके वालिद को बड़ी मुश्किल से मनाया। बहुत ही संस्कारी परिवार की थीं शमशाद बेगम का और उनके वालिद मियां हुसैन बख्श मान कतई नहीं चाहते थे कि उनकी बिटिया बाहर जाकर गाना गाए। ये गाने तब जाकर रिकॉर्ड हो पाए जब तय ये हुआ कि शमशाद सारे गाने बुर्के में रिकॉर्ड करेंगी और फोटो उनका एक न खिंचेगा। आगे किस्सा बढ़ाने से पहले पेश ए खिदमत है फिल्म मुगले आजम का ये गाना जिसमें शमशाद बेगम के साथ गा रही हैं लता मंगेशकर, तब तक वह इतना मशहूर न हुई थीं।
13 साल की शमशाद की मोहब्बत और बगावत
लता मंगेशकर और उनकी बहन आशा भोसले का हिंदी सिनेमा में आगमन उन्हीं दिनों हुआ जब शमशाद बेगम का करियर अपने शीर्ष पर था। संगीतकार दोनों को बेगम की स्टाइल में ही गाने को बोलते थे और तमाम गाने लता व आशा ने गाए भी हैं शमशाद बेगम के ही अंदाज में। लेकिन, अपने पीछे आने वाली पीढ़ी को अपने अंदाज का दीवाना बना देने का ये हुनर पाने से पहले शमशाद बेगम ने मुश्किलें बहुत झेलीं और इनकी शुरुआत होती है उनके अपने घर से। शमशाद बेगम की पैदाइश जलियांवाला बाग हत्याकांड के ठीक अगले दिन की है। लाहौर में पैदा हुई शमशाद की मां गुलाम फातिमा की दो बेटियां और पांच बेटे और भी हुए।
13 साल की शमशाद पर मोहल्ले का ही गणपत लाल बट्टू रीझ गया। गणपत लॉ का स्टूडेंट था और शमशाद से उम्र में काफी बड़ा भी। लेकिन, जमाने भर की मुखालिफत के बावजूद दोनों ने 1934 में शादी कर ली। गणपत ने लाहौर से मुंबई तक शमशाद का हर कदम पर ख्याल रखा। जहां उनके कदम होते, वहां गणपत अपना दिल बिछाए रहते। मदर इंडिया का गाना गाने से पहले शमशाद ने गाना इन्हीं गणपत का 1955 में एक सड़क हादसे में निधन हो जाने के चलते छोड़ा था। 1955 से पहले शमशाद ने गायिकी के जो कमाल किए, वे आज भी बेमिसाल हैं।
हीरोइन बनने का ऑफर मिला तो घर में गदर
तो शमशाद बेगम की किस्मत ने पलटा खाया था रिकॉर्डिंग कंपनी जीनोफोन का कॉन्ट्रैक्ट हासिल करके। उनके गाए रिकॉर्ड बाजार में आए तो धूम मच गई। पेशावर और लाहौर के आल इंडिया रेडियो पर उनके गाने खूब बजते। प्रोड्यूसर दिलसुख पंचोली ने शमशाद बेगम को देखा तो फिल्मों में हीरोइन बनने का ऑफर दे दिया। मैडम ने मान भी लिया। स्क्रीन टेस्ट हो गया। सेलेक्ट भी हो गईं और फिर आया नंबर मियां हुसैन बख्श से परमीशन लेने का। साहब फैल गए कि बिटिया अभी तक गाने ही गा रही थी अब पिच्चर सलीमा भी करने लगेगी तो उनकी तो नाक ही कट जाएगी बिरादरी में। सब कोशिशें बेकार गईं। वालिद साहब ने फरमान जारी कर दिया कि अगर कहीं फोटो भी अब खिंची तो गाना बंद।
नतीजा ये कि साल 1933 से लेकर साल 1970 तक की शमशाद बेगम की गिनती की फोटुए हैं। वो इसलिए कि बिटिया ने अपने अब्बा हुजूर से दोबारा कभी कैमरे के सामने न आने का वादा कर दिया था। और अब जानिए सौ टके वाली बात। शमशाद बेगम ने इतनी मशहूरियत पाने तक किसी उस्ताद से गाना सीखा तक न था। रेडियो पर वह दिल्ली की क्राउन इंपीरियल थिएट्रिकल कंपनी के साजिदों के साथ गाती थी। इन्हीं दिनों उन्होंने कुछ नात रिकॉर्ड की। सारंगी के उस्ताद बक्शवाले साहेब ने उनको सुना और अपने साथ ले गए। इन्हीं से शमशाद ने सरगम सीखी। और यहीं से मौका बना शमशाद बेगम का अपने वालिद का घर छोड़ बंबई जाने का। बाबुल का घर छोड़ जाने का दर्द शमशाद बेगम की आवाज में समझना हो तो ये गाना बिल्कुल मुफ़ीद है।
महबूब खान लेकर आए बंबई
ये बात कोई 1940-41 की है जब शमशाद बेगम अपने बाबुल का घर छोड़ बंबई आ गईं। लेकिन, लाहौर से बंबई आना इतना आसान न था। उस वक्त भी काम आए थे निर्देशक महबूब खान। महबूब खान ने गणपत को ऐसा ऑफर दिया कि वो मना ही नही कर पाए। महबूब खान बोले, “मैं बंबई में इसे रहने को घर दूंगा। गाड़ी दूंगा। नौकर चाकर दूंगा और पांच छह और लोग भी इसके साथ आना चाहें तो उनका खर्च भी दूंगा।” रेडियो की शोहरत शमशाद के साथ साथ फिल्मों में भी चली आई। गुलाम हैदर ने समशाद से 1941 में रिलीज हुई फिल्म खजांची और उसके अगले साल आई फिल्म खानदान में बेहतरीन गाने गवाए। मशहूर अभिनेता प्राण की पहली फिल्म यमला जट में भी शमशाद बेगम ने सुपरहिट गाने गाए। रफीक गजनवी, अमीर अली, पंडित गोबिंदराम, पंडित अमरनाथ, बुलो सी रानी, राशिद अत्रे और एम ए मुख्तार जैसे संगीतकारों ने शमशाद का साथ पाकर खूब सारे हिट गाने बनाए।
शमशाद बेगम ने देश के बंटवारे तक बंबई में अपना बड़ा नाम बना लिया। और, ये इसके बावजूद कि गुलाम हैदर इस बीच एक और गायिका नूरजहां भी खोज लाए थे। फिर बंटवारा हुआ और हैदर पाकिस्तान चले गए और शमशाद बेगम को मिल गया मौसिकी में एक नई परवाज़ का पूरा खुला आसमान।
कम लोग ही जानते हैं कि एस डी बर्मन को बतौर म्यूजिक डायरेक्टर हिंदी सिनेमा में स्थापित करने में भी शमशाद बेगम का बड़ा हाथ है। वह बंगाली सिनेमा के बड़े कंपोजर थे, लेकिन 1946 में जब उन्हे पहली हिंदी फिल्म शिकारी का म्यूजिक बनाने का मौका मिला तो वह सीधे शमशाद बेगम के पास ही गए। शमशाद बेगम ने कभी किसी नए संगीतकार के साथ गाने से मना नहीं किया। दिलचस्प बात ये है कि उस दौर के जितने भी बड़े संगीतकार हुए सब अपने स्ट्रगल के दौर में भी शमशाद से मिल चुके थे। ये सब करियर का बड़ा मौका मिलते ही सीधे शमशाद के पास ही पहुंचे। कुछ और संगीतकारों के किस्से अभी बाकी हैं, पहले सुनिए शमशाद बेगम का गाया और एसडी बर्मन का कंपोज किया फिल्म बहार का ये गाना, सैंया दिल में आना रे, आके फिर ना जाने रे, छम छमा छम छम...परदे पर यहां छम छम करती आपको दिखेंगी वैजयंतीमाला।