हिंदी सिनेमा में ऐसा पहली बार हुआ है कि जिस बच्चे ने चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर किसी फिल्म में एक किरदार किया हो और बाद में जब उस फिल्म का सीक्वल बना तो उसमें भी उसने वही किरदार निभाया। निर्माता-निर्देशक अनिल शर्मा के बेटे उत्कर्ष शर्मा ने फिल्म 'गदर' में जीते की भूमिका निभाई थी और जब 22 साल के बाद इस फिल्म का सीक्वल बना तो उसमें भी काम किया है। उत्कर्ष शर्मा अपनी नई फिल्म 'गदर -2' को लेकर काफी उत्साहित हैं। उनका मानना है कि जिस तरह से दर्शक भावनात्मक तौर से 'गदर' से जुड़े उसी तरह से 'गदर -2' से भी जुड़ेंगे। उत्कर्ष शर्मा से ‘अमर उजाला’ ने ये खास बातचीत की।
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क्या कहना चाहेंगे फिल्म गदर -2 को लेकर?
'गदर 2' को लेकर सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि 'गदर' ने जिस तरह से दर्शकों से भावनात्मक रूप जोड़ा। उसी तरह से लोग इस फिल्म से भी जुड़ें। जब 'गदर' दोबारा रिलीज हुई तो तब भी इस फिल्म को दर्शकों का खूब प्यार मिला। 'गदर 2' में भी हमारी यहीं कोशिश है कि यह फिल्म भी दर्शकों से भावनात्मक रूप से जुड़े। हमने कभी नहीं सोचा था कि 'गदर 2' कभी बनेगी। लेकिन जब अच्छी कहानी आई कि 'गदर' के साथ तराजू पर तौल सके। तब हमने 'गदर 2' बनाने का निश्चय किया। कई लोग पापा से कहते रहते थे कि 'गदर 2' बननी चाहिए। लेकिन कहानी कोई नहीं मिल रही थी।
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फिर कहानी कैसे मिली?
साल 2021 में नवरात्रि का समय था, अचानक फिल्म के लेखक शक्तिमान जी घर पर आए उन्होंने पापा से कहा कि मेरे पास एक कहानी है। उस समय पापा कोई और प्रोजेक्ट कर रहे थे। जैसे ही शक्तिमान जी फिल्म की वन लाइन सुनाई पापा एकदम से उतावले हो गए, जैसे 'गदर' के समय पर हुए थे। उसी दिन पापा ने सनी जी और जी स्टूडियोज को फिल्म की कहानी का विचार सुनाया और उसी दिन यह प्रोजेक्ट फाइनल हो गया। फिल्म की कहानी पर सबको विश्वास था।
और, 'गदर' को दोबारा रिलीज करने का मकसद भी यही रहा होगा कि एक बार लोगों की याद तरोताजा हो जाए?
फिल्म को दोबारा रिलीज करने का मकसद ही यही था कि नई पीढ़ी को फिल्म कैसी लग रही है। टीवी पर यह फिल्म तो कई बार लोगों ने देखी होगी। थियेटर में दोबारा रिलीज करने का मकसद यही था कि नई पीढ़ी के लोगों के मन में इस फिल्म को लेकर क्या सोच है। जब फिल्म रिलीज हुई तो मैं खुद थियेटर में दो बार फिल्म देखने गया। थियेटर में ज्यादतर युवा पीढ़ी के लोग ही फिल्म को देखकर खूब एन्जॉय कर रहे थे। हमारे लिए यह मार्केटिंग रिसर्च था कि फिल्म की पहुंच अभी भी दर्शकों के बीच कितनी है।
आप ने अपने पापा की कई फिल्में चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर कीं क्या तभी तय कर लिया था कि बड़े होकर कलाकार ही बनना है?
बचपन में मुझे क्रिकेट देखने और खेलने का बहुत शौक था। मेरे दिमाग में कहीं न कहीं यही बात थी कि क्रिकेटर ही बनना है। लेकिन जब 15 साल का हो गया तब मैंने सोचा कि क्रिकेट में नहीं, अब फिल्मों में ही करियर बनाना है। उस समय पापा की फिल्म 'वीर' में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया। तब से फिल्मों में मेरी दिलचस्पी बढ़ने लगी। मैं कुछ न कुछ लिखता भी रहता था।