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Gulzar Birthday: शब्दों से जिंदगी के खालीपन को भरा, गीतों की जादूगरी ने ‘संपूर्ण सिंह कालरा’ को बनाया ‘गुलजार’
Sun, 18 Aug 2024 07:37 AM IST
सुवेश शुक्ला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: सुवेश शुक्ला
Updated Sun, 18 Aug 2024 07:37 AM IST
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गुलजार जन्मदिन विशेष
- फोटो : अमर उजाला
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‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, सावन के कुछ भीगे-भीगे दिन रखे हैं, और मेरे एक खत में लिपटी रात पड़ी है, वो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो…’ गुलजार साहब की इन लाइनों में कुछ खोने का दर्द और कुछ पाने की ललक झलकती है। सदी के महान गीतकार ने अपनी जिंदगी का सफर ‘संपूर्ण सिंह कालरा’ से शुरू किया था और ‘गुलजार’ बनकर संगीत और फिल्म की दुनिया को, अपने गीतों की खुशबू से महका दिया। आज उनका नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है। देश और दुनिया में उनके लाखों-लाख चाहने वाले हैं। गुलजार के गीत किसी के लिए सुकून हैं तो किसी के दर्द का मरहम। उनके गीत जैसे दवा और दुआ दोनों का ही काम करते हैं। माशूक की खूबसूरती का बखान हो, टूटे दिल की आवाज हो या कुछ पाने का जुनून और खोने का गम हो, सभी रंगों के गीत और शेर गुलजार साहब ने लिखे और इसे हमारी झोली में डाल दिया।
गुलजार
- फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
शब्दों से भरा जिंदगी का खालीपन
18 अगस्त 1934 को पंजाब जिला (अब पाकिस्तान) के दीना गांव में जन्मे गुलजार का पूरा नाम संपूर्ण सिंह कालरा है। उनका ये गांव झेलम नदी के पास बसा हुआ है। बंटवारे के बाद वह अपने परिवार के साथ भारत चले आएं। उनका परिवार अमृतसर में आकर बस गया। गुलजार की मां का साया बचपन में ही उनके सिर से उठ गया और पिता का प्यार भी उनके हिस्से नहीं आया। अपनी जिंदगी के खालीपन को उन्होंने शब्दों से भरना शुरू कर दिया। अपने सपनों को पूरा करने के लिए मुंबई निकल पड़े, लेकिन मायानगरी की जिंदगी इतनी आसान नहीं थी। उन्होंने शुरूआती दिनों में मुंबई के वर्ली के एक गैराज में मैकेनिक का काम किया। वह अपने खाली समय में कविताएं लिखते थे। गुलजार के लिखने की ललक ने उन्हें फर्श से उठाकर अर्श तक पहुंचा दिया।
Genelia Deshmukh: रितेश देशमुख के भतीजे ने स्टेज पर दी प्रस्तुति, खास अंदाज में अभिनेता ने बढ़ाया हौसला
18 अगस्त 1934 को पंजाब जिला (अब पाकिस्तान) के दीना गांव में जन्मे गुलजार का पूरा नाम संपूर्ण सिंह कालरा है। उनका ये गांव झेलम नदी के पास बसा हुआ है। बंटवारे के बाद वह अपने परिवार के साथ भारत चले आएं। उनका परिवार अमृतसर में आकर बस गया। गुलजार की मां का साया बचपन में ही उनके सिर से उठ गया और पिता का प्यार भी उनके हिस्से नहीं आया। अपनी जिंदगी के खालीपन को उन्होंने शब्दों से भरना शुरू कर दिया। अपने सपनों को पूरा करने के लिए मुंबई निकल पड़े, लेकिन मायानगरी की जिंदगी इतनी आसान नहीं थी। उन्होंने शुरूआती दिनों में मुंबई के वर्ली के एक गैराज में मैकेनिक का काम किया। वह अपने खाली समय में कविताएं लिखते थे। गुलजार के लिखने की ललक ने उन्हें फर्श से उठाकर अर्श तक पहुंचा दिया।
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गुलजार
- फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
गुलजार की जिंदगी का खूबसूरत मोड़
गुलजार साहब की जिंदगी ने नया मोड़ तब लिया जब उनकी मुलाकात मशहूर निर्देशक बिमल रॉय से हुई। उन्होंने गुलजार को ‘बंदिनी’ फिल्म में गाना लिखने का मौका दिया। गुलजार ने इस फिल्म में गीत लिखा, ‘मोरा गोरा अंग लईले, मोहे श्याम रंग दईदे’ इस गीत को खूब पसंद किया गया। गुलजार ने इस गीत से यह साबित कर दिया था कि उनके अंदर लोगों के दिलों तक पहुंचने की काबिलियत है। गुलजार ने गीत लिखने के साथ-साथ कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। उन्होंने ‘आंधी’, ‘किरदार’, ‘मौसम’, ‘नमकीन’, ‘हूतूतू’ जैसी फिल्में निर्देशित की।
गुलजार साहब की जिंदगी ने नया मोड़ तब लिया जब उनकी मुलाकात मशहूर निर्देशक बिमल रॉय से हुई। उन्होंने गुलजार को ‘बंदिनी’ फिल्म में गाना लिखने का मौका दिया। गुलजार ने इस फिल्म में गीत लिखा, ‘मोरा गोरा अंग लईले, मोहे श्याम रंग दईदे’ इस गीत को खूब पसंद किया गया। गुलजार ने इस गीत से यह साबित कर दिया था कि उनके अंदर लोगों के दिलों तक पहुंचने की काबिलियत है। गुलजार ने गीत लिखने के साथ-साथ कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। उन्होंने ‘आंधी’, ‘किरदार’, ‘मौसम’, ‘नमकीन’, ‘हूतूतू’ जैसी फिल्में निर्देशित की।
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गुलजार
- फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
पुरस्कारों से ‘गुलजार’ हुआ घर
गुलजार साहब ने ‘माचिस’ जैसी फिल्म का निर्देशन किया। इस फिल्म ने यह सिद्ध कर दिया था कि वह किस तरह से लोगों की भावनाओं को समझते हैं और उनके दिलों तक पहुंचने की समझ रखते हैं। उन्होंने कई फिल्मों के लिए स्क्रीनप्ले लिखे हैं। गुलजार साहब को 20 फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले हैं। 11 फिल्मफेयर अवॉर्ड सर्वश्रेष्ठ गीतकार और 4 अवॉर्ड बेस्ट डायलॉग लिखने के लिए मिले हैं। ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ के लिए उन्हें ऑस्कर अवॉर्ड भी मिला। आज भी उनके लिखने का सफर जारी है, मानों की वह कह रहे हों, ‘तुझसे नाराज नहीं जिंदगी, हैरान हूं मैं, तेरे मासूम सवालों से परेशान हूं मैं…’ आज उनके 90वें जन्मदिन पर उनके कुछ मशहूर गीतों के मुखड़े और शायरी पढ़ते हैं।
गुलजार साहब ने ‘माचिस’ जैसी फिल्म का निर्देशन किया। इस फिल्म ने यह सिद्ध कर दिया था कि वह किस तरह से लोगों की भावनाओं को समझते हैं और उनके दिलों तक पहुंचने की समझ रखते हैं। उन्होंने कई फिल्मों के लिए स्क्रीनप्ले लिखे हैं। गुलजार साहब को 20 फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले हैं। 11 फिल्मफेयर अवॉर्ड सर्वश्रेष्ठ गीतकार और 4 अवॉर्ड बेस्ट डायलॉग लिखने के लिए मिले हैं। ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ के लिए उन्हें ऑस्कर अवॉर्ड भी मिला। आज भी उनके लिखने का सफर जारी है, मानों की वह कह रहे हों, ‘तुझसे नाराज नहीं जिंदगी, हैरान हूं मैं, तेरे मासूम सवालों से परेशान हूं मैं…’ आज उनके 90वें जन्मदिन पर उनके कुछ मशहूर गीतों के मुखड़े और शायरी पढ़ते हैं।
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गुलजार
- फोटो : एएनआई
हुजूर इस कदर भी न इतरा के चलिये
खुले आम आंचल न लहरा के चलिये
फिल्म- मासूम (1983)
इक दूर से आती है पास आके पलटती है
इक राह अकेली सी रुकती है न चलती है
फिल्म- आंधी (1975)
रोज रोज आंखों तले...
रोज रोज आंखों तले एक ही सपना चले
रात भर काजल जले, आंख में जिस तरह
फिल्म-जीवा (1986)
हजार राहें, मुड़के देखीं, कहीं से कोई सदा ना आई
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने, हमारी थोड़ी सी बेवफाई
फिल्म- थोड़ी सी बेवफाई (1978)
आंखों पर कुछ ऐसे तुमने जुल्फ गिरा दी है
बेचारे से कुछ ख्वाबों की नींद उड़ा दी है
फिल्म-जीवा (1986)
कोई मनचला गर पकड़ लेगा आंचल
कोई मनचला गर पकड़ लेगा आंचल
जरा सोचिये आप क्या कीजियेगा
फिल्म- मासूम (1983)
लगा दें अगर बढ़ के जुल्फों में कलियां
तो क्या अपनी जुल्फें झटक दीजियेगा
फिल्म- मासूम (1983)
शाम से आंख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है
एल्बम-मरासिम (1999)
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक्त की शाख से लम्हें नहीं तोड़ा करते
एल्बम-मरासिम (1999)
तुम आ गए हो नूर आ गया है
नहीं तो चरागों से लौ जा रही थी
फिल्म- आंधी (1975)
कोई होता जिसको अपना, हम अपना कह लेते यारों
पास नहीं तो दूर ही होता, लेकिन कोई मेरा अपना
फिल्म- मेरे अपने (1971)
उस रात नहीं फिर घर जाता, वो चांद यहीं सो जाता है
जब तारे जमीं पर चलते हैं, आकाश जमीं हो जाता है
फिल्म- घरौंदा (1977)
तेरी झोली डारूं, सब सूखी पात जो आए
तेरा छुआ लगे, मेरी सूखी डाल हरियाए
फिल्म- रुदाली (1993)
जिस तन को छूआ तूने उस तन को छुपाऊं
जिस मन को लागे नैना, वो किसको दिखाऊं
फिल्म- रुदाली (1993)
खुले आम आंचल न लहरा के चलिये
फिल्म- मासूम (1983)
इक दूर से आती है पास आके पलटती है
इक राह अकेली सी रुकती है न चलती है
फिल्म- आंधी (1975)
रोज रोज आंखों तले...
रोज रोज आंखों तले एक ही सपना चले
रात भर काजल जले, आंख में जिस तरह
फिल्म-जीवा (1986)
हजार राहें, मुड़के देखीं, कहीं से कोई सदा ना आई
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने, हमारी थोड़ी सी बेवफाई
फिल्म- थोड़ी सी बेवफाई (1978)
आंखों पर कुछ ऐसे तुमने जुल्फ गिरा दी है
बेचारे से कुछ ख्वाबों की नींद उड़ा दी है
फिल्म-जीवा (1986)
कोई मनचला गर पकड़ लेगा आंचल
कोई मनचला गर पकड़ लेगा आंचल
जरा सोचिये आप क्या कीजियेगा
फिल्म- मासूम (1983)
लगा दें अगर बढ़ के जुल्फों में कलियां
तो क्या अपनी जुल्फें झटक दीजियेगा
फिल्म- मासूम (1983)
शाम से आंख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है
एल्बम-मरासिम (1999)
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक्त की शाख से लम्हें नहीं तोड़ा करते
एल्बम-मरासिम (1999)
तुम आ गए हो नूर आ गया है
नहीं तो चरागों से लौ जा रही थी
फिल्म- आंधी (1975)
कोई होता जिसको अपना, हम अपना कह लेते यारों
पास नहीं तो दूर ही होता, लेकिन कोई मेरा अपना
फिल्म- मेरे अपने (1971)
उस रात नहीं फिर घर जाता, वो चांद यहीं सो जाता है
जब तारे जमीं पर चलते हैं, आकाश जमीं हो जाता है
फिल्म- घरौंदा (1977)
तेरी झोली डारूं, सब सूखी पात जो आए
तेरा छुआ लगे, मेरी सूखी डाल हरियाए
फिल्म- रुदाली (1993)
जिस तन को छूआ तूने उस तन को छुपाऊं
जिस मन को लागे नैना, वो किसको दिखाऊं
फिल्म- रुदाली (1993)