‘अपना अड्डा’ के इस बार के आयोजन में बिहार के दरभंगा में जन्मे अभिनेता दुर्गेश कुमार खास तौर से शरीक हुए। फिल्म ‘लापता लेडीज’ में निभाए गए अपने किरदार दुबेजी को लेकर इन दिनों दुर्गेश खूब चर्चा में हैं, ये फिल्म 1 मार्च को रिलीज हुई। और उससे ठीक पहले नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म ‘भक्षक’ में दुर्गेश और अभिनेता संजय मिश्रा का एक संवाद सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। दुर्गेश दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के 2009 बैच के पासआउट हैं और सिर्फ फिल्मों पर फोकस करने की बजाय अपना पूरा जीवन ही एक तरह से रंगमंच को समर्पित कर चुके हैं। ये और बात है कि अपने जीवन की पहली फिल्म मिलने के बाद उन्हें एनएसडी की रिपरटरी कंपनी से निकाल दिया गया था। दुर्गेश से ‘अमर उजाला’ की एक खास बातचीत।
Apna Adda 07: ‘पंचायत’ के विलेन ‘भूषण’ से खास मुलाकात, दुर्गेश ने सुनाई मुफलिसी से लेकर शोहरत तक की पूरी कहानी
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अभिनय में आपकी शुरुआत कैसे हुई?
मेरे पिता डॉ. हरिकृष्ण चौधरी दरभंगा, बिहार के सीएम आर्ट्स कॉलेज में कॉमर्स के प्रोफेसर रहे हैं। वह चाह रहे थे कि मैं पढ़ाई करके इंजीनियर बनूं। मैंने दरभंगा के सीएम साइंस कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई की। उस बीच मेरे बड़े भाई डॉ. शिवशक्ति चौधरी यूपीएससी की तैयारी करने दिल्ली आ गए। मैं भी उनके साथ 9 दिसंबर 2001 को दिल्ली आ गया। उन्होंने मेरे व्यक्तित्व विकास (पर्सनैलिटी डेवलमेंट) के लिए मुझे अजय कटारिया के उद्देश्य थियेटर ग्रुप में दाखिला दिला दिया। वहां मैंने 50 दिन तक अभिनय, भाव प्रकटन, आत्मविश्वास और तमाम दूसरी बारीकियां सीखीं। वहीं मैंने जीवन का पहला नाटक अजय शुक्ला लिखित 'ताजमहल का टेंडर' किया। इसमें मैंने चपरासी का किरदार निभाया था।
इतना आसान कहां होता है जीवन में कुछ भी हासिल कर पाना। मैं तो घर वालों की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए इंजीनियरिंग में दाखिले की ही तैयारी कर रहा था। तीन बार इम्तिहान दिया और तीनों बार फेल हुआ। मुझे लग गया कि विज्ञान और मेरी कुंडली मिलने वाली नहीं है। मैंने हिंदी साहित्य से स्नातक की पढ़ाई शुरू कर दी। 'ताजमहल का टेंडर' में तारीफ मिल ही चुकी थी तो इसके बाद मैं स्वतंत्र रूप से थियेटर करने लगा। रोहित त्रिपाठी के साथ नाटक 'महारथी कर्ण' किया। श्रीराम सेंटर ऑफ परफार्मिंग आर्ट्स एंड कल्चर से दो साल का डिप्लोमा भी किया। हिंदी साहित्य से स्नातक होने के बाद मैंने एनएसडी का फॉर्म भरा लेकिन मेरा चयन नहीं हुआ।
फिर..?
पहली बार जब मेरा चयन एनएसडी में नहीं हुआ तो एक साल तक और थियेटर किया। साल 2008 में मैंने एनएसडी दिल्ली, एफटीआईआई (फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट) पुणे और बीएनए लखनऊ (भारतेंदु नाट्य अकादमी) तीनों जगह आवेदन किया और इस बार मेरा चयन एनएसडी में हो गया। 2011 तक मैंने नाटकों के अलावा जीवन में कुछ नहीं किया। लेकिन, रंगमंच की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुझे अब बाहर काम नहीं मिल रहा था तो मैं एनएसडी की रिपरटरी कंपनी में नाटकों में काम करने लगा। इसी दौरान मुझे मेरे एक मित्र आकाश बड़दास ने निर्देशक राजकुमार हिरानी की फिल्म 'पीके’ के ऑडिशन के लिए बुलाया।
हां, उसी पर आ रहा था। फिल्म ‘पीके’ के किरदार के हिसाब से मेरी उम्र कम थी तो मेरा चयन नहीं हुआ। मेरी जगह पर राजेंद्र सिंह नानू चुने गए। इसी बीच मेरा ऑडिशन निर्देशक इम्तियाज अली तक पहुंचा और उन्होंने मुझे 'हाईवे' के लिए चुन लिया। साल 2013 की बात है, मैं दिल्ली में भारत रंग महोत्सव में हिस्सा ले रहा था।। यहां मुकेश छाबड़ा और इम्तियाज अली मिलने आए, वहीं के वहीं मेरा कॉस्ट्यूम ट्रायल हुआ। इम्तियाज अली ने बस इतना कहा कि एक महीना है, गाड़ी चलाना सीख लो। मुझे ये फिल्म मिल तो गई लेकिन फिल्म करने के ‘जुर्म’ में रिपरटरी कंपनी से निकाल दिया गया।