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Bioscope S2: 46 साल पहले ‘आंधी’ को लेकर हुआ था तांडव, इन वजहों से बनी हिंदी सिनेमा की कालजयी फिल्म

Sun, 14 Feb 2021 01:11 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sun, 14 Feb 2021 01:11 AM IST
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Aandhi Bioscope: A political movie you cannot miss
फिल्म आंधी का पोस्टर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

फिल्म ‘आंधी’ पता नहीं किस मुहूर्त में बननी शुरू हुई। इसके बनने के पहले से लेकर बनने के बाद तक इसके इतने अफसाने बने कि इन पर अलग से एक फिल्म बन सकती है। फिल्म की शूटिंग के दौरान संजीव कुमार का सुचित्रा सेन पर निछावर हो जाना। गुलजार का बीच बचाव करना। फिर राखी का गुलज़ार से सवाल करना और बात इतनी बढ़ना कि दोनों का ‘बसेरा’ ही साथ न रहना। किसी एक फिल्म ने किसी का घर बिगाड़ दिया हो, ऐसा कम ही सुना गया है। और, किसी एक फिल्म ने अपने अपने हुनर के उस्ताद दो दोस्तों के किस्से बना दिए हों, ऐसा भी कहां सुनने को मिलता है। कमलेश्वर और गुलजार, साहित्य की दो धाराओं के खेवैया रहे हैं। दोनों की नावें अपने अपने किनारों पर कामयाबी की तमाम इबारतें फहरा चुकी हैं। लेकिन, यही एक फिल्म ‘आंधी’ है जिसकी चर्चा जब भी होती है, कमलेश्वर की ‘काली आंधी’ का जिक्र भी आ ही जाता है। दोनों की कहानियां अलग अलग हैं। दोनों के तेवर अलग अलग हैं। लेकिन, सवाल दोनों की लिखावट को लेकर एक ही रहा है, जिसका जवाब देने की गुलजार ने अलग अलग मौकों पर खूब कोशिशें भी कीं।


 

Aandhi Bioscope: A political movie you cannot miss
फिल्म आंधी का दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

किसने लिखी ‘आंधी’?
सबा महमूद बशीर को दिए इंटरव्यू में गुलजार कहते हैं, ‘ये साफ करने की बहुत जरूरत है कि ‘आंधी’ की शुरूआत कैसे हुई? इस बारे में थोड़ा भ्रम लोगों में रहा है और ये इसके बावजूद रहा कि कमलेश्वरजी ने अपने जीतेजी इस बारे में स्थिति साफ कर दी थी। कमलेश्वर जी और मैं अच्छे मित्र रहे हैं। एक दिन उन्होंने पूछा कि क्या मैं निर्देशन करना चाहता हूं, अगर ऐसा है तो उनके पास एक कहानी है। दक्षिण भारत का एक निर्माता इसे बनाना चाहता था। मैंने यही कहा कि मैं खुद को सौभाग्यशाली समझूंगा अगर मैं उनकी कहानी निर्देशित करने का मौका पा सका। हमने इसकी पटकथा पर काम करने का फैसला किया और उन्होंने निर्माता मल्लिक अर्जुन राव (मल्ली साब) से मुलाकात तय कर ली। लेकिन, मल्ली साब को कमलेश्वर जी की लिखी कहानी पसंद नहीं आई। कहानी बहुत खूबसूरत थी। एक होटल में इसकी पृष्ठभूमि रखी गई थी और सामाजिक स्थिति का इसमें अच्छा खाका खींचा गया था। भूषण बनमाली के पास भी उस समय एक आइडिया था, शायद ए जे क्रोनिन के एक उपन्यास से ये प्रेरित था। मल्ली साब को वह पसंद आया। लेकिन भूषण ने तब माहौल को संभालते हुए कहा कि अभी उनके पास सिर्फ विचार है। इस पर फिल्म हम सब मिलकर तैयार करेंगे। ये विचार बाद में ‘मौसम’ की शक्ल में विकसित होकर सामने आया। तब मैं ‘आंधी’ पहले से लिख रहा था। तय ये हुआ कि भूषण के सुनाए विचार पर सब मिलकर कहानी विकसित करेंगे और मैं साथ साथ ‘आंधी’ भी लिखता रहूंगा। कमलेश्वर जी ने दोनों कहानियों पर उपन्यास लिखे। एक का नाम रखा ‘काली आंधी’ और दूसरी का ‘आगामी अतीत’ जो दरअसल मेरा ही सुझाया नाम था।’

Aandhi Bioscope: A political movie you cannot miss
फिल्म आंधी का दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

राखी और गुलजार के बीच आई ‘आंधी’
दोस्तों के काम को लेकर हुए भ्रम के अलावा एक भ्रम फिल्म ‘आंधी’ की शूटिंग के दौरान गुलजार की पत्नी राखी को भी हुआ। राखी की पहली शादी सिर्फ 16 साल की उम्र में बंगाली फिल्म निर्देशक और पत्रकार अजय बिस्वास से हुई थी। यह शादी चल नहीं पाई। जिस वक्त राखी ने फिल्मों में अपनी शुरुआत की, गुलजार उस समय फिल्में लिखने के मामले में एक बड़ा नाम बन चुके थे। साथ ही वह अभिनेत्री मीना कुमारी के साथ संबंधों को लेकर भी चर्चा में रहे। उसी दौरान एक फिल्मी पार्टी में राखी की मुलाकात गुलजार से हुई। बताया जाता है कि गुलजार पहली ही मुलाकात में राखी को अपना दिल दे बैठे थे। इन दोनों ने बात को आगे बढ़ाने में बिल्कुल भी देर नहीं की और वर्ष 1973 में ही शादी कर ली। राखी शादी के बाद फिल्मों में काम करना चाहती थीं जबकि गुलजार ऐसा नहीं चाहते थे। ये उन दिनों की बात है जब गुलजार अपनी फिल्म 'आंधी' के लिए कश्मीर गए। उनके साथ राखी भी गईं। पुरानी पत्रिकाओं में जिक्र मिलता है कि फिल्म के मुख्य कलाकार संजीव कुमार ने एक शाम शराब थोड़ी ज्यादा पी ली। ये देखते हुए सुचित्रा अपने कमरे में जाने लगीं लेकिन संजीव ने उनका हाथ पकड़ लिया और जाने नहीं दिया। जब इन दोनों के बीच में थोड़ी छीना झपटी होने लगी है तो बीच में गुलजार आ गए। गुलजार ने संजीव से सुचित्रा का हाथ छुड़ाया और उन्हें उनके कमरे तक छोड़ने गए। सुचित्रा को कमरे में छोड़कर गुलजार वापस आ रहे थे तो रास्ते में राखी खड़ी हुई थीं। इसके बाद जो कुछ हुआ, उसके तमाम अफसाने हैं। कोई कहता है गुलजार ने उस दिन राखी पर हाथ उठा दिया था तो कोई कुछ। गुलजार ने अपनी गलती भी बाद में मानी। सब कुछ किया। लेकिन, राखी टस से मस न हुईं। फिल्म ‘आंधी’ ने ही उनका घर तबाह कर दिया, जिसका नाम उन्होंने ‘बसेरा’ रखा था।

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फिल्म आंधी का दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

दिल्ली से गुजरात तक सियासी ‘आंधी’
तीसरी ‘आंधी’ इस फिल्म को लेकर सियासत में आई। गुलजार ये मानते हैं कि इस फिल्म को बनाते समय उन्होंने सुचित्रा सेन को उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाव भाव समझने के लिए कहा था। लेकिन बस एक संदर्भ के लिए। फिल्म की कहानी किसी भी तरह से इंदिरा और फीरोज के प्रेम की कहानी नहीं थी। लेकिन, समय उस समय ऐसा था कि कोई किसी की सुनता कहां था। हर वितरक को बस थिएटर से पैसा चाहिए होता था। दक्षिण भारत के किसी उतावले फिल्म वितरक ने पोस्टर चिपकवा दिए जिन पर लिखा होता, ‘परदे पर देखिए अपनी प्रधानमंत्री को’। वहीं दिल्ली के एक अखबार में विज्ञापन छपा, ‘आजाद भारत की एक महान महिला नेता की कहानी’। लोगों को गॉसिप करने का मसाला मिल रहा था तो बताते हैं इंदिरा गांधी ने अपने दो विश्वस्त सिपहसालारों को ये फिल्म देखने को कहा। फिल्म देखी गई। उस समय के सूचना और प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल को भी फिल्म पसंद आई। किसी को कहीं से भी इसमें कोई खोट नहीं दिखा। लेकिन सियासी ‘तांडव’ शुरू होने में देर ही कितनी लगती है। गुजरात में चुनाव था और विपक्षी पार्टियों ने फिल्म के वे सीन लोगों के बीच खूब प्रचारित किए गए जिनमें सुचित्रा सेन शराब और सिगरेट का सेवन करते दिखती हैं। ऊपर से फिल्म में सुचित्रा सेन का रहन सहन और लुक्स बिल्कुल इंदिरा गांधी जैसे। मामला बिगड़ता देख फिल्म ‘आंधी’ पर इंदिरा सरकार ने तब बैन लगा दिया जब वह पांच हफ्ते बाद सिनेमाघरों में अपनी सिल्वर जुबली मनाने वाली थी। फिल्म किसी तरह से इंदिरा गांधी की जीवनी न लगे, इसके लिए इसमें फेरबदल भी किए गए। लेकिन, बात बनी नहीं। बाद में खैर इंदिरा सरकार ही नहीं रही। केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी तो फिल्म ‘आंधी’ पूरे देश ने अपने घरों में बैठकर अपने टेलीविजन पर देखी।
 

 

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फिल्म आंधी के गाने - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

‘आंधी’ समय से पार के सिनेमा की
और, जिन्होंने भी ये फिल्म देखी है उनको कुछ याद रह जाता है तो फिल्म में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन की बेमिसाल अदाकारी। और, राहुल देव बर्मन का संगीत। फिल्म ‘आंधी’ की गिनती हिंदी सिनेमा की क्लासिक्स में होती है। जैसा कि हर कालजयी फिल्म के साथ होता ही है, इसके साथ भी ये हुआ कि वितरकों को इसकी धार ही समझ न आए। वह आखिर तक इसी सोच में उलझे रहे कि इसे आर्ट फिल्म की तरह प्रचारित करें या कि कमर्शियल सिनेमा की तरह। फिल्म का संगीत अपने समय का सुपरहिट संगीत बना। आर डी बर्मन का म्यूजिक इसे आर्ट फिल्म बनने नहीं देता और सुचित्रा सेन व संजीव कुमार को जिस तरह परदे पर गुलजार ने पेश किया, वह कमर्शियल सिनेमा के उस दौर के खांचे में फिट नहीं होता था। फिल्म के गाने ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं..’ ‘तुम आ गए हो नूर आ गया है..’ और ‘इस मोड़ से जाते हैं..’ ऐसे गाने हैं, जिनके तेवर आज तक लोग नहीं भूले हैं। गुलजार ने इन गानों का चित्रण परदे पर ऐसे किया है जैसे जिंदगी उनके कैमरे की रील को पगडंडी बनाकर बस चल पड़ी है एक ऐसे सफर पर जिसमें मंजिल का पता उसको भी नहीं है। वह बस सफर का सुख पाना चाहती हैं।

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