बुजुर्ग माता-पिता की अनदेखी करने वाले बच्चे हाल के दिनों में अखबारों की खूब सुर्खियां बनते रहे हैं। अदालती आदेशों के बाद हालांकि अब माता पिता को बेसहारा छोड़ने की खबरें कम हुई हैं, लेकिन ज्यादा बरस नहीं हुए जब ऐसे किस्से हर दूसरी गली में देखने को मिल जाते थे। अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी जब फिल्म नास्तिक के 20 साल बाद फिल्म बागबान के लिए एक साथ परदे पर आए थे तो इस फिल्म ने भी खूब सुर्खियां बटोरी थीं। अपने माता पिता का ख्याल न रखने वाली संतानों के ऐसे ही किस्सों पर बनी एक फिल्म 27 जून 1986 को भी रिलीज हुई, नाम था अमृत। फिल्म को वैसे तो राजेश खन्ना और स्मिता पाटिल के भावुक कर देने वाले अभिनय ने कालजयी कर दिया। लेकिन पार्श्वगायक मोहम्मद अजीज के एक गाने ने इस फिल्म को हमेशा हमेशा के लिए अमर कर दिया। यह भी दुखद रहा कि जिस साल ये फिल्म रिलीज हुई उसी साल दिसंबर में स्मिता अपने बच्चे को जन्म देने के बाद दुनिया छ़ोड़ गईं।
बाइस्कोप: मो. अजीज के गाने 'दुनिया में कितना..' ने सुपरहिट कराई फिल्म अमृत, इस हॉलीवुड मूवी की रीमेक
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निर्देशक मोहन कुमार ने फिल्म अमृत लिखी भी और प्रोड्यूस भी की। एमके एंटरप्राइजेज के बैनर तले अमृत बनाने से पहले मोहन कुमार ने ही राजेश खन्ना, शबाना आजमी और सचिन को लेकर एक और सुपरहिट फिल्म अवतार भी बनाई थी। दोनों फिल्मों में राजेश खन्ना ने उम्र के चौथेपन में बुजुर्गों के सामने आने वाली दिक्कतों को दर्शाने वाले किरदार निभाए और दोनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रहीं। मोहन कुमार वैसे तो साल 1961 से ही फिल्में बनाते आए और उनकी बनाई फिल्में आई मिलन की बेला, आप आए बहार आई, मोम की गुड़िया हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती हैं। लेकिन, फिल्म अवतार में उन्होंने अपना स्टाइल बदला। अवतार और अमृत के बीच मोहन कुमार ने कुमार गौरव और रति अग्निहोत्री को लेकर क्रिकेट पर एक फिल्म ऑलराउंडर भी बनाई लेकिन ये फिल्म फ्लॉप रही।
मोहन कुमार को फिल्म अमृत का विचार कैसे और कहां से आया, इसके बारे में तो ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन, ऐसी ही कहानी या इससे मिलती जुलती कहानी पर तमाम फिल्में बनी हैं। इसका सबसे आखिरी उदाहरण तो अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी की फिल्म बागबान ही है। लेकिन इस कहानी पर बनी फिल्मों का सिलसिला साल 1937 से चला आ रहा है जब हॉलीवुड निर्देशक लिओ मैककैरी ने फिल्म बेक वे फॉर टुमारो बनाई थी। फिल्म में बुजुर्ग दंपती के रूप में दिखे विक्टर मूर और बेउला बोंडी के कमाल के अभिनय ने इस फिल्म को अमर कर दिया। दंपती के पांच बच्चे होते हैं लेकिन कोई भी दोनों को एक साथ रखना नहीं चाहता। निर्देशक मैककैरी का हमेशा यही मानना रहा कि ये फिल्म उनके करियर की सबसे अच्छी फिल्म बनी। और, इसका जिक्र उन्होंने ऑस्कर पुरस्कार समारोह के मंच पर भी किया जब उन्हें बेस्ट डायरेक्टर का ऑस्कर फिल्म द ऑफुल ट्रुथ के लिए मिला था। मेक वे फॉर टुमारो और द ऑफुल ट्रुथ एक ही साल रिलीज हुई फिल्में हैं। द ऑफुल ट्रुथ के लिए पुरस्कार लेने के बाद मैककैरी ने मंच से कहा, ‘धन्यवाद, लेकिन आपने ये पुरस्कार मुझे गलत पिक्चर के लिए दिया।’
इस फिल्म का सिरा भारत से जुड़ता दिखता है कन्नड़ में 1958 में बनी फिल्म स्कूल मास्टर से। फिल्म को तमिल में एंगल कुदुंबम् पेरिसु के नाम से साथ में ही डब करके रिलीज किया गया। फिल्म बाद में तेलुगू में अलग से भी बनी। इसका मलयालम और हिंदी में भी रीमेक हुआ। डिक्की माधवराव, उदय कुमार, सिवाजी गणेशन, जेमिनी गणेशन और बी सरोजा देवी अभिनीत ये पहली कन्नड़ फिल्म है जो सिनेमाघरों में 25 हफ्ते लगातार चली। फिल्म के मेकर्स के मुताबिक उन्होंने ये फिल्म मराठी के मशहूर साहित्यकार कुसुमाग्रज की कहानी वैष्णवी पर बनाई।
हिंदी में बुजुर्ग दंपती के अपने ही बच्चों के हाथों अपमानित होकर रहने की थीम पहले पहल संजीव कुमार की फिल्म जिंदगी में दिखाई देती है। फिल्म में उनके साथ माला सिन्हा, विनोद मेहरा, अरुणा ईरानी, देवेन वर्मा, मौसमी चटर्जी आदि की महत्वपूर्ण भूमिकाएं हैं। इस फिल्म को सीधे सीधे मेक वे फॉर टुमारो पर ही आधारित माना गया। फिल्म के निर्देशक रवि टंडन ने जिंदगी की कहानी को नए सिरे से लिखने के लिए सचिन भौमिक जैसे सिद्धहस्त पटकथा लेखक को लगाया। फिल्म के संवाद सागर सरहदी ने लिखे थे। जहां बाकी की फिल्मों में बुजुर्ग दंपती को लाइन पर लाने के लिए हालात का सहारा लिया गया, यहां रवि टंडन ने मौसमी चटर्जी और विनोद मेहरा के किरदारों को कहानी का सरप्राइज बना दिया। बाद में रवि चोपड़ा ने जब इसी कहानी पर बागबान बनाई तो वहां सलमान खान का किरदार कहानी के सरप्राइज आइटम के तौर पर डाला गया।
फिल्म अमृत बाकी फिल्मों से यहां इसलिए अलग दिखती है क्योंकि यहा राजेश खन्ना और स्मिता पाटिल के किरदार फिल्म की शुरूआत से ही अलग अलग घरों में होते हैं। वह दंपती भी नहीं है। हां, कहानी आगे बढ़ने के साथ दोनों एक दूसरे के साथ आ जाते हैं। अपने अपने घरों में अपने बेटों और बहुओं से बेइज्जत होते अमृत और कमला अपने पोते पोती की वजह से मिलते हैं। जल्द ही दोनों को एक दूसरे के हालात का अंदाजा होता है और दोनों एक दूसरे की भावनाएं समझने लगते हैं। स्मिता पाटिल ने 30 साल की उम्र में एक दादी का किरदार निभाया। राजेश खन्ना भी तब बस 44 के ही थे। लेकिन दोनों ने अपनी अपनी उम्र से कहीं बड़े किरदार निभाकर लोगों की वाहवाही लूटी और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर दोनों हाथों से दौलत बटोर ली।
स्मिता पाटिल का इस फिल्म में आना संयोग ही रहा क्योंकि अवतार के तुरंत बाद जब ये फिल्म मोहन कुमार ने शुरू की तो इसका नाम था अपराधी और फिल्म में हीरोइन थी शबाना आजमी जिनके साथ मोहन कुमार ने अवतार बनाई थी। राजेश खन्ना और स्मिता पाटिल ने इससे पहले नजराना, अंगारे, अनोखा रिश्ता और आखिर क्यों में भी साथ काम किया। राजेश खन्ना ने रोल भले अमृत में दादाजी का किया हो लेकिन उनके चेहरे पर भोलापन वैसा ही दिखा जैसा उनके चेहरे पर हमेशा दिखाई दिया। खासतौर से फिल्म के एक गाने में जब वह मुखौटा लगाकर बच्चों के साथ पार्क में गाना गा रहे होते हैं तो उनकी ऊर्जा देखते ही बनती है...
जैसा कि मैंने आज के बाइस्कोप के शुरू में ही बताया था कि फिल्म अमृत को फिल्म में मोहम्मद अजीज के गाए गाने ‘दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है’ से बहुत शोहरत मिली। आनंद बक्षी का लिखा और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीतबद्ध किया ये गाना मोहम्मद अजीज ने गाया भी इसमें पूरी तरह डूबकर है। मोहम्मद अजीज शुरू से गायक मोहम्मद रफी को अपना आदर्श और अपना गुरू मानते रहे। अपने निधन से पहले दिए अपने आखिरी इंटरव्यू में मोहम्मद अजीज ने अपनी शोहरत और अपनी गुरबत की तमाम यादें अमर उजाला के पाठकों के साथ साझा की थीं। अपने चाहने वालों से बेपनाह मोहब्बत पाने वाले इस गायक का ये वीडियो इंटरव्यू उनका आखिरी इंटरव्यू है। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।
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