साल 1997 हिंदी सिनेमा के संगीत की दो बड़ी घटनाओं के लिए याद किया जाता है। एक है टी सीरीज म्यूजिक कंपनी के संस्थापक गुलशन कुमार की 12 अगस्त को हुई नृशंस हत्या और दूसरा सिलवासा में टिप्स म्यूजिक कंपनी की दूसरी फैक्ट्री की शुरूआत। टिप्स की कैसेट बनाने की पहली फैक्ट्री 1990 में पालघर में लगी थी। इन दोनों घटनाओं का जिक्र यहां इसलिए क्योंकि 20वीं सदी का आखिरी दशक हिंदी सिनेमा के लिए काफी उथल पुथल वाला दशक रहा और इस उथल पुथल का केंद्र हुआ करते थे हिंदी फिल्मों के म्यूजिक राइट्स। म्यूजिक कंपनी मोटी रकम देकर किसी फिल्म के राइट्स खरीदतीं और म्यूजिक रिलीज होने के 24 घंटे के भीतर पूरे देश में उसी फिल्म के हू ब हू डिजाइन वाले नकली कैसेट दुकानों पर पहुंच जाते। ऐसे में एक शख्स ने क्रांतिकारी विचार दिया टिप्स म्यूजिक कंपनी के मालिक रमेश तौरानी। ये आइडिया था कि क्यों न म्यूजिक कंपनी का नाम कैसेट में छापने की बजाय इसमें मोल्ड कर दिया जाए। इस शख्स का नाम था वाशू भगनानी और टिप्स उनके विचार पर हां या ना का फैसला ले पाए, उससे पहले ही ये शख्स विदेश जाकर इसका सांचा बनवा लाया।
बाइस्कोप: रिलीज के 25 साल पूरे करने वाली कुली नंबर वन का ये है अभिषेक बच्चन से कमाल का कनेक्शन
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वाशू भगनानी के इस दूरगामी विचार ने देश में म्यूजिक कंपनियों की दशा और दिशा दोनों बदल दी। टिप्स से टेप बनाने के इनको भी इतने ऑर्डर मिले कि इनकी माली हालत रातोंरात बदल गई। कैसेट बनाने और बेचने के दिनों में ही वाशू किसी काम से चेन्नई में थे। वहां उन्होंने एक फिल्म देखी और वहां से मुंबई लौटे तो उसे हिंदी में बनाने के राइट्स लेकर। ये फिल्म थी चिन्ना मपील्लाई और इसकी रीमेक रिलीज हुई कुली नंबर वन के नाम। वाशू भगनानी की बतौर निर्माता ये पहली फिल्म रही और इसके बाद तो नंबर वन वाली फिल्मों की उन्होंने लाइन लगा दी। कुली नंबर वन 30 जून 1995 को रिलीज हुई थी और इसने मंगलवार को रिलीज के 25 साल पूरे किए। ये फिल्म ही हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।
वाशू भगनानी म्यूजिक इंडस्ट्री के बड़े बिजनेसमैन बन चुके थे। उत्तर प्रदेश से उनका खासा रिश्ता रहा, उनकी ससुराल लखनऊ की है। उनके काफी दोस्त यार कानपुर और वाराणसी के भी हैं। मुंबई में उनका आना जाना था मशहूर निर्माता नंदू तोलानी के यहां। नंदू तोलानी ने ही डेविड धवन को बतौर निर्देशक और गोविंदा को हीरो लेकर फिल्म बनाई थी स्वर्ग। 1990 में रिलीज हुई राजेश खन्ना, गोविंदा, जूही चावला और माधवी स्टारर इस फिल्म ने गोविंदा के लड़खड़ाते करियर को रीमेक का मजबूत आधार दिया। फिल्म 1960 में रिलीज हुई तमिल फिल्म पदिक्कदा मेदाई पर आधारित थी। इसी फिल्म की कहानी के आधार पर 1967 में अशोक कुमार की फिल्म मेहरबान भी बनी थी। डेविड धवन तब तक गोविंदा की ज़िंदगी में आ चुके थे। दोनों की पहली फिल्म ताकतवर 1989 में रिलीज हो चुकी थी। तो वाशू भगनानी ने जब नंदू तोलानी को बताया कि वह चेन्नई से एक बहुत ही कमाल की फिल्म के रीमेक राइट्स खरीदकर लौटे हैं तो नंदू तोलानी ने झट से गोविंदा का नाम आगे कर दिया। गोविंदा और डेविड धवन ने निर्देशक-अभिनेता की जोड़ी में 17 फिल्में एक साथ काम की हैं, हिंदी सिनेमा का ये एक अनोखा रिकॉर्ड भी है।
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वाशू भगनानी तो फिल्म आंखें के बाद से ही डेविड धवन के पीछे लगे हुए थे। डेविड को भी वाशू भले इंसान लगे दोनों की बैठकें होने लगीं और गाड़ी चल निकली। नंदू तोलानी के कहने पर गोविंदा भी फिल्म में आ गए। प्रोजेक्ट पूरा वहीं बैठकर वाशू भगनानी ने सेट कर दिया। फिल्म के लिए वाशू ने बेहतरीन लोगों की टीम तैयार की। फिल्म की राइटिंग टीम में रूमी जाफरी और कादर खान आए, सिनेमैटोग्राफी के लिए शानदार सिनेमैटोग्राफर राजन किनागी को साइन किया गया और फिल्म की एडीटिंग के लिए टीम में आए ए मथु। सलमान खान की फिल्म बागी से हिंदी सिनेमा में फिल्म एडीटिंग शुरू करने वाले ए मुथ ने डेविड धवन की तमाम हिट फिल्मों की एडीटिंग की है। शाहरुख खान की पहली फिल्म दीवाना की एडीटिंग भी उन्होंने ही की थी। वाशू भगनानी की ए मुथु से खूब पटने लगी और उन्होंने अभिषेक बच्चन व कीर्ति रेड्डी स्टारर अपनी फिल्म तेरा जादू चल गया का निर्देशन भी ए मुथु से ही करवाया।
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फिल्म कुली नंबर वन में गोविंदा अपने पूरे चुहलभरे अंदाज में नजर आए। करिश्मा कपूर के साथ उनकी जोड़ी खूब पसंद की गई। दोनों की जोड़ी पहली बार फिल्म राजा बाबू में साल 1994 में परदे पर दिखी और दोनों की केमिस्ट्री ऐसी जमी कि दोनों की लगातार छह फिल्में राजा बाबू, कुली नंबर वन, हीरो नंबर वन, हसीना मान जाएगी, साजन चले ससुराल और खुद्दार हिट रहीं। आखिरी दो फिल्में दर्शकों को थोड़ा कमजोर लगीं और इसके बाद रिलीज हुई चारों फिल्में शिकारी, मुकाबला, दुलारा और प्रेम शक्ति में दोनों का करिश्मा फीका पड़ गया। कुली नंबर वन अपनी अतरंगी सी कहानी और इसको पेश करने के डेविड धवन के तरीके के चलते लोगों को खूब पसंद आई। गोविंदा अच्छे खासे ठीक ठाक घर से थे। लेकिन, उन्होंने अपनी छवि उन दिनों एक सड़कछाप हीरो की बना रखी थी। ब्रांडिंग उन्होंने अपनी कर रखी थी विरार के छोकरे के नाम से। एक तरफ विरार का छोकरा और दूसरी तरफ हिंदी सिनेमा के सबसे रईस कपूर खानदान की बेटी। दर्शकों को ये समीकरण जम गया और टिकट खिड़की पर पैसा बरसने लगा। जब तक लोगों को समझ आया कि मामला क्या है, तमाम प्रोड्यूसर वाशू भगनानी की तरह दोनों हाथों से दौलत बटोर चुके थे।
वाशू भगनानी की शुरू की फिल्में अगर देखेंगे तो हर फिल्म में म्यूजिक कमाल का रहा। वाशू खुद म्यूजिक इंडस्ट्री से बरसों से जुड़े रहे तो उनको गाने सुनते सुनते अच्छे बुरे की पहचान भी बढ़िया हो गई थी। वह गाना सुनकर ये बता सकते थे कि ये गाना चलेगा कि नहीं चलेगा। कुली नंबर वन का संगीत बनाने की जिम्मेदारी मिली आनंद मिलिंद को। कम लोगों को ही पता होगा कि आनंद मिलिंद को पहला बड़ा ब्रेक अपने करियर का गोविंदा की साइन की हुई पहली फिल्म तन बदन में ही मिला था। 1986 में रिलीज हुई तन बदन गोविंदा की सिनेमाघरों में रिलीज हुई तीसरी फिल्म रही। हालांकि आनंद मिलिंद की साइन की हुई पहली फिल्म थी अब आयेगा मजा, जिसमें फारुख शेख व अनीता राज लीड रोल में थे और फिल्म का निर्देशन किया था पंकज पाराशर ने। बाद में साल 1988 में फिल्म कयामत से कयामत तक में आनंद मिलिंद ने जो धमाका किया, उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मेलोडी वाला मस्त म्यूजिक बनाने वाले आनंद मिलिंद का गोविंदा की फिल्मों स्वर्ग और राजा बाबू का म्यूजिक सुपरहिट रहा था। वाशू भगनानी ने इसीलिए इसी जोड़ी को कुली नंबर वन में रिपीट कर दिया और फिल्म रिलीज होने से पहले ही फिल्म के गाने हिट हो गए। नई सिंगर चंदना दीक्षित और अभिजीत के गाए इस गाने ने तो उन दिनों हंगामा बरपा दिया था।
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टिप्स म्यूजिक कंपनी को इस फिल्म के संगीत ने बहुत फायदा पहुंचाया। ये उन दिनों की बात है जब टिप्स कंपनी आर के इलेक्ट्रॉनिक्स खरीद चुकी थी। कुली नंबर वन के बाद के सालों में टिप्स ने वीडियो मास्टर, टाइम मैगनेटिक्स और वेस्टन जैसी म्यूजिक कंपनियों की पूरी ऑडियो लाइब्रेरी खरीद डाली। और, साल 1999 तक आते आते टिप्स हिंदी सिनेमा के इतिहास में सुभाष घई की फिल्म ताल का म्यूजिक छह करोड़ रुपये में खरीद कर नंबर वन कंपनी बन गई। फिल्म कुली नंबर वन का नाम यही क्यों रखा गया इसकी भी दिलचस्प कहानी है। फिल्म जब बननी शुरू हुई तो इसका नाम सिर्फ कुली ही था। वाशू भगनानी ने बड़ी कोशिशें कीं कि अमिताभ बच्चन की फिल्म कुली बनाने वाली कंपनी एमकेडी कंबाइंस उन्हें ये टाइटल दे दे, लेकिन वे नहीं माने। फिर गोविंदा ने सुझाया कि इसके आगे नंबर वन जोड़ देते हैं। बस यहीं से नंबर वन वाली फिल्मों का सिलसिला चल निकला।
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