Short Review: डिसकनेक्टेड
हिंदी सिनेमा में सोहैल तातारी का नाम उनकी दोनों फिल्मों के चलते बड़ी ही इज्जत से लिया जाता है। सोहैल ने अपनी फिल्मों ‘समर 2007’ और ‘अंकुर अरोरा मर्डर केस’ से ये साबित किया कि वह हिंदी सिनेमा के फॉर्मूला फिल्ममेकर नहीं है। वह काम के पीछे भागने वाले तकनीशियन भी नहीं है। वह रुकते हैं, इंतज़ार करते हैं और जब ‘डिसकनेक्टेड’ जैसी कोई भावुक कहानी सामने आती है, वह फ्रंटफुट पर आकर सिक्सर मारते हैं। सोहैल तातारी जैसे निर्देशक बदलते वक़्त के मिजाज़ को भांपने वाले फिल्ममेकर हैं। ये और बात है कि उन जैसे निर्देशकों की तरफ फॉर्मूला हिंदी फिल्में बनाने वाली कंपनियों की नज़र कम ही जाती है।
Disconnected Review: मोबाइल युग में बिखरते रिश्तों का बेहतरीन ताना बाना लेकर लौटे सोहैल तातारी
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फिल्म ‘डिसकनेक्टेड’ मोबाइल जेनरेशन की फिल्म है। ये उस समय को दर्शाती है जब हमारी सुबह और हमारी रात मोबाइल पर थिरकती अंगुलियों से होती है। स्क्रीन और अंगुलियों की थिरकन के बीच फंसी ज़िंदगी में रिश्ते नाते, प्यार वफ़ा अब बातें भी नहीं रह गई हैं। अच्छी खासी आकांक्षा किटेन हो चुकी है। बिटिया उसकी अपनी पसंद का सेक्स पार्टनर चुनने लायक हो चुकी है। आकांक्षा के वैवाहिक जीवन में रस बचा नहीं है। सो वह नया पार्टनर तलाश रही है। पार्टनर मिल भी जाता है। आकांक्षा के पति परिमल के चेहरे पर भी परिवार के लिए प्यार कम और धंधे का तनाव ज्यादा है। बिटिया को किसी तरह इन दोनों से अलग होकर अपने दोस्तों के साथ समय बिताना है।
लार्ज शॉर्ट फिल्म्स के यूट्यूब चैनल पर रिलीज हुई शॉर्ट फिल्म ‘डिसकनेक्टेड’ की मनधीर साहनी की लिखी कहानी ने इसके लिए आधार मजबूत तैयार किया है। सोहैल तातारी किरदारों के भीतर घुमड़ते भावों को चेहरे पर दर्शाने के मास्टर माने जाते हैं। निर्देशन का ये मास्टर स्ट्रोक उनका यहां भी दिखता है। हां, गुल पनाग की कास्टिंग थोड़ी गड़बड़ है या फिर हो सकता है कि उन्होंने ये फिल्म बहुत हड़बड़ी में कर ली हो क्योंकि उनके चेहरे की असल मासूमियत यहां दिखती नहीं है जो आकांक्षा के किरदार में जान डाल सकती थी।
परिमल के किरदार के लिए सत्यजीत मिश्रा बिल्कुल परफेक्ट हैं। वह अपने हर सीन को उठाते हैं। घर में बिस्तर में सोती पत्नी को देखते हुए काम पर जाने की तैयारी हो या फिर रेस्तरां में अपनी पत्नी के सामने अचानक आने का किस्सा, उनका अभिनय बहुत ही प्राकृतिक रहता है। रिया के रोल में महक ठाकुर ठीक हैं। अपनी दोस्त के साथ कुछ वक्त बिताने के अपने माता पिता के एतराज के बाद के दृश्यों में उन्होंने काफी मेहनत की है, आने वाले दिनों में उनसे बेहतर अभिनय की उम्मीद रहेगी।
प्रशांत नैयर ने फिल्म का साउंड डिजाइन बहुत ही अच्छा किया है। प्रकाश कुट्टी की सिनेमैटोग्राफी ने सोहैल तातारी को अपना कथन प्रभावी बनाने में काफी मदद की है। प्रकाश को काफी मदद अपनी लाइटिंग टीम से भी मिली है। शॉर्ट फिल्म की चुस्ती का श्रेय इसके एडीटर कुलदीप को भी मिलना चाहिए। अनीशा अपनी कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग से प्रभावित करती हैं। दफ्तर से घर या घर से दफ्तर जाते समय सप्ताह के दिनों में मनोरंजन के लिए ये एक बढ़िया फिल्म है।