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बाइस्कोप: ‘दोस्ताना’ के 40 साल, शत्रुघ्न ने बिग बी को यूं जड़ा थप्पड़, वे पलटकर हाथ तक नहीं उठा पाए

Sun, 18 Oct 2020 12:45 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sun, 18 Oct 2020 12:45 AM IST
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dostana this day that year series by pankaj shukla 17 october 1980 bioscope Amitabh shatrughan khosla
दोस्ताना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

बाइस्कोप के इस सीजन में जब से मैंने 70, 80 और 90 के दशकों की फिल्मों, उनकी मेकिंग और उनसे जुड़े दिलचस्प किस्सों को लिखना शुरू किया, तब से पहली बार इतना लंबा ब्रेक लेना पड़ा। बात सेहत से जुड़ी रही लेकिन फिर भी बिना बताए लिए गए इस ब्रेक के लिए माफी चाहता हूं। आज मैं बताने जा रहा हूं निर्देशक राज खोसला की चर्चित फिल्म ‘दोस्ताना’ के कुछ दिलचस्प किस्से। महेश भट्ट ने राज खोसला की शागिर्दी में ही फिल्ममेकिंग के गुर सीखे और फिल्म ‘दोस्ताना’ की मेकिंग के दौरान ही महेश भट्ट और अमिताभ बच्चन के बीच पंगे हुए। 17 अक्टूबर 1980 को रिलीज हुई फिल्म ‘दोस्ताना’ हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है। फिल्म की रिलीज डेट आपको विकीपीडिया या फिर फिल्म से जुड़ी दूसरी साइट्स पर कुछ और भी मिल सकती है, लेकिन ये फिल्म 17 अक्टूबर को ही देश भर के सिनेमाघरों तक पहुंची थी। निर्देशक राज खोसला की इस आखिरी सुपरहिट फिल्म के निर्माता थे यश जौहर और इसी फिल्म से उनके प्रोडक्शन हाउस यानी धर्मा प्रोडक्शंस की नींव पड़ी जिसके कर्ताधर्ता करण जौहर ने बाद में इसी नाम से एक और फिल्म अभिषेक बच्चन, प्रियंका चोपड़ा और जॉन अब्राहम के नाम से बनाई।



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dostana this day that year series by pankaj shukla 17 october 1980 bioscope Amitabh shatrughan khosla
दोस्ताना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

बिहारी बाबू का बिंदास अंदाज
‘दोस्ताना’ के बाइस्कोप का एक संयोग ये भी है कि अभी दो दिन पहले ही, यूं ही संयोगवश शत्रुघ्न सिन्हा से भेंट हो गई। लोखंडवाला बैक रोड पर बने मूवी टॉवर के पोर्टिको में वह अपनी गाड़ी में बैठे थे और मैं उसी बिल्डिंग से बाहर निकला एक मित्र के यहां से रात का भोजन करके। दुआ सलाम के बाद बातें उनके बेटे लव के बिहार विधानसभा चुनाव की होने लगीं। शत्रुघ्न सिन्हा ने विस्तार से अपने बेटे की सीट का महत्व, उसकी भौगोलिक स्थित और उसकी जीत की संभावनाओं पर चर्चा की। बीजेपी नेता के तौर पर शत्रुघ्न सिन्हा से मेरी पहली मुलाकात बरेली में बीजेपी नेता संतोष गंगवार के घर पर हुई थी। उनका स्वभाव शुरू से वैसा ही रहा। न उनमें कभी अभिनेता के तौर पर मुझे किसी तरह का घमंड दिखा और न कभी बीजेपी सरकार में मंत्री बनने के बाद ही किसी तरह का अहंकार उन्होंने दिखाया। उनका जिनसे ‘दोस्ताना’ रहा, हमेशा एक जैसा रहा। बस, अमिताभ बच्चन को छोड़कर।

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दोस्ताना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

अमिताभ और शत्रुघ्न का कंपटीशन
अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा संघर्ष के दिनों के साथी हैं। दोनों फिल्म ‘परवाना’ में पहली बार एक साथ दिखे। फिर दोनों ने एक और कम चर्चित फिल्म ‘रास्ते का पत्थर’ में भी साथ काम किया। फिल्म ‘रास्ते का पत्थर’ की कहानी बाद में अनुराग बासु ने अपनी फिल्म ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ में दोहाराई। 1972 में रिलीज हुई फिल्म ‘रास्ते का पत्थर’ में मुकेश का गाया गाना, ‘रास्ते का पत्थर किस्मत ने मुझे बना दिया, जो रास्ते से गुजरा एक ठोकर लगा गया...’ अपने जमाने का सुपरहिट गाना रहा है। मुकेश के प्रशंसकों का ये अब भी फेवरिट गीत है। इन गुमनाम सी फिल्मों के अलावा अमिताभ और शत्रुघ्न सिन्हा ने ‘काला पत्थर’, ‘दोस्ताना’, ‘शान’ और ‘नसीब’ में साथ काम किया है। इन फिल्मों के बारे में खासियत ये रही कि हर बार शत्रुघ्न सिन्हा को अमिताभ बच्चन से ज्यादा तालियां मिलीं। इन फिल्मों की आउटडोर शूटिंग के दौरान भी लोग जब शत्रुघ्न सिन्हा को देखकर अमिताभ से ज्यादा सीटियां बजाते तो अक्सर अमिताभ परेशान हो जाते। ‘काला पत्थर’ की शूटिंग के दौरान इसके चलते क्या हो चुका है, ये मैं आपको फिल्म ‘काला पत्थर’ के बाइस्कोप में बता ही चुका हूं।

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दोस्ताना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

सलीम-जावेद की कहानी
सलीम-जावेद की लिखी फिल्म ‘दोस्ताना’ कहानी है दो ऐसे दोस्तों की जिनकी पढ़ाई तो साथ में हुई लेकिन एक बन गया पुलिस इंस्पेक्टर विजय और दूसरा वकील रवि। दोनों अपने अपने पेशों की बुलंदियों पर हैं और दोनों कभी एक दूसरे के काम में दखल नहीं देते। एक दिन एक खूबसूरत युवती शीतल थाने में छेड़छाड़ की रिपोर्ट लिखाने आती है तो उसकी मुलाकात विजय से होती है। उसी रोज शीतल की मुलाकात रवि से भी होती है। रवि मन ही मन शीतल को चाहने लगता है लेकिन कह नहीं पाता। विजय अपने दिल की बात साफगोई से आगे रख देता है और उसका प्यार पींगे भरने लगता है। रवि शहर के एक बड़े अपराधी डागा के लिए भी काम करता है। विजय और शीतल की प्रेम कहानी रवि को पता चलती है तो वह टूट जाता है। हालात ऐसे मोड़ पर आते हैं जहां विजय का फांसी के तख्ते से बचना या उस पर झूल जाना रवि के हाथ में होता है। शीतल अपने प्यार को बचाने की फरियाद लेकर रवि के पास जाती है और इसके बाद जो होता है, वह फिल्म के क्लाइमेक्स की नींव रखता है।

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दोस्ताना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

यूं पड़ी धर्मा प्रोडक्शंस की नींव
फिल्म ‘दोस्ताना’ बनने का किस्सा वाकई काफी दिलचस्प है। अपने समय के चर्चित अभिनेता आई एस जौहर के छोटे भाई यश जौहर तब देव आनंद की कंपनी नवकेतन फिल्म्स के लिए काम करते थे। देव आनंद ने इमरजेंसी के दौरान उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ मोर्चा खोला। उनके विरोध में फिल्मी सितारों को लेकर खूब रैलियां कीं और इसी दौरान उन्होंने अपने दफ्तर में काम करने वाले यश जौहर को खुद फिल्में बनाने को कहा। तो उधर देव आनंद सियासत करने निकले और इधर यश जौहर ने सलीम जावेद की एक कहानी ली और नवकेतन फिल्म्स के अपने तमाम साथियों जैसे कि जीनत अमान और प्रेम चोपड़ा आदि से बात करके अमिताभ बच्चन को फिल्म के लिए साइन कर लिया। साल 1977 में फिल्म ‘दोस्ताना’ जब लॉन्च हुई तो इसका मुहूर्त क्लैप यश जौहर के बड़े भाई अभिनेता आई एस जौहर ने ही दिया था। सुनील दत्त के साथ फिल्म ‘मुझे जीने दो’ से फिल्म प्रोडक्शन सीखने की शुरुआत करने वाले यश जौहर को चर्चा मिली, देव आनंद की फिल्म ‘गाइड’ से जिसको तय बजट के हिसाब से पूरा करने में यश जौहर ने बहुत मदद की। देव आनंद ने बाद में यश जौहर को अपनी फिल्मों ‘ज्वैल थीफ’, ‘प्रेम पुजारी’ और ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का भी प्रोडक्शन सौंपा।

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