निर्माताः दीपक मुकुट/अनुभव सिन्हा
यह तय है कि निर्देशक अनुभव सिन्हा ने इस वक्त देश के हालात के हिसाब से फिल्म बनाई है लेकिन इसे देखने के दो नजरिये हैं। एक तो यह कि देश में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिता पर जो बहस चल रही है, वह उस हवा के हिसाब से चले। दूसरा नजरिया यह है कि अनुभव इस माहौल को बनाने वाली परिस्थितियों के विरोध में हैं। इन दिनों न्यूज चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक की चर्चाओं में खुल कर हिंदू-मुस्लिम तथा मुल्क बनाम मजहब कार्ड खेले जा रहे हैं। सो, अनुभव भी बात को बिना कोई आड़ लिए सीधे-सीधे कहने में पीछे नहीं रहे। कुछ बातें चुभती हैं तो कहीं यह भी लगता है कि ये प्रपोगंडा तो नहीं? आप जिस भी नजरिये से चाहें लेकिन मुल्क देखी जा सकती है। बर्शते आपको यह बहस भाती हो।
Review: हवा के साथ या खिलाफ? जिस भी नजरिये से चाहें लेकिन देखने लायक है 'मुल्क'
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आप फिल्म में नाच-गाना-कॉमेडी वाला एंटरटेनमेंट न ढूंढते हों। मुल्क लखनऊ में मार्च 2017 में हुए सैफुल्ला एनकाउंटर से प्रेरित होकर बढ़ती है। यह मूलतः कोर्ट रूम ड्रामा है। कहानी की नींव में शाहिद (प्रतीक बब्बर) के द्वारा इस्लाम के नाम पर एकबस में रखे बम के फटने से हुई 16 मौतों का मामला है। पुलिस एनकाउंटर में शाहिद मारा जाता है और मोबाइल की दुकान चलाने वाले उसके पिता बिलाल (मनोज पाहवा) के विरुद्ध ऐसे तमाम साक्ष्य मिलते हैं कि वह और उनका परिवार इस आतंकी घटना में शामिल थे। ये सच है या संयोग? बिलाल के बड़े भाई मुराद अली (ऋषि कपूर) को भी आरोपी बनाया जाता और यहां से शुरू होती है बहस कि क्या हर मुस्लिम आतंकवाद को शह देता है? क्या उसकी धर्मिक आस्थाओं वाली पहचानें आतंक को चिह्नित करने का जरिया हैं? क्यों उससे बार-बार देशभक्त होने का सबूत मांगा जाता है? वगैरह-वगैरह।
सरकारी वकील के रूप में आशुतोष राणा के कई सवाल सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर चलने वाले बहस से सीधे प्रेरित हैं। जो चुभते भी हैं। वहीं यहां अपने ससुर के हक में केस लड़ती आरती (तापसी पन्नू) फिल्म के दूसरे हिस्से में फॉर्म में नजर आती हैं। मुराद की तरह आरती भी वकील है। मुराद अदालत में अपने आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ते हैं, जिसमें हिंदू बहू उनके पक्ष में खड़ी है। अनुभव सिन्हा ने तीखे सवालों और बहसों को उठा कर अंततः कहानी को राष्ट्रीय एकता के संदेश से जोड़ा है। उन्होंने वर्तमान राजनीति की जोरदार खबर ली है।
वह हिंदू-मुस्लिम की बात करते हुए दलित विमर्श को भी छूते हैं। कुल मिला कर मुल्क अपनी सामयिक बहस और ऋषि कपूर, तापसी पन्नू, मनोज पाहवा तथा आशुतोष राणा के परफॉरमेंस की वजह से देखने योग्य हैं। इनके बीच होने वाली बहस काफी दिलचस्प है। संवाद दमदार हैं। कभी कभी आप चौंकते भी हैं कि दबी आवाज में होने वाली बातें कैसे खुल कर कह दी गई हैं। इतना जरूर है कि फिल्म में नीना गुप्ता और कुमुद मिश्रा जैसे मंजे हुए ऐक्टरों के हिस्से कुछ खास नहीं आ पाया। इसका कारण यह है कि उनके किरदारों में ही ज्यादा गुंजायश नहीं थी।