नोबेल पुरस्कार विजेता रबींद्रनाथ टैगोर की कहानियों पर गिनती करने बैठें तो 40 से ज्यादा फिल्में बन चुकी हैं। नेटफ्लिक्स पर उनकी कहानियों पर बनी वेब सीरीज भी खूब चर्चा में रही है। अतिथि, बाइस्कोपवाला, चार अध्याय, चोखेर बाली, घरे बाइरे, गोरा, काबुलीवाला, लेकिन, मिलन, नौकाडुबी, ताशेर देश, तीन कन्या आदि टैगोर की कहानियों पर बनी बहुचर्चित फिल्में हैं। टैगोर की लघुकथा पर 1965 में रिलीज हुई एक फिल्म है, अतिथि । तपन सिन्हा निर्देशित इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला और ये वेनिस फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन लॉयन पुरस्कार के लिए भी नामित हुई।
बाइस्कोप: एक्शन एंटरटेनर के दौर में सचिन बोले, गीत गाता चल और इस वजह से उनके साथ आ गए लाखों दीवाने
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राजश्री प्रोडक्शंस को हिंदी सिनेमा में पारिवारिक और संस्कारी फिल्मों के लिए जाना जाता है। कंपनी की शुरूआत हुई मीना कुमारी की फिल्म आरती से और इसे देश विदेश में इतनी तारीफ मिली की कंपनी ने तुरंत ही अपनी अगली फिल्म दोस्ती का एलान कर दिया। आरती को निर्देशित किया था फणी मजूमदार ने और दोस्ती में राजश्री ने मौका दिया सत्येन बोस को। फिल्म ने बेस्ट फिल्म का नेशनल अवार्ड तो जीता ही, फिल्मफेयर पुरस्कारों में भी छह पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया। फिल्म का संगीत सुपरहिट हुआ और यहीं से राजश्री की पहचान बनी एक ऐसे प्रोडक्शन हाउस की जिसकी फिल्मों में पारिवारिक कहानी होती है, रिश्तों की बात होती है और होता है कर्णप्रिय मधुर संगीत।
कंपनी खोलने वाले ताराचंद बड़जात्या थे तो मारवाड़ी लेकिन उनका कलकत्ता कनेक्शन उनके बहुत काम आया। भद्रलोक के तमाम फिल्म निर्देशक धीरे धीरे राजश्री आने जाने लगे और ऐसे ही एक निर्देशक हिरेन नाग ने ताराचंद बड़जात्या को सुनाई टैगोर की वो कहानी जिसपर बंगाली में फिल्म अतिथि बन चुकी थी। ताराचंद को कहानी पसंद आई। फिल्म के हीरो की तलाश शुरू हुई। मराठी फिल्मों हा मझा मार्ग एकला और अजब तुजे सरकार में बाल कलाकार के रूप में काम करके सचिन पिलगांवकर ने पूरे देश के फिल्ममेकर्स का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया था और 1971 में आई कृष्ण लीला के कन्हैया बनकर तो सचिन ने अपनी मोहक मुस्कान से न जाने कितनों का मन हर लिया। और, इनमें एक रहे ताराचंद बड़जात्या।
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ताराचंद की पहली फिल्म आरती की हीरोइन मीना कुमारी ने ताराचंद को फिल्म कृष्ण लीला देखने को कहा था। तब से ये सूरत उनके मन में बसी थी। फिल्म अतिथि भी उन्होंने देखी और जब ये तय हो गया कि फिल्म की रीमेक बननी ही है तो फिर इसे हिंदी के हिसाब से ढालने की जिम्मेदारी मिली सचिन के पिता शरद पिलगांवकर और मधुसूदन कालेलकर को। शरद पिलगांवकर ही शुरू से अपने बेटे सचिन का सारा काम संभालते थे और इस फिल्म की कहानी से वह जानबूझकर जुड़े ताकि बेटे की बतौर हीरो एक अहम फिल्म में उसका किरदार कायदे से गढ़ा जा सके। वैसे उनका प्रिटिंग का कारोबार जमा जमाया था और गोवा के पिलगांव से आने के बाद वह मुंबई में भी खूब फले फूले।
मधुसूदन कालेलकर मराठी के नामी लेखक रहे। हिंदी सिनेमा में उन्होंने अमिताभ बच्चन की फिल्म फरार के अलावा दुल्हन वही जो पिया मन भाए और अंखियों के झरोखे से जैसी सुपरहिट फिल्में भी लिखीं। फिल्म गीत गाता चल के संवाद लिखने का जिम्मा उठाया वृजेंद्र गौड़ ने। फिल्म की कहानी बहुत ही मर्मस्पर्शी है। दुर्गा बाबू और उनकी पत्नी गंगा के संपर्क में एक अनाथ बालक श्याम आता है। वह अच्छा गाता। नाचता भी अच्छा है। दोनों उसे अपने घर ले आते हैं। दोनों की बिटिया राधा को श्याम अच्छा लगता है और वह उसे प्यार भी करने लगती है। लेकिन, श्याम उन्मुक्त जीवन का आदी है। वह अपना जीवन गाते, नाचते और यहां वहां घूमते बिताना चाहता है। जब उसे पता चलता है कि उसकी शादी की तैयारी हो रही है तो वह एक दिन बिना बताए घर से चला जाता है। गोकुल के राधा और श्याम सी इस कहानी में एक मीरा भी है।
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फिल्म में सचिन और सारिका दोनों ने अपने किरदार बहुत ही खूबसूरती से निभाए। सचिन तो पूरे देश में इस फिल्म से मशहूर हो ही गए, सारिका को भी लोगों ने पहचानना शुरू कर दिया। फिल्म में माधव किशन ने अच्छा और सहज नृत्य निर्देशन किया है और फिल्म के गीत औऱ संगीत की कमान संभाली रवींद्र जैन ने। फिल्म में करीब 10 गाने हैं। यहां मैं खासतौर से जिक्र करना चाहूंगा फिल्म में गाने वाले जसपाल सिंह और आऱती मुखर्जी का। जसपाल सिंह अमृतसर के रहने वाले थे और स्कूल कॉलेज के दिनों में लोगों को उनके गाने खूब भाते थे। जसपाल को लगा कि अगर उनका गला अच्छा है तो फिर फिल्मों में भी ट्राई करना चाहिए। उनको मौका मिला भी। उषा खन्ना ने फिल्म बंदिश में उनसे गाना गवाया। उषा खन्ना ने आगे भी उनको मौके दिए पर बात बनी नहीं। घर वालों का दबाव पड़ा तो जसपाल गायिका का सपना छोड़ वकालत करने पर ध्यान देने लगे लेकिन उनकी कोशिश जारी थी और फिर एक दिन रवींद्र जैन ने उनसे गवाकर देखा, गीत गाता चल का शीर्षक गीत। बात बननी ही थी। गीत गाता चल के सारे गाने हिट रहे और साथ ही हिट हो गया पार्श्व गायन में जसपाल सिंह का नाम। जसपाल के गाए गाने फिल्म सावन को आने दो, अंखियों के झरोखे से लेकर नदिया के पार तक हिट होते रहे।
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फिल्म नदिया के पार में हिंदी सिनेमा के शौकीनों को एक और स्वर खास पसंद आया जो था पश्चिम बंगाल की गायिका आरती मुखर्जी का। मर्फी रेडियो ने गायिकी की एक अखिल भारतीय प्रतियोगिता आयोजित की थी, मेट्रो मर्फी कांटेस्ट जिसके जजों में शामिल थे दिग्गज संगीतकार अनिल बिस्वास, नौशाद, वसंत देसाई और सी रामचंद्र। प्रतियोगिता आरती मुखर्जी ने जीती और साल 1958 में उन्हें मिला करियर का पहला हिंदा गाना फिल्म सहारा में लेकिन बात बनी नहीं। तब उन्होंने अपना ध्यान बंगाली फिल्मों की तरफ लगाना शुरू कर दिया और वहां सुचित्रा सेन की फिल्मों में उनके गाने हिट होने लगे। उनकी शोहरत इतनी फैली कि एक समय तो उन्हें बंगाल की सबसे मशहूर गायिका संध्या मुखर्जी के लिए खतरा माना जाने लगा।
रवींद्र जैन ने गीत गाता चल में आरती से तीन गाने गवाए और यहीं उन्हे किशोर कुमार के संपर्क में भी आने का मौका मिला। किशोर कुमार ने भी उनको अपने साथ गाने का मौका दिया। फिर वह आर डी बर्मन के भी संपर्क में आईं। शेखर कपूर की बतौर निर्देशक पहली फिल्म मासूम में शबाना आजमी पर फिल्माए गए गाने ‘दो नैना और एक कहानी’ के लिए साल 1984 में उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट सिंगर- फीमेल अवार्ड भी मिला। फिल्म गीत गाता चल आरती के लिए हिंदी सिनेमा के दिग्गजों को अपनी गायिकी की रेंज दिखाने का बढ़िया मौका बना। एक तरफ तो उन्होंने गाया चुलबुला सा गाना ‘मैं वही दर्पण वही...’ और दूसरी तरफ ये दर्द भरा गाना..
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