केंद्र सरकार के नए निर्देशों का देश में संचालित उन ओटीटी पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला जो धड़ल्ले से सेमी पॉर्न सामग्री परोस रहे हैं। नए दिशा निर्देश यही कहते हैं कि वयस्कों के लिए बनने वाला कंटेट उम्र के हिसाब से दिखाने की जिम्मेदारी ओटीटी प्लेयर की है लेकिन ये ओटीटी प्लेयर ‘हैलो मिनी’ जैसी वेब सीरीज ऐसी किसी व्यस्था के बिना अब भी धड़ल्ले से चला रहे हैं। ‘हैलो मिनी’ सीरीज देखना किसी घटिया पोर्न फिल्म देखने जैसा ही है। देश में तमाम पोर्न कंटेट इंटरनेट पर बिखरा पड़ा है। इसका कारोबार हिंदी सिनेमा के कुल कारोबार से कहीं ज्यादा हो चुका है। समस्या यहां ये है कि नग्नता के इस बाजार में आदित्य बिड़ला जैसे समूह की कंपनी अप्लॉज एंटरटेनमेंट भी उतर चुकी है।
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Hello Mini 2
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
नवनील चक्रवर्ती की कल्पनाओं को परदे पर उतारने का इतना सतही तरीका देखकर तो कई बार कोफ्त ये भी होती है कि आखिर इसे बनाने का मकसद ही क्या रहा होगा। हर दो तीन सीन के बाद कहानी की नायिका के सामने एक मुसीबत आती है। और, मुसीबत का क्या हुआ ये जानने से पहले ही परदे पर कोई न कोई जींस की बटनें खोलने लगता है। कहानी का खोखलापन सिर्फ इस बात से समझा जा सकता है कि मेट्रो शहर में रह रही एक युवती सिर्फ इसलिए विदेश जाने पर आमादा है कि वहां उसके ब्वॉयफ्रेंड की दोस्ती किसी दूसरी युवती से हो गई है। बीच में पबजी जैसा एक गेम भी है, बस यहां टास्क सारे दैहिक सुख पूर्ति करने कराने के हैं। शो को सस्पेंस थ्रिलर बनाने की कोशिश भी है लेकिन शो आखिर है क्या ये आखिर तक साफ नहीं हो पाता।
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गोल्डी बहल, श्रद्धा बहल, दीपक सहगल और समीर नायर इस सीरीज के निर्माता हैं। गोल्डी और समीर का तो एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में बड़ा नाम रहा है। ये सब क्यों आल्ट बालाजी के कंपटीशन में उतर पड़े हैं, इस सवाल का जवाब सिर्फ कम लागत में ज्यादा कमाई के अलावा दूसरा कुछ नहीं दिखता। गोल्डी बहल ने नवनील के साथ मिलकर इसकी पटकथा भी लिखी है। सोनाली बेंद्रे के पति के तौर पर पहचाने जाने वाले गोल्डी ने कभी ‘बस इतना सा ख्वाब है’ और ‘द्रोण’ जैसी फिल्मों से हिंदी सिनेमा में नएपन का एहसास कराया था, लेकिन ‘हैलो मिनी’ जैसी सीरीज के साथ उनका नाम जुड़ता देखना फिल्मकारों की पैसे के लिए कुछ भी करने की मजबूरी को ही दिखाता है।
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‘हैलो मिनी’ का दूसरा सीजन अभिनय के लिहाज से इस साल की अब तक की सबसे कमजोर सीरीज का तमगा पा सकता है। इसे देखने के बाद ‘1962 द वॉर इन द हिल्स’ भी अच्छी लगने लगती है। कहानी की नायिका का किरदार गढ़ने में क्या सोचा गया, समझ नहीं आता। सीरीज का मुख्य किरदार ही इतना भ्रमित है कि आखिर तक ये समझ नहीं आता कि ये इरॉटिका है, सस्पेंस थ्रिलर है, मर्डर मिस्ट्री है या फिर सिर्फ पोर्न से थोड़ा कुछ कम दिखाने का बहाना। अनुजा जोशी से अभिनय हो नहीं पाता है, बाकी किरदारों को खुलकर अभिनय करने दिया नहीं जाता है।
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तकनीकी तौर पर भी वेब सीरीज ‘हैलो मिनी 2’ बहुत ही कमजोर सीरीज है। यूं लगता है कि एमएक्स प्लेयर में बजट आवंटित हो जाने के बाद फिर कोई क्वालिटी चेक उनकी क्रिएटिव टीम करती ही नहीं है। न ढंग का बैकग्राउंड म्यूजिक है, न लाइटिंग सही से की गई है। बिना मतलब का अंधेरा और इस अंधेरे का फायदा उठाकर दर्शकों को एपीसोड दर एपीसोड बुद्धू बनाने की कोशिश। मुफ्त के ओटीटी पर दर्शकों को यूं उत्पाद बनाने की कोशिश खतरनाक है। यही वो वीडियो सामग्री है जिसे गांव देहात में देखने के बाद किशोर अपने पर काबू नहीं रख पाते हैं।
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