कभी आपने ऐसी कोई फिल्म देखी है जो शुरू हो तो अगले ढाई पौने तीन मिनट तक परदे पर बस अलग अलग तरह की आकृतियां ही दिखती रहें या फिर उनके कोलाज के एक दूसरे में गड्डमगड्ड होते दिखते रहे। परदे के पीछे से तेज संगीत बजता रहे और यूं लगे कि कोई आपको परदे की तरफ ध्यान केंद्रित किए रखने के लिए कह रहा है। सिनेमा में हिप्नोटिज्म के मनोविज्ञान का प्रयोग करने वाले पहले भारतीय निर्देशक रहे हैं, यश चोपड़ा। अभी दो इतवार पहले पूरी दुनिया ने उनकी जयंती मनाई। उनकी अपनी बनाई कंपनी यशराज फिल्म्स ने उनकी याद में कंपनी का एक नया लोगो जारी किया और एलान किया साल भर चलने वाले कंपनी के स्वर्ण जयंती वर्षोत्सव के आरंभ का। सिनेमाघर भी बस इसी हफ्ते फिर से खुलने वाले हैं। सिनेमा फिर से सांसें पाने वाला है। इंटरवल होंगे। समोसे, पॉपकॉर्न बिकेंगे। अर्थव्यवस्था थोड़ी और पटरी पर लौटेगी लेकिन क्या आपको पता है उस हिंदी फिल्म के बारे में जिसमें पहली बार कोई इंटरवल ही नहीं था। ये फिल्म थी यश चोपड़ा की अपने भाई बलदेव राज चोपड़ा यानी बी आर चोपड़ा की कंपनी बी आर फिल्म्स के लिए बनाई गई आखिरी फिल्म ‘इत्तेफाक’, इसी फिल्म के बाद यश चोपड़ा ने अपनी खुद की कंपनी यशराज फिल्म्स की नींव डाली। इत्तेफाक’ के ही हीरो राजेश खन्ना के साथ यश चोपड़ा ने अपनी कंपनी की पहली फिल्म ‘दाग’ बनाई थी। फिल्म ‘दाग’ कैसे बनी, यश चोपड़ा प्रोड्यूसर कैसे बने, ये पूरी कहानी आप बाइस्कोप की शुरूआत में ही पढ़ चुके हैं। आज बारी है फिल्म ‘इत्तेफाक’ की, यही हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है। इस फिल्म को दो साल पहले बी आर चोपड़ा के पोते और रवि चोपड़ा के बेटे अभय दोबारा बना चुके हैं।
बाइस्कोप: ऐसे बनी बिना इंटरवल वाली पहली हिंदी फिल्म, राजेश खन्ना व यश चोपड़ा की दोस्ती का ‘इत्तेफाक’
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तमाम इत्तेफाकों का ‘इत्तेफाक’
फिल्म ‘इत्तेफाक’ की रीमेक बनाने वाले अभय चोपड़ा के पिता रवि चोपड़ा फिल्म ‘इत्तेफाक’ में अपने चाचा यश चोपड़ा के सहायक थे। वैसे इस फिल्म में सहायक निर्देशकों की लंबी फेहरिस्त है, जिसमें रवि चोपड़ा के अलावा आर के सिब्बल, महेन वकील, वासुदेव धीर, अरविंद जोशी और रमेश तलवार के नाम शामिल हैं। महेन वकील बाद में यशराज फिल्म्स के पहले कर्मचारी भी बने। रवि चोपड़ा तो खैर यश चोपड़ा के सगे भतीजे ही थे और आगे चलकर वह भी नामी फिल्म निर्देशक बने। इस लिस्ट में एक नाम मशहूर लेखक सागर सरहदी के भतीजे का भी है। सागर सरहदी दोनों चोपड़ा भाइयों के काफी करीबी रहे। एबटाबाद, पाकिस्तान में जन्मे सागर सरहदी का असली नाम गंगा सागर तलवार है। यश चोपड़ा के लिए इन्होंने ‘कभी कभी’, ‘नूरी’, ‘चांदनी’, ‘सिलसिला’ और ‘फासले’ जैसी फिल्मों में लेखन का काम किया। रमेश तलवार उनके भतीजे हैं। रमेश तलवार ने यश चोपड़ा की बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘धूल का फूल’ में भी बतौर बाल कलाकार काम किया। रमेश तलवार की फिल्म ‘इत्तेफाक’ में बतौर सहायक निर्देशक एंट्री आखिरी मौके पर चोपड़ा कैंप के चर्चित अभिनेता मनमोहन कृष्ण के कहने पर हुई। रमेश तलवार ने एक इंटरव्यू में खुद माना कि फिल्म ‘इत्तेफाक’ में ज्यादा कुछ खास काम उनके हिस्से नहीं आया। लेकिन, इस दौरान यश चोपड़ा को रमेश तलवार के नाम का एक भरोसेमंद साथी मिला जिसने उनकी तमाम मुश्किलें आगे चलकर हल कीं। यश चोपड़ा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के उन गिने चुने निर्देशकों में से हैं जिन्होंने न सिर्फ अपने सहायकों को पूर्णकालिक निर्देशक बनने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें हर तरह की सहायता दी और उनकी फिल्में प्रोड्यूस भी कीं।
गुजराती नाटक देख बनी फिल्म
फिल्म ‘इत्तेफाक’ संयोग से बनी एक फिल्म है। फिल्म में कोई इंटरवल नहीं है। फिल्म की कुल अवधि ही एक घंटा 41 मिनट है। ये उन दिनों की बात है जब यश चोपड़ा बी आर फिल्म के लिए ‘आदमी और इंसान’ बना रहे थे। फिल्म में धर्मेंद्र, फिरोज खान, सायरा बानो और मुमताज जैसे बड़े कलाकार थे। फिल्म की पूरी यूनिट बी आर फिल्म्स के अपने नियमित कर्मचारियों की थी और इसकी शूटिंग बहुत बड़े पैमाने पर चल रही थी कि अचानक सायरा बानो की तबीयत खराब हो गई। अभिनेताओं को तो खैर किसी तरह राजी किया गया तारीखें बदलने के लिए लेकिन तकनीशियन तो खाली बैठ गए। इस पर चोपड़ा बंधुओं को एक फिल्म तुरत फुरत बनाने का आइडिया सूझा जिसे सिनेमा की भाषा में ‘क्विकी’ कहते हैं। फिल्म के लिए कहानी की तलाश चल ही रही थी कि थिएटर देखने के शौकीन यश चोपड़ा ने एक दिन एक गुजराती नाटक देख लिया, ‘धुम्मस’। नाटक यश चोपड़ा को बहुत अच्छा लगा। वह बीआर फिल्म्स के पूरे स्टोरी डिपार्टमेंट को लेकर अगले दिन ये नाटक देखने फिर पहुंच गए। सबको कहानी पसंद आई। पता ये भी चला कि ये नाटक एक अंग्रेजी फिल्म ‘साइनपोस्ट टू मर्डर’ पर आधारित है। यश चोपड़ा तब तक इस नाटक पर फिल्म बनाने का मन बना चुके थे। पूरे स्टोरी डिपार्टमेंट ने बैठकर हफ्ते भर में फिल्म की पटकथा लिख डाली। अख्तर उल इमान को स्क्रिप्ट मिली तो उन्होंने फटाफट इसके डॉयलॉग लिख डाले और यश चोपड़ा ने ये पूरी फिल्म सिर्फ 28 दिन में शूट कर डाली।
ऐसे मिली राजेश खन्ना को ‘इत्तेफाक’
लेकिन, फिल्म ‘इत्तेफाक’ की मेकिंग इतनी आसान भी नहीं रही, जितनी लिखने या पढ़ने में लगती है। कहानी के नायक दिलीप रॉय का रोल राजेश खन्ना तक पहुंचने से पहले तमाम दूसरे कलाकारों के आगे से होकर गुजरा। फिल्म की पटकथा जैसे ही बनकर तैयार हुई, यश चोपड़ा इसे लेकर सबसे पहले राजकुमार के पास गए। राजकुमार के साथ यश चोपड़ा ने सुपर हिट फिल्म ‘कानून’ बनाई थी। गाने ‘कानून’ में भी नहीं थे और गाने फिल्म ‘इत्तेफाक’ में भी नहीं है। हीरोइन के लिए ‘कानून’ में काम कर चुकीं नंदा ही यश चोपड़ा के जेहन में थीं। उन्हें एक ऐसी अभिनेत्री चाहिए थी जिस पर आखिर तक किसी दर्शक का शक़ ही न जाए। लेकिन, हीरो को लेकर लोचा हो गया जब राजकुमार ने ये किरदार करने से मना कर दिया। संजय खान से भी बात हुई। उनको कहानी पसंद भी आई। लेकिन बताते हैं जितना पैसा संजय खान ने इस फिल्म के लिए मांगा, वह फिल्म के बजट के हिसाब से ज्यादा था। फिर यश चोपड़ा का ध्यान गया एक नए कलाकार पर, नाम - शत्रुघ्न सिन्हा। शत्रुघ्न ने इस फिल्म में इंस्पेक्टर दीवान वाले किरदार के लिए ऑडीशन दिया था। यश चोपड़ा को ये ऑडीशन देखकर लगा कि ये लड़का कहानी के नायक के रूप में अच्छा काम कर सकता है। लेकिन, इसी बीच ये कहानी राजेश खन्ना के पास पहुंच गई। राजेश खन्ना की तब तक दो तीन फिल्में रिलीज हो चुकी थीं और चार पांच फिल्में फ्लोर पर थीं। राजेश खन्ना को सब रोमांटिक हीरो वाले रोल ही दे रहे थे ऐसे में जब उन्हें ये मानसिक रूप से व्यथित कलाकार का किरदार मिला तो उन्होंने इसे तुरंत लपक लिया। यश चोपड़ा की तो जैसे मुंहमागी मुराद पूरी हो गई। राजेश खन्ना ने ये भी वादा कर दिया कि वह इस बारे में पैसे की बात नहीं करेंगे और जो भी फिल्म का बजट होगा उसके हिसाब से ही पैसे ले लेंगे। फिल्म ‘इत्तेफाक’ 1969 में ‘बंधन’ और ‘आराधना’ के बाद रिलीज हुई और राजेश खन्ना की हिट फिल्मों की पहली हैट्रिक की तीसरी फिल्म बनी। फिल्म ‘इत्तेफाक’ के बाद रिलीज हुई ‘दो रास्ते’ भी सुपरहिट रही, उस फिल्म में राजेश खन्ना कुछ दृश्यों में दाढ़ी बढ़ाए दिखे हैं, वह फिल्म ‘इत्तेफाक’ के किरदार के चलते हैं। इसके बाद तो राजेश खन्ना ने एक दर्जन और सुपरहिट फिल्में साल 1971 तक एक के बाद एक दे डालीं।
कहानी एक रात की
फिल्म ‘इत्तेफाक’ की अधिकतर कहानी पूरी एक रात में घटती है। शहर के प्रसिद्ध चित्रकार दिलीप को पुलिस अपनी ही पत्नी की हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार कर लेती है। पुलिस को लगता है कि दिलीप की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। तो उसे इलाज के लिए भेज दिया जाता है। वहां से भाग निकला दिलीप एक ऐसे घर में छुप जाता है, जहां एक विवाहिता अकेले है। दोनों के बीच चूहे बिल्ली का खेल चलता है। और, इस बीच इस घर में एक और लाश सामने आती है। घर की मालकिन का घर में घुसे कथित हत्यारे के प्रति भाव बदलता है और खेल दूसरे पाले में खेला जाने लगता है। यह सब प्रेम प्रकटन इसलिए था क्योंकि घर की मालकिन ने पुलिस को चुपके से फोन कर दिया है। पुलिस आती है तो लाश भी मिलती है और इस चित्रकार पर दूसरी हत्या का आरोप भी आ जाता है। ये पेंच कैसे सुलझता है, कैसे असली हत्यारा सामने आता है और कैसे आखिर तक ये फिल्म दर्शकों को बांधे रखती है, ये देखने वाली बात है। फिल्म में अगर कुछ खटकने वाली बात है तो वो ये कि किसी की मानसिक हालत की तमाम वजहें अब समझी जाती हैं, किसी को पागल कह देना अब इतना आसान नहीं रहा। मानसिक बीमारी का भी अब इलाज होता है और ऐसे लोगों के साथ इस फिल्म जैसा व्यहार भी अब नहीं होता। लेकिन, ध्यान यहां ये भी रखना है कि ये फिल्म पचास साल पहले बनी है और तब के लेखक वही लिखा करते होंगे, जो उस वक्त का चिकित्सा शास्त्र उन्हें समझाता होगा।