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बाइस्कोप: रहमान के पंजाबी गाने पर यश चोपड़ा ने पूछा था ये सवाल, जवाब जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे

Sat, 14 Nov 2020 12:14 AM IST
Mishra Mishra पंकज शुक्ल
पंकज शुक्ल Published by: Mishra Mishra Updated Sat, 14 Nov 2020 12:14 AM IST
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jab tak hai jaan this day that year by pankaj shukla 13 november 2012 bioscope shahrukh yash chopra
जब तक है जान - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

हिंदी सिनेमा को दुनिया में एक अलग ही पहचान दिलाने वाले निर्माता निर्देशक यश चोपड़ा की एक और रूमानी फिल्म ‘जब तक है जान’ की जयंती पूरी दुनिया अपने अपने हिसाब से मना रही है। किसी को फिल्म में शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा का ट्रैक याद आ रहा है तो किसी को कैटरीना कैफ के लिए तेज होती शाहरुख खान की सांसों की गर्माहट याद आ रही है। फिल्म ‘जब तक है जान’ हिंदी सिनेमा के लिए मील का पत्थर इस लिहाज से भी है कि ये यश चोपड़ा की आखिरी फिल्म रही। इस फिल्म के लिए उन्होंने वैसे ही जोशो खरोश के साथ काम किया जैसा जोश लोगों ने उनकी पहली फिल्म ‘धूल का फूल’ में देखा था। यश चोपड़ा ने लोगों को समझाया कि समय के साथ बदलते रहने में ही सिनेमा की भी तरक्की है और इंसान की भी। नए को उन्होंने हमेशा अपनाया और पुराने का सम्मान भी बनाए रखा। बदलाव और परंपरा के बीच एक अनूठा संतुलन यश चोपड़ा के निजी जीवन में भी दिखता है और युवा दर्शकों की पसंद और अपने पारंपरिक प्रशंसकों की थाती को भी उन्होंने इसी सामंजस्य के सहारे कभी खुद से दूर नहीं होने दिया। फिल्म ‘जब तक है जान’ यशराज फिल्म्स के लिए मील का वह पत्थर है जिसके पास आकर यश चोपड़ा की आने वाली कई पीढ़ियां मार्गदर्शन पाती रहेंगी।



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jab tak hai jaan this day that year by pankaj shukla 13 november 2012 bioscope shahrukh yash chopra
जब तक है जान - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

फिल्म ‘जब तक है जान’ की जब भी बात होगी, सबसे पहले इसके संगीत की बात जरूर आएगी। फिल्म के मशहूर सितारों और दमदार निर्देशक के बाद अगर किसी ने फिल्म को सबसे ज्यादा सहारा दिया. तो वह फिल्म का संगीत ही है। ‘जब तक है जान’ में यश चोपड़ा और ए आर रहमान ने कमाल की जुगलबंदियां रचीं और हिंदी सिनेमा को इसके संगीत के एक अलग पहलू से परिचित कराया। उन दिनों के लम्हे याद करते हुए रहमान कहते हैं, “मुझे लगता है कि इतनी दिग्गज हस्ती के साथ काम करना अपने आप में एक बहुत बड़ा सम्मान था। उनका हर दिलकश चीज को लेकर बच्चों जैसा उत्साह हुआ करता था। यह जानते हुए कि वाईआरएफ स्टूडियोज और फिल्में उनके ही विशाल दृष्टिकोण की उपज थीं, यह देखना बेहद दिलचस्प था कि वहां सब कुछ कितना सुव्यवस्थित है। यह एक सुखद अहसास भी था। इतने अनुभवी व्यक्ति से आप कुछ खास चीजों की उम्मीदें करते ही हैं, लेकिन इसके आगे बढ़कर वह हमेशा सबसे खोजपरक आइडिया चुनते थे। एकदम नई-नई चीजें उठाने के बावजूद उनको परंपरा में ढाल देने की उनमें जबर्दस्त खासियत मौजूद थी।“

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jab tak hai jaan this day that year by pankaj shukla 13 november 2012 bioscope shahrukh yash chopra
जब तक है जान - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

‘जब तक है जान’ की आठवीं सालगिरह पर रहमान ये भी बताते हैं कि यश चोपड़ा के साथ उनकी रचनात्मक सहभागिता कैसी थी। रहमान बताते हैं, “यशराज फिल्म्स की हर पिक्चर कुछ खास चीजों को फॉलो करती है। मैं बस यह देखना चाहता था कि इसमें मेरा क्या योगदान हो सकता है। मैं इस फिल्म की भावनाओं में गहरे उतर गया और यकीनन एक दिलचस्प फिल्म तैयार हुई थी। चूंकि फिल्म का सब्जेक्ट मेरा फेवरिट था इसलिए मैं फ्लो के साथ बहता चला गया। मुंबई में म्यूजिक तैयार करने की प्रक्रिया, मेरे स्टूडियो और उनके स्टूडियो के बीच जारी रही। हम एक जगह से दूसरी जगह लगातार आते-जाते रहे। मुझे पता था कि वह दूसरों के स्टूडियो में कभी नहीं जाते थे लेकिन इसे मैं उनकी दरियादिली ही कहूंगा कि वह मेरे यहां आए  और गुलजार साब के साथ ठहरे भी। बस हम तीनों ही थे। संगीत तैयार करने की ये प्रक्रिया बेहद यादगार रही।“

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jab tak hai jaan this day that year by pankaj shukla 13 november 2012 bioscope shahrukh yash chopra
जब तक है जान - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

रहमान के दिल में अपने रचे हर गाने की एक खास जगह है। फिल्म ‘जब तक है जान’ के गानों के बारे में उनका कहना है, “मेरी नजर में ‘हीर हीर’ सॉन्ग मेरे लिए बेहद खास था, क्योंकि इसको तैयार करने के लिए मुझे काफी आजादी मिली थी। जब हमने इसे रिकॉर्ड कर लिया तो यश जी ने मुझसे पूछा, आप तो पंजाबी नहीं हैं। आपने पंजाब की सारी बारीकियां कैसे पकड़ लीं? मेरा जवाब था, संगीत को इसकी जरूरत नहीं पड़ती। पंजाबी गाना कंपोज करने के लिए आपका पंजाब में रहना जरूरी नहीं है। भारत में हम सब एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं। हमारी परंपराएं एक-दूसरे के साथ गहराई तक जुड़ी हुई हैं, हम एक-दूसरे की संस्कृति की कद्र करते हैं।”


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जब तक है जान - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

फिल्म ‘जब तक है जान’ का एक और पहलू काबिले तारीफ है और वह है फिल्म के गीतों का नृत्य संयोजन। फिल्म में शाहरुख खान और कैटरीना कैफ के बीच गजब की केमिस्ट्री दिखी और कोरियोग्राफर वैभवी मर्चेंट ने ‘c’ गाने के अंदर उनके ऑन-स्क्रीन रोमांस में अपने हुनर का अलग ही तड़का लगा दिया था। वैभवी बताती हैं, “मेरी नजर में तो कैटरीना और शाहरुख के दोनों ने इस गाने पर खास तौर से बड़ी मेहनत की थी, क्योंकि यह बहुत-बहुत ज्यादा स्पेशल फिल्म थी। यश चोपड़ा ने इस फिल्म के बाद अपने रिटायर होने का ऐलान करने का मन बना लिया था। तो हम सभी अपनी जान लड़ा देना चाहते थे और कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहते थे। इस फिल्म को हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देना चाहते थे। कैटरीना को इस गाने के लिए मुंबई में काफी पहले से ट्रेनिंग दी गई थी लेकिन ट्रेनिंग के लिए शाहरुख कभी हमारे हाथ नहीं लगे। कई बार मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसी क्या वजह है जो वह ट्रेनिंग नहीं कर सकते। हमारे पास इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं था कि हम लंदन में ही उनके साथ रिहर्सल करें। मेरा अंदाजा है कि उन्होंने शायद करीब तीन या चार सेशन की रिहर्सल की होगी।  गाने के स्टेप्स को उनके सही ढंग से पकड़ लेने से पहले हम न तो पीछे हट सकते थे और न ही आगे बढ़ सकते थे। शाहरुख समझते थे कि गाने में उनका पूरी तरह से डूब जाना जरूरी है क्योंकि उन्हें पता था कि यश जी और आदि उनको काम सही होने से पहले दम नहीं लेने देंगे, और वह उस हड्डियां जमा देने वाली ठंड में सेट पर इसे बार-बार दोहराना नहीं चाहते थे।”

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