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Bioscope S2: सही साबित हुई 21 साल पहले ‘अमर उजाला’ की भविष्यवाणी, और वाकई आ पहुंचा एक नया स्टार

Thu, 14 Jan 2021 10:04 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Thu, 14 Jan 2021 10:04 AM IST
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kaho naa pyaar hai bioscope by Pankaj Shukla hrithik roshan rakesh rosham amisha patel luck ali
कहो ना प्यार है - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

21 साल हो गए फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ को रिलीज हुए। लेकिन, यूं लगता है कि जैसे कल ही की बात है। ये उन दिनों की बात है जब मैं ‘अमर उजाला’ की फिल्म पत्रिका ‘रंगायन’ का प्रभारी था और अखबार में छपने वाली मेरी फिल्म समीक्षाओं का दिल्ली-यूपी के फिल्म वितरण बाजार भगीरथ पैलेस में बेसब्री से इंतजार रहता। फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ का मुंबई में शो हो चुका था। फिल्मसिटी में ये फिल्म देखने वालों से शाहरुख खान की फिल्म ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ की उसी शाम हुई पार्टी में लोग बस एक ही सवाल पूछ रहे थे, ‘राकेश रोशन के लड़के की रिपोर्ट कैसी है?’ सब बहुत प्रेशर में थे। लेकिन, मुंबई से सैकड़ों किलोमीटर दूर नोएडा में ऐसा कोई प्रेशर नहीं था। लेकिन, प्रेशर क्या होता है, ये पता चलना अभी बाकी था।

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कहो ना प्यार है - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

मैंने फिल्म ‘कहो ना प्यार है’  की समीक्षा लिख दी। पेज पर लग भी गई। लेकिन, पेज की प्रूफरीडिंग, डिजाइन चेक, फिर प्लेट बनने और प्रिंटिंग में जाने से पहले इस समीक्षा को दफ्तर में ही दर्जनों लोगों ने पढ़ डाला। सबको उत्सुकता थी कि आखिर ये नया लड़का है कितना दमदार। देर तक दफ्तर में काम करते रहने का कीड़ा शुरू से है तो मैं दफ्तर में ही था। आलम ये कि पेज छपने जाने तक तमाम लोगों ने मुझे टोका कि चाहो तो हेडिंग बदल लो। मैंने कहा, नहीं ठीक है। तो एक काफी सीनियर सहयोगी ने दफ्तर के बाहर चाय की दुकान तक टहलाया और समझाते रहे कि ऐसी भविष्यवाणी तुम्हारे करियर के लिए घातक हो सकती है। कहीं फिल्म फ्लॉप हो गई तो? एकबारगी तो मुझे भी लगने लगा कि मैं बहुत बड़ी बात लिख रहा हूं और फिल्म न चली तो। लेकिन, मुझे ऋतिक के टैलेंट पर भरोसा था, फिल्म का म्यूजिक शानदार था और बड़े भाई व छोटे भाई वाला एंगल बहुत इमोशनल था। इतने में फिल्म निकल ही जानी थी। तो, मैंने उनको यही जवाब दिया कि हेडिंग यही रहने देते हैं, फिल्म नहीं चली तो कहीं और नौकरी देखेंगे।  

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फिल्म समीक्षा की कटिंग - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

और, 14 जनवरी 2000 को रिलीज हुई फिल्म की समीक्षा रविवार 16 जनवरी के ‘अमर उजाला’ के सभी संस्करणों में छप गई और वाकई ‘आ पहुंचा एक नया स्टार’। भगीरथ पैलेस से इतने फोन मुझे पहले किसी फिल्म समीक्षा के नहीं, आए जितने सोमवार को दिन भर आए। ‘कहो ना प्यार है’ की कहानी कोई बहुत अनोखी नहीं थी फिल्म की लेकिन फिल्म का हीरो अनोखा था। एक जैसी शक्लों वाले दो लड़के एक ही लड़की के जीवन में अलग अलग मौकों पर आते हैं। वो कहते हैं ना कि इंसान को जीवन में प्यार कई बार होता है, लेकिन एक समय में वह एक से होता है। कहानी की नायिका सोनिया की कहानी भी यही थी। राज और रोहित दोनों से उसे प्यार होता है, लेकिन अलग अलग वजहों से, अलग अलग मौकों पर। फिल्म इतनी लोकप्रिय है कि अगर आप ये बाइस्कोप पढ़ रहे हैं तो फिल्म तो आपने ये अब तक देख ही रखी होगी। तो कहानी के विस्तार में न जाते हुए इसके रोचक किस्सों पर ही टिके रहते हैं।
 

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कहो ना प्यार है - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ ने बॉक्स ऑफिस पर कमाई का अपनी रिलीज के साल में तो रिकॉर्ड बनाया ही, इसने एक रिकॉर्ड सबसे ज्यादा पुरस्कार बटोरने का भी बनाया। अकेले फिल्मफेयर पुरस्कारों में इस फिल्म ने नौ पुरस्कार समेट लिए थे। ऋतिक रोशन अब तक के इकलौते ऐसे अभिनेता हैं, जिन्होंने फिल्मफेयर का बेस्ट एक्टर और बेस्ट डेब्यू मेल दोनों पुरस्कार एक ही साल मिले। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में इसकी एंट्री हुई एक ऐसी फिल्म के लिए जिसने साल 2002 तक कुल मिलाकर 92 पुरस्कार जीत लिए थे। बाद में हालांकि ये गिनती और भी बढ़ती रही। हिंदी सिनेमा की ये अब तक की सर्वाधिक पुरस्कार जीतने वाली फिल्म है। राकेश रोशन हिंदी फिल्मों में 1970 से काम करते रहे, लेकिन उनको अपने करियर का पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिला तो फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ के लिए।

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कहो ना प्यार है - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

फिल्म को बनने में करीब दो साल का वक्त लगा। ये उन दिनों की बात है जब मशहूर हीरोइन बबीता अपनी दूसरी बिटिया करीना को लेकर फिल्म निर्माता निर्देशकों के यहां चक्कर लगाया करती थीं। सबसे उनकी जान पहचान थी। सब खूब खातिरदारी करते हुए मिलते भी थे। लेकिन, हिंदी सिनेमा में पहला मौका ही सबसे मुश्किल काम होता है। राकेश रोशन ने अपना करियर मोहन कुमार के सहायक निर्देशक के तौर पर शुरू किया था। राजेंद्र कुमार की फिल्म ‘अनजाना’ में बबीता हीरोइन थीं और राकेश रोशन उस फिल्म के सेट पर एक सहायक निर्देशक। बबीता का रुआब बताते हैं तब जैसा था वैसा ही अब भी बना रहा। राकेश रोशन फिल्म की शूटिंग की शुरुआत एक गाने से करना चाहते थे और बबीता अड़ी थी कि नहीं पहला सीन संवाद वाला होना चाहिए। बस मामला यहीं से बिगड़ना शुरू हुआ, ये बात फिल्म के पहले शेड्यूल के पहले दिन की शूटिंग शुरू होने से चार दिन पहले की है।

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