अनुपम खेर जैसे कद्दावर कलाकार और दिलीप कुमार जैसे कालजयी अभिनेता का कैमरे के सामने पहली बार आमना सामना, हिंदी सिनेमा के किसी भी सुधी दर्शक को उन दिनों तो क्या अब भी रोमांचित कर देता है। अनुपम खेर ही क्यों दिलीप कुमार के साथ काम करके फिल्म का हर सितारा ही उत्साह में रहा फिल्म ‘कर्मा’ का। सुभाष घई ने अपनी कंपनी मुक्ता आर्टस बनाकर इसके लिए फिल्में बनाने की शुरूआत फिल्म ‘हीरो’ से की। बतौर प्रोड्यूसर ‘कर्मा’ सुभाष घई की दूसरी फिल्म है और बतौर निर्देशक नौवीं। ये फिल्म बनाने के लिए सुभाष घई ने हर फॉर्मूला, हर हथकंडा और हर जुगत आजमाई। फिल्म में इतने सारे सितारे एक साथ लाना आसान नहीं था। प्रोड्यूसर के तौर पर घई ने साम, दाम, दंड भेद सब अपनाए, और डायरेक्टर के तौर पर घई ने किस्से, कहानियां, कलाकारी, रंगदारी सब दिखाई और ये फिल्म जैकी श्रॉफ, मीनाक्षी शेषाद्रि व डिंपल कपाड़िया की केतन देसाई निर्देशित फिल्म ‘अल्ला रखा’ से हफ्ता भर पहले रिलीज होकर मैदान मार ले गई।
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मनमोहन देसाई से अदावत
ये उन दिनों की बात है जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके आवास पर ही हत्या कर दी गई थी। औऱ, अपने बालसखा का राजीव गांधी का हाथ बंटाने अमिताभ बच्चन राजनीति में चले गए थे। अमिताभ बच्चन ने उन दिनों तमाम फिल्में छोड़ दी थीं। उनमें एक फिल्म सुभाष घई की शामिल थी, ‘शेर बहादुर’। ये फिल्म ‘हीरो’ और ‘मेरी जंग’ की रिलीज के बाद शुरू होनी थी। ये फिल्म बंद हुई तो सुभाष घई ने ‘कर्मा’ शुरू की। एक तरह से देखा जाए तो मशहूर पटकथा लेखक सचिन भौमिक के साथ मिलकर सुभाष घई ने रमेश सिप्पी की फिल्म ‘शोले’ का नया संस्करण तैयार कर दिया था। जेल से छूटे बदमाश वहां भी मेन विलेन को पकड़ने निकलते हैं, यहां भी जेल में फांसी की सजा पाए कैदी सीतापुर जेल के जेलर की मदद करने निकलते हैं।
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जैकी श्रॉफ के सुपरस्टाडम के दिन
अमिताभ बच्चन ने एक फिल्म निर्माता मनमोहन देसाई की भी तब छोड़ी थी ‘अल्लारखा’। इस फिल्म से मनमोहन देसाई के बेटे केतन ने बतौर डायरेक्टर अपना डेब्यू किया। अमिताभ बच्चन की सिफारिश पर ही मनमोहन देसाई ने ‘अल्लारखा’ में अमिताभ के लिए लिखा लीड़ रोल जैकी श्रॉफ को दिया और उन्हें इतने रुपये दिए कि सुभाष घई को लगा कि उनका बनाया हीरो उनके ही हाथ से निकल जाएगा। ‘कर्मा’ और ‘अल्लारखा’ की शूटिंग साथ चल रही थी। इस दौरान जैकी श्रॉफ के साथ बहुत ज्यादती हुई। घई उन्हें देर तक लोकेशन पर रोके रखते और मनमोहन देसाई उनसे देरी से पहुंचने पर कई बार बहुत बेरुखी से पेश आते। दोनों फिल्मे रिलीज तक एक ही दिन होने वाली थीं। लेकिन, फिर मनमोहन देसाई औऱ सुभाष घई ने बैठक की और रिलीज में एक हफ्ते का अंतर तय किया। उन दिनों सुभाष घई बहुत खार खाए रहते थे मनमोहन देसाई से हालांकि इसे कभी उन्होंने स्वीकार नहीं किया।
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फरहा नाज को नहीं मिली ‘कर्मा’
सुभाष घई के ये वो दिन थे, जब उन्हें पारस पत्थर समझा जाता था, जिस कलाकार के वह हाथ लगा देते वो सुपरस्टार हो जाता। ‘कालीचरण’ और ‘विश्वनाथ’ उनकी हिट फिल्में थीं। ‘कर्ज’ और ‘गौतम गोविंदा’ ने भी अच्छा नाम कमाया। ‘क्रोधी’ में थोड़ा वह डांवाडोल होते दिखे लेकिन ‘विधाता’, ‘हीरो’ और ‘मेरी जंग’ की हैट्रिक ने उनका नाम नए शो मैन के रूप में चर्चित कर दिया। इस शो मैन का असल इम्तिहान फिल्म ‘कर्मा’ में हुआ औऱ जिसमें वह सम्मान सहित उत्तीर्ण हुए। इस फिल्म में जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर के लिए सुभाष घई जब हीरोइनें तलाश रहे थे तो श्रीदेवी का नाम तो जैसी ही फाइनल हुआ, उनकी लिखापढ़ी भी फटाफट हो गई, लेकिन अनिल कपूर के साथ पूनम ढिल्लों को लाने का भी एक किस्सा है।
इस रोल के लिए सुभाष घई का बड़ा मन था तब्बू की बहन फरहा नाज को लेने का। फरहा नाज तब यशराज फिल्म्स के करार में बंधी थी और यश चोपड़ा ने तब घई के चाहने पर भी उन्हें अपनी फिल्म ‘फासले’ के रशेज दिखाने से इंकार कर दिया। घई इस रोल के लिए गांव की गोरी सी दिखने वाली एक लड़की लेना चाहते थे। ये बात पूनम को पता चली तो वह खुद जाकर सुभाष घई से मिलीं और उन्हें फिल्म मिल गई।
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अनुपम खेर का पहला दिन
पत्रकार अली पीटर जॉन के साथ फिल्मफेयर की पार्टी में बिना बुलाए जा पहुंचे अनुपम खेर की पहली मुलाकात दिलीप कुमार से गेटक्रेशर बनकर हुई। दिलीप उन्हें पहचान नहीं पाए और पूरी पार्टी में उनका हाथ थामे घूमते रहे। अनुपम अपनी असलियत तब बता ही नहीं पाए और फिर वो लम्हा भी आया जब अनुपम खेर न सिर्फ दिलीप कुमार को बल्कि पूरी दुनिया को बताया कि वह कौन हैं। सारांश रिलीज हो चुकी थी और सुभाष घई ने उन्हें साइन किया था फिल्म कर्मा के लिए। हिंदी सिनेमा में खलनायकों के कुछ ही किरदार हुए हैं जिनके नाम लोगों को दशकों बाद भी याद रहे, जैसे कि गब्बर सिंह, डॉक्टर डैंग और मोगैम्बो। कर्मा में अनुपम खेर ने डॉक्टर डैंग का रोल किया है, हालांकि पहले ये रोल अमरीश पुरी के हिसाब से गढ़ा गया था।
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