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बाइस्कोप: बिनब्याही मां की कहानी ‘क्या कहना’ की रिलीज के 20 साल पूरे, इन वजहों से बनी ऑलटाइम क्लासिक

Tue, 19 May 2020 06:28 PM IST
anand anand पंकज शुक्ल, मुंबई
पंकज शुक्ल, मुंबई Published by: anand anand Updated Tue, 19 May 2020 06:28 PM IST
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kya kehna movie this day that year series by pankaj shukla 19 may 2000 bioscope amitabh bachchan
क्या कहना - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

हिंदी सिनेमा के दो चर्चित निर्देशकों फरहान अख्तर और जोया अख्तर रिश्ते में भाई बहन हैं। फरहान थोड़ा विनम्र और शांत किस्म के इंसान हैं। जोया के भीतर हमेशा एक कभी भी फट पड़ सकने वाला गुस्सा भरा रहता है। फिल्म इंडस्ट्री में दोनों के साथ काम कर चुके लोग दोनों के बारे में तमाम किस्से भी सुनाते हैं लेकिन, शायद ये किस्सा आपने नहीं ही सुना होगा कि इन दोनों की परवरिश के लिए इनकी मां को कितने पापड़ बेलने पड़े थे। ये उन दिनों की बात है जब सलीम जावेद की जोड़ी हिंदी सिनेमा में धीरे धीरे अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रही थी। ये दोनों हेमा मालिनी की फिल्म सीता और गीता लिख रहे थे और इसी फिल्म में एक खास किरदार निभा रही थीं 16 साल की कलाकार हनी ईरानी।



हनी ने 1959 में रिलीज हुई फिल्म चिराग कहां रोशनी कहां से बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम शुरू किया था। राजेश खन्ना की फिल्मों कटी पतंग और अमर प्रेम में भी वह दिखीं। परदे पर फिल्म सीता और गीता उनकी अदाकारी का आखिरी पड़ाव रहा। इधर उधर भटकते फिर रहे जावेद अख्तर से हनी ईरानी ने शादी कर ली। हनी की बड़ी बहन मेनका खान के यहां दोनों को आसरा मिला। मेनका के दोनों बच्चे बड़े होकर साजिद खान और फराह खान के रूप में मशहूर हुए हैं। इधर, हनी के बच्चे जब बड़े हो रहे थे तो जावेद अख्तर किसी और के हो गए। अकेली मां के तौर पर फरहान और जोया की परवरिश में हनी ने एक वक्त ऐसा भी आया जब साड़ियों की कढ़ाई करके पैसे जुटाए। इन्हीं हनी ईरानी ने हिंदी सिनेमा में बिनब्याही मां के विषय पर कमाल की फिल्म लिखी, क्या कहना। प्रीति जिंटा की डेब्यू फिल्म यही होनी थी। कुछ और किस्से इस फिल्म के बारे में, आज के बाइस्कोप में।

 

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क्या कहना - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

हिंदी सिनेमा की कालजयी फिल्म जाने भी दो यारों निर्देशित करने वाले कुंदन शाह ने वैसे तो फिल्मों और टेलीविजन में तमाम कमाल किए हैं। लेकिन, फिल्म क्या कहना उनका सबसे बड़ा कमाल रहा। कमाल ये कि तमाम मुश्किलों के बावजूद ये फिल्म वह पूरी कर सके। और, उससे बड़ा कमाल ये कि जिस फिल्म को उसके निर्माताओं ने ही नकार दिया था, वह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट हो गई। फिल्म में मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे गानों और राजेश रोशन के संगीत का असर ये रहा कि इसका म्यूजिक उस साल यानी साल 2000 में बिके फिल्म म्यूजिक के टॉप 10 में शामिल रहा। और अपनी रिलीज के 20 साल पूरे कर रही फिल्म प्रीति जिंटा की इस फिल्म के नाम ही ये भी कमाल हमेशा रहेगा कि इस फिल्म के निर्माता चाहकर भी इसके हीरो चंद्रचूड़ सिंह को बीच फिल्म से निकाल नहीं पाए। और, वो तब जब कि चंद्रचूड़ सिंह की जगह काम करने को जो हीरो तैयार हुआ था वो कोई और नहीं बल्कि थे, सलमान खान।

कुंदन शाह ने क्लासिक फिल्म जाने भी दो यारों बनाने के बाद अपने असिस्टेंट रहे विधु विनोद चोपड़ा के लिए उनकी पहली फिल्म खामोश लिखी और उसके बाद टीवी पर नुक्कड़ और वागले की दुनिया बसाने में व्यस्त हो गए। शाहरुख खान के करियर की तमाम खास फिल्मों में गिनी जाने वाली फिल्म कभी हां कभी ना निर्देशित करने के बाद उन्होंने शुरू की थी, क्या कहना। क्या कहना की कहानी हनी ईरानी की लिखी है। हनी ईरानी ने जावेद अख्तर से अलग होने के बाद ही अपनी पहले की लिखी कहानियों को सीरियसली लेना शुरू किया। यशराज फिल्म्स के लिए लगातार चार फिल्में लम्हे, परंपरा, आईना और डर लिखने के बाद हनी ईरानी ने फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगी की कहानी की क्रेडिट्स में अपना नाम न दिए जाने से नाराज होकर यश चोपड़ा के साथ काम करना बंद कर दिया था।

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क्या कहना - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

क्या कहना की बहुत कुछ कहानी उनके अपने संघर्ष से भी प्रेरित रही। फिल्म में गुलशन और रोहिणी की बेटी प्रिया से अजय प्यार करता है। लेकिन कॉलेज में प्रिया को राहुल अच्छा लगता है। दोनों में दोस्ती होती है, प्रेम होता है और एक दिन प्रिया को पता चलता है वह गर्भवती है। प्रिया के माता पिता पहले तो राहुल के घर जाकर दोनों की शादी की बात करते हैं पर बेइज्जत होने पर वह प्रिया को ही घर से निकाल देते हैं। प्रिया तमाम दिक्कतों के बाद भी गर्भपात को राजी नहीं होती है और अपने बच्चे को जन्म देना चाहती है। प्रिया का मां बनने का ये संघर्ष ही फिल्म को महिला दर्शकों की सहानुभूति दिलाने में सफल रहा। हनी ईरानी को फिल्म क्या कहानी की कहानी के लिए फिल्मफेयर बेस्ट स्टोरी अवार्ड भी मिला।

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क्या कहना - फोटो : सोशल मीडिया

फिल्म के मुख्य हीरो के तौर पर कुंदन शाह ने अमिताभ बच्चन की कंपनी एबीसीएल की खोज रहे चंद्रचूड़ सिंह को लिया था। चंद्रचूड़ को अपनी पहली फिल्म तेरे मेरे सपने के बाद अपनी अगली फिल्म माचिस में काफी तारीफें भी मिली और पुरस्कार भी मिले। लेकिन, फिल्म क्या कहना के बनते बनते उनकी शोहरत कम होने लगी। फिल्म जब आधी बन चुकी थी तो कहते हैं कि फिल्म के निर्माता रमेश तौरानी ने सलमान खान से इस फिल्म के लिए वक्त निकालने की गुजारिश की। सलमान मान भी गए। लेकिन, कलाकारों की संस्था सिनटा का ये नियम है कि अगर किसी कलाकार की जगह बीच फिल्म में किसी दूसरे कलाकार को लिया जाता है तो पहले कलाकार का अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जरूरी है। चंद्रचूड़ ने ये एनओसी देने से इंकार कर दिया। इस सबके चक्कर में फिल्म लगातार लेट होती रही। फिल्म में सैफ अली खान ने ग्रे शेड्स वाला रोल पहली बार किया, हालांकि क्लाइमेक्स में उनके किरदार राहुल का हृदय परिवर्तन भी होता दिखाया गया है।

फिल्म क्या कहना एक तरह से प्रीति जिंटा के करियर की सबसे अहम फिल्म रही। अब तक उनकी फिल्में दिल से और सोल्जर रिलीज हो चुकी थीं। मणिरत्नम की फिल्म दिल से फ्लॉप रही थी सो उनके तिलिस्म में इससे कोई इजाफा नहीं हुआ। सोल्जर सुपरहिट रही पर इसकी कामयाबी दिल्लगी और संघर्ष ने धो डाली। क्या कहना ने प्रीति के तेजी से गोता लगाते करियर को संभाल लिया था। डिंपल गर्ल प्रीति जिंटा को अदाकारी का मौका यूं तो संघर्ष में भी फिल्म की निर्देशक तनूजा चंद्रा ने दिया था, लेकिन वहां न स्क्रिप्ट ने उनके किरदार रीत ओबेरॉय को संभाला और न ही निर्देशक ने उनके किरदार पर ज्यादा फोकस ही किया। वहां अक्षय कुमार और आशुतोष राणा सारी लाइमलाइट बटोरते रहे।

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क्या कहना - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

क्या कहना में पूरा फोकस प्रीति जिंटा पर रहा। कॉलेज में जब छात्र प्रिया की खिल्ली उड़ाते हैं और जब वह स्टेज पर आकर क्लाइमेक्स से ठीक पहले अपने मन की बात कहती है तो पूरा हॉल में सन्नाटा छा जाता है। 20 साल पहले महिला सशक्तीकरण का इतना जोर नहीं था लेकिन तब भी तमाम महिलाओं ने हॉल में खड़े होकर इस स्पीच पर तालियां बजाईं थीं। कायदे से तो इस अभिनय के लिए प्रीति जिंटा को बेस्ट एक्टिंग का नेशनल फिल्म अवार्ड मिलना चाहिए था लेकिन सारे पुरस्कार अपना आकार अपनी जूरी के हिसाब से लेते रहे हैं। उन्हें सैनसुई बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड से ही संतोष करना पड़ा। कोई पांच करोड़ रुपये से बनी इस फिल्म ने तब अपने म्यूजिक, बॉक्स ऑफिस कलेक्शन और सैटेलाइट राइट्स मिलाकर 20 करोड़ रुपये से ऊपर का कारोबार किया था। ये फिल्म महिला सशक्तीकरण पर बनी हिंदी सिनेमा की चंद बेहतरीन फिल्मों में आज भी शुमार की जाती है।

रिलीज के 20 साल पूरे होने की खुशी प्रीति जिंटा सोशल मीडिया पर मना रही हैं। फिल्म के बाकी कलाकारों और मुख्य तकनीशियनों में से फिल्म के निर्देशक कुंदन शाह का तीन साल पहले 7 अक्टूबर को निधन हो चुका है। सैफ अली खान अपनी दूसरी पत्नी और तीसरे बच्चे के साथ आनंद से हैं। उनकी एक वेब सीरीज जल्द ही प्राइम वीडियो पर रिलीज होने वाली है। पिछली फिल्म तानाजी में वह अजय देवगन के सामने विलेन के रोल में नजर आए थे। चंद्रचूड़ सिंह फिल्मों से करीब करीब रिटायर हो चुके हैं। कभी कभार इक्का दुक्कारोल में वह दिख जाते हैं। प्रीति जिंटा भी कामयाब बिजनेसवूमन बन चुकी हैं। क्रिकेट से उनका लगाव बना हुआ है। फिल्मों में उनकी जैसी दमदार अदाकारा की एक जगह शायद अब भी खाली है जो अपनी पहली ही फिल्म में शाहरुख खान जैसे सितारे से आंखों में आंखे डालकर पूछ सके, आर यू वर्जिन?

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(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)
 

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