वेब सीरीज रिव्यू: एलओएल- हंसे तो फंसे
कलाकार: बोमन ईरानी, अरशद वारसी, साइरस बरूचा, सुरेश मेनन, सुनील ग्रोवर, अंकिता श्रीवास्तव, आकाश गुप्ता, अदिति मित्तल, गौरव गेरा, आदर मलिक, मल्लिका दुआ और कुशा कपिला।
ओटीटी: अमेजन प्राइम वीडियो
रेटिंग: *1/2
दूसरों को छुप छुप कर देखना और मजे लेना एक अलग ही आर्ट है। मानवीय स्वभाव ही होता है ऐसा कि जो न देखने को कहा जाए, मन उसी तरफ सबसे पहले भागता है। उस लिहाज से देखें तो प्राइम वीडियो का नया वेब शो ’एलओएल- हंसे तो फंसे’ दर्शनरति के जाल में खुद ही फंसता नजर आता है। यहां ‘बिग बॉस’ के आइडिया में ‘कॉमिकस्तान’ फंसाने की कोशिश की गई है। कॉमेडी शो हंसाने के लिए होते हैं। इस शो का मूल विचार ये है कि जो भी प्रतियोगी बंद हवा में हंसेगा वह महल के बाहर होगा। दावा है कि खेल छह घंटे में खेला गया है। उसी हिसाब से इसके एपीसोड हैं। लेकिन, लगातार तो खैर कहने को ही होगा क्योंकि जिस हिसाब से शो का सेट, इसकी कॉस्ट्यूम्स और प्रॉपर्टी हैं, उसमें इसे शूट करने में छह दिन तो कम से कम लगे ही होंगे। शो अपने कॉन्सेप्ट लेवल पर ही फेल है। हां, गनीमत ये है कि पहला एपीसोड छोड़ बाकी सब आधे घंटे से कम के ही हैं।
2 of 5
एलओएल- हंसे तो फंसे रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
प्राइम वीडियो देश में कदम रखने के दिन से कॉमेडी में कुछ बढ़िया करने की सोच रहा है, लेकिन उसकी सोच उसके क्रिएटिव रूम से आगे या कहें कि जाकिर खान से आगे नहीं जा पा रही थी। बहुत मुश्किल से मामला आगे बढ़ा है और ये शो बना है, ’एलओएल- हंसे तो फंसे’। शो का कॉन्सेप्ट कमाल का है। लेकिन, इसका एपीसोड डिवीजन, एलीमनेशन राउंड, मेजबानों की स्क्रिप्ट और एपीसोड वार इसके टास्क सब गड़बड़ हैं। अमेजन प्राइम वीडियो की नॉन फिक्शन क्रिएटिव टीम को जरूर पहली बार सुनने पर ये आइडिया धांसू लगा होगा, लेकिन अरशद वारसी और बोमन ईरानी जिस तरह की बातें करके पहले ही एपीसोड में अपनी अपनी ब्रांडिंग खराब करते हैं, वह खतरे की घंटी बजा देता है। कहने को ये कॉमेडी रियलिटी शो है। रियलिटी शो सिर्फ कहने को अनस्क्रिप्टेड होते हैं, ये तो अब बच्चा बच्चा जानता है कि जो कुछ भी स्क्रीन पर होता है, वह बिना स्क्रिप्ट के नहीं होता। बोमन ये बात मान भी लेते हैं।
3 of 5
एलओएल- हंसे तो फंसे रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
तो, वेब रियलिटी शो ’एलओएल- हंसे तो फंसे’ की कमजोर कड़ियां क्या हैं? गिनने बैठेंगे तो दर्जन भर तो निकलेंगी ही, लेकिन शुरूआत करते हैं इसकी कास्टिंग से। 2021 के किसी कॉमेडी रियलिटी शो की ऐसी कास्टिंग वही कर सकता है जिसने सोशल मीडिया, टिक टॉक, रील, टकाटक, फेसबुक और ट्विटर पर चलने वाले मीम्स और फनी वीडियोज से पूरी तरह मुंह मोड़ रखा हो। ये कास्टिंग 2021 की बजाय 2016 की लगती है। तब साइरस बरूचा, सुनील ग्रोवर, मल्लिका दुआ और आकाश गुप्ता को देखने का मन भी कर सकता था। सुनील ग्रोवर तो फिर भी थोड़ा ओरीजनल अब भी बचे हैं, बाकी इनमें से किसी के पास कुछ नया सोचने दिखाने को बचा नहीं है। तभी तो पहले एपीसोड से ही ये कलाकार अपने हुनर का नहीं बल्कि तमाशे का सहारा लेना शुरू करते हैं। गौरव गेरा नकली दांत लगा लेते हैं। बाकी सब कुछ कुछ नकली टाइप करने लगते हैं और शो के ओरीजनल पंच का सोडा फुस्स हो जाता है।
4 of 5
एलओएल- हंसे तो फंसे रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कुशा कपिला, आदर मलिक, अंकिता श्रीवास्तव के पास बिना स्क्रिप्ट के दर्शकों को बांधे रखने की क्षमता है ही नहीं। वह जो कुछ कैमरे के सामने करते हैं, वह कॉमेडी शो का हिस्सा नहीं लगता। कई बार तो उनकी हरकतें देखकर लगता है कि प्राइम वीडियो की क्रिएटिव टीम को अपने यूजर्स का प्रोफाइल ही नहीं पता है और न ही उनको ये पता है कि प्राइम वीडियो की अपनी असली ब्रांडिंग भारत में क्या है? बोमन ईरानी ब्रीफकेस में 25 लाख लेकर यूं घूमते दिखाए जाते हैं जैसे पुरानी हिंदी फिल्मों का कोई स्मगलर हीरे लेकर भाग रहा हो। बोमन और अरशद की आपसी बातचीत इस शो का हाइलाइट प्वाइंड हो सकती थी लेकिन दोनों की आपसी बातचीत इतनी बनावटी है कि साफ पकड़ में आती है।
5 of 5
एलओएल- हंसे तो फंसे रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
शो के बारे में खास हिंदी पट्टी के पाठकों, श्रोताओं व दर्शकों को पहले से कुछ बताने की जरूरत भी प्राइम वीडियो ने समझी नहीं है। शो के कलाकारों की भी शो की रिलीज से पहले ऐसे लोगों से ही बातें कराई गईं जो उनको सेफ जोन में रख सकें। शो कमजोर है, इसकी कड़ियां यहीं से खुलनी शुरू हो जाती है। शो को पूरा देखना अपने आप में बड़ी चुनौती है। वह इसलिए भी क्योंकि शो बनाने वालों ने इसके विजेता को लेकर भी शायद अपनी स्क्रिप्ट पहले से तैयार रखी होगी। आखिरी में बचने वाले तीनों फाइनलिस्ट्स के पहले का खेल भी दिखता है और आखिर में होने वाला खेल भी साफ समझ आता है। ’एलओएल- हंसे तो फंसे’ के शुरू के तीनों एपीसोड मामला जमाने में निकल जाते हैं और खेल जम पाए उससे पहले ही जब ये पिघलने लगता है तो बाकी के तीनों एपीसोड उसका रायता समेटने में निकल जाते हैं। इससे अच्छा तो ऋषिकेश मुखर्जी की ‘गोलमाल’, ‘बावर्ची’ या ‘चुपके चुपके’ एक बार फिर से देख लेना बेहतर है।