Trailer Review: लूडो
कोई डेढ़ दर्जन टेलीविजन शोज से जुड़े रहे अनुराग बसु को हिंदी भाषी फिल्म दर्शकों की नब्ज पता है। 10वीं पिक्चर लेकर वह एक बार फिर हाजिर हैं। सिनेमा में उनकी एंट्री मुकेश भट्ट और महेश भट्ट की कंपनी विशेष फिल्म्स से हुई। दोनों भाइयों के जुहू वाले दफ्तर में अनुराग ने सिनेमा के शुरुआती गुर सीखे, महेश भट्ट से खूब डांट खाई और फिर अपना एक अलहदा सिनेमा विकसित किया। ‘लूडो’ अनुराग बासु की स्टाइल का सिनेमा है, वह सिनेमा जिसके बीज उन्होंने विशेष फिल्म्स से छुटकारा पाने के बाद की अपनी पहली फिल्म ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ में बोए थे।
Ludo Trailer Review: अनुराग बसु के ये हैं दैमार, सीको पटाखा, सुतली बम व अनार, बोनस में फुलझड़ियां
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चौराहे सी हो चुकी जिंदगी के मुसाफिरों को अनुराग ने अपनी इसके बाद की तीनों फिल्मों ‘काइट्स’, ‘बर्फी’ और ‘जग्गा जासूस’ में अलग अलग तेवरों और तरकीबों से पेश किया। ‘बर्फी’ ने उनको विश्व सिनेमा के किसी भी बड़े निर्देशक के बराबर में लाकर खड़ा कर दिया तो ‘जग्गा जासूस’ ने बताया कि प्रयोगधर्मिता बहुत अच्छी बात है लेकिन सिनेमा अब भी भारत में एक ऐसा उत्पाद है जो हो कितना ही अच्छा पर उसका बिकना उससे ज्यादा जरूरी है। ‘जग्गा जासूस’ में पटरी में उतरी गाड़ी का स्टीयरिंग वह ‘लूडो’ में फिर से मजबूती से थामे नजर आ रहे हैं।
सिनेमा के शौकीन इस साल की दीवाली थिएटरों में कम और अपने अपने मोबाइल पर ज्यादा मनाते दिख सकते हैं। अक्षय कुमार ने ‘लक्ष्मी बॉम्ब’ में हंसी की फुलझड़ियां छुड़ाने की तैयारी की है तो इस दीवाली के असली बम ‘लूडो’ के ट्रेलर में दिखाई दिए। यहां दीवाली जैसा पूरा इंतजाम भी दिखता है। राजकुमार राव दैमार पटाखे जैसे उछलते दिखते हैं, आदित्य राय कपूर की अदाकारी अनार जैसी है, अभिषेक बच्चन सीको पटाखा हैं और असल सुतली बम जैसे दिखते हैं पंकज त्रिपाठी। साथ में फातिमा सना शेख और सान्या मल्होत्रा की फुलझड़ियां भी हैं।
‘लूडो’ के ट्रेलर से इतना तो समझ आता है कि ये चार खिलाड़ी जो खेल खेल रहे हैं, उनमें सबके किरदारों की तुरपाई कहीं न कहीं से उधड़ी है। किडनैपर अनाड़ी है, माशूक के पति को जेल तोड़कर निकालने निकला वेटर खिलाड़ी है। छोटे शहर का बड़ा दादा जैसा दिखता एक ‘आइटम’ है जिसकी गर्दन हर जगह घुसती है और चुटहिल भी होती है। एक और आशिक है जिसकी जिंदगी शायद टेक्स्ट बुक की बजाय कुंजी के सहारे चल रही है।
किरदार निराले हैं। कुछ कुछ देखे भाले हैं। ‘लूडो’ की बाजी में इस बार अनुराग बासु ने कहानियों के पासे कुछ ऐसे ही डाले हैं। ट्रेलर में दिखी चारों कहानियां एक फिल्मावली बनाती चलती हैं कुछ कुछ ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ जैसी। ट्रेलर का असर भी वैसा ही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि फिल्म भी वैसी ही हो ताकि अनुराग बासु के निर्देशन की गाड़ी फिर से रफ्तार पकड़ सके।