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Movie Review: अमिताभ बच्चन के लिए जरूर देखें '102 नॉट आउट', जिंदगी में रोमांच रहना चाहिए

Fri, 04 May 2018 01:31 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Fri, 04 May 2018 01:31 PM IST
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Movie Review of 102 not out the life of amitabh bachchan as father and rishi kapoor as son
102 Not Out

निर्माताः ट्रीटॉप एंटरटेनमेंट/बैंचमार्क पिक्चर्स


निर्देशकः उमेश शुक्ला
सितारेः अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, जिमित त्रिवेदी
रेटिंग ***


ये जीना भी कोई जीना है लल्लू। सुस्त-सुस्त। ढीले-ढीले। मरे-मरे। न सांसों के आने की खबर, न जाने का पता। '102 नॉट आउट' ऐसी जिंदगी के खिलाफ है। जब तक जियो, जिंदादिली से जियो। स्फूर्ति, चुस्ती और खुशी से जियो। मूल संदेश यही है। 102 बरस के दत्तात्रेय वखारिया (अमिताभ बच्चन) की समस्या है उनका 75 साल का बेटा, बाबूलाल (ऋषि कपूर)। जो बूढ़ा हो चुका है। नहाता भी घड़ी के टाइम से है और डॉक्टर के पास हर दिन पहुंच जाता है। बरसों से वह एक ही चादर लपेट कर सोता है और उसे खुश रहने से एलर्जी है।

Movie Review of 102 not out the life of amitabh bachchan as father and rishi kapoor as son
102 नोट आउट - फोटो : self

दत्तात्रेय ने पढ़ा है कि ज्यादा दिनों तक जीना है तो अपने आसपास उदास, बोर लोगों को न रहने दो। उदासी और बोरियत छूत की बीमारी है। नतीजा यह कि दत्तात्रेय बूढ़े बेटे को वृद्धाश्रम में भर्ती कराने का फैसला करते हैं। बेटा तैयार नहीं है। तब दत्तात्रेय कहते हैं कि उनके साथ रहना है तो कुछ शर्तें लागू होंगी। वो क्या...? '102 नॉट आउट' जिंदगी के पक्ष में खड़ी फिल्म है लेकिन इसकी कथा/पटकथा में गंभीर समस्याएं हैं। वे इसे कमजोर करती हैं। खास तौर पर पहले हिस्से में, जहां फिल्म एक ही जगह पर ठहरी हुई, धीमी रफ्तार से उबाती है। एक के बाद एक शर्तें सामने आती हैं और उनमें कुछ विशेष नहीं होता। आप सिर्फ पाते हैं कि पिता अपने बेटे को रास्ते पर लाना चाहता है। चिंता छोड़, सुख से जी। 

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102 Not Out

दूसरे हिस्से में जरूर थोड़ा रोमांच है जब कहानी कुछ कुछ फिल्म 'बागवां' (2003) के अंदाज में आगे बढ़ती है। यहां बेटा-बेटी की जगह पोता नजर आता है। फिल्म उस पीढ़ी की सख्ती से खबर लेती है, जो अपने बूढ़े मां-बाप को भुला देती है। दत्तात्रेय का नया रूप उभरता है और बाबू के रंग भी धीरे-धीरे बदलते हैं। वास्तव में '102 नॉट आउट' कुछ पंच और अमिताभ बच्चन की बेहतरीन अदायगी की वजह से देखने के काबिल है। वर्ना कुछ खास नहीं है। बढ़ती उम्र के बावजूद अमिताभ ठहरने का नाम लेते। उनकी ऊर्जा हैरान करती है। अभिनय उनके बाएं हाथ का खेल लगने लगता है।

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102 Not Out

ऋषि कपूर जमते हैं लेकिन उनका किरदार बेहद निष्क्रिय किस्म का है। इस सितारे को उसकी उर्जा के लिए पसंद करने वाले निराश होंगे। 102 मिनट की फिल्म में चुनिंदा किरदार हैं और यह रंगमंचीय प्रोजेक्ट जैसी लगती है। फिल्म एक नाटक पर आधारित है और उमेश शुक्ला इसे फिल्मी व्याकरण में पिरोने में नाकाम रहे। वह अमिताभ-ऋषि जैसे ऐक्टरों की प्रतिभा का सही इस्तेमाल नहीं कर सके। अब ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा? 

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Movie Review of 102 not out the life of amitabh bachchan as father and rishi kapoor as son
Amitabh Bachchan,

फिल्म उन लोगों की जरूर कुछ मदद कर सकती है जो जिंदगी से ऊबे और ठहरे हैं। '102 नॉट आउट' जिंदगी में रुकने और मरने के सख्त खिलाफ है। आप जहां हैं, वहीं कदमताल करते रहिए। जिंदगी के कदमों की आहट सुनाई देती रहेगी।

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