इटावा के करीमुद्दीन आसिफ, सीतापुर के मिर्जा वजाहत हुसैन चंगेजी और अमरोहा के सैयद अमीर हैदर कमाल नकवी। नाम पढ़ के कुछ याद आया क्या? चलिए इनके नाम फिर से लिखते हैं, के आसिफ, वजाहत मिर्जा और कमाल अमरोही। जैसे अब आपको ये बात चमकी, वैसे ही हर उस शख्स को चमकती है जब बात होती है हिंदी सिनेमा की सबसे नायाब फिल्म मुगल -ए -आजम की। के आसिफ की बरसों की मेहनत से साकार हुई ये फिल्म बंटवारे से पहले बननी शुरू हुई। इसके प्रोड्यूसर बदले। इसकी पूरी कास्ट बदली लेकिन न बदली तो के आसिफ की जिद। और, ये इसके बावजूद कि फिल्म की कहानी लीक होने के बाद तकरीबन इसी कहानी पर एक फिल्म बनकर रिलीज हुई और सुपरहिट भी हो गई।
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एक लाख लोग पहुंच गए टिकट खरीदने
जिस जमाने में पौने पांच रुपये का एक डॉलर हुआ करता था, उस जमाने में सिनेमा की टिकट रुपये, डेढ़ रुपये की हुआ करती थी। लेकिन, मुगल -ए -आजम की टिकट सिर्फ टिकट नहीं यादों का पूरा गुलदस्ता होता था। इसमें फिल्म की एक टिकट होती, फिल्म के फोटोग्राफ्स होते, फिल्म के गानों की बुकलेट होती और होती दूसरी कई यादगार चीजें। और कीमत, पूरे सौ रुपये। जी हां, सुनकर आप चौंक सकते हैं कि भला सन 60 में सौ रुपये की सिनेमा टिकट किसने खरीदी होगी। तो जनाब जान लीजिए कि फिल्म की एडवांस बुकिंग जिस दिन खुली उस दिन आसपास के शहरों के लोग भी बंबई पहुंच गए थे मराठा मंदिर के सामने फिल्म की टिकट के लिए लाइन लगाने।
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हाथियों पर लाया गया फिल्म का प्रिंट
बवाल हो गया था मुंबई में मुगले -ए -आजम का सिनेमाघरों में रिलीज होना। किसी फिल्म का एक साथ देश के डेढ़ सौ सिनेमाघरों में रिलीज होना उस वक्त का रिकॉर्ड था। मराठा मंदिर इस फिल्म के लिए ही रंग रोगन करके फिर से चमकाया गया था। प्रीमियर पर प्रिंट हाथियों पर लदकर आया। सिनेमा के बाहर भव्य सेट सा बनाया गया। फिल्म को पोस्टर एक जैसे रंगे जाएं इसके लिए के आसिफ ने उन दिनों की एक मशहूर पेंट कंपनी का पूरास्टॉक खरीद लिया था।
चार दिन तक लोग लाइन में लगे
इधर, मराठा मंदिर में एक शो में हजार लोगों से कुछ ही ऊपर लोगों के बैठने की जगह थी और बाहर टिकट खरीदने वाले इकट्ठा हो गए थे कोई एक लाख। थिएटर वालों को पुलिस बुलानी पड़ी। लेकिन लोग भागे नहीं। वहीं डटे रहे। दिन में चार शोज में चार हजार, हफ्ते के 28 हजार के हिसाब से चार हफ्तों के टिकट बिके और उसके बाद अगले एक महीने तक थिएटर पर बुकिंग ही बंद रही। हाल फिलहाल के बरसों में आपने एप्पल आईफोन खरीदने वालों की लाइनें देखी होंगी। मुगल -ए -आजम की रिलीज के समय ये भारत में हो चुका है कि लोग तीन- चार दिन तक लाइन में लगे रहे। घर से खाना बनकर आता। रिलीवर फ्रेश होने के लिए रिलीव करता और लोग फिर आकर लाइन में लग जाते।
एक साथ तीन भाषाओं में हुई शूटिंग
फिल्म मुगल -ए -आजम हिंदी सिनेमा के लिए एक फिल्म नहीं बल्कि कहानी है। हिंदुस्तानी (हिंदी व उर्दू) के अलावा अंग्रेजी और तमिल में भी फिल्म की शूटिंग होना तय हुई थी। हर सीन तीन बार शूट होता। लेकिन जिसका डर था बेदर्दी वही बात हो गई। अकबर के नाम से रिलीज फिल्म का तमिल संस्करण फ्लॉप रहा और के आसिफ ने इसके बाद उन सारे अंग्रेज एक्टर्स को वापस भेज दिया, जिन्हें उन्होंने मुंबई बुलाया था इस फिल्म की डबिंग करने के लिए। के आसिफ ने फिल्म पर दिल खोलकर पैसा बहाया। लेकिन फिल्म में काम करने वाले कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें पैसा काटता था, जैसे कि संगीतकार नौशाद।
ऐसे राजी हुए बड़े गुलाम अली खान
हुआ यूं कि फिल्म के लिए बड़े गुलाम अली खान को राजी करने के लिए पैसों की चमक ही काम आई थी। जिस जमाने में लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसे काबिल सिंगर एक गाने का चार- पांच सौ रुपये लिया करते थे, बड़े गुलाम अली खान ने के आसिफ को भगाने के लिए एक गाने के 25 हजार रुपये मांग लिए थे। के आसिफ तक एक ब्रीफकेस लेकर चलते थे। नोटों से भरा हुआ। उन्होंने वहीं ब्रीफकेस खोला और 25 हजार रुपये बड़े गुलाम अली खां को थमा दिए। दो गाने तय हुए। फिफ्टी परसेंट एडवांस थमाकर के आसिफ वहां से आ गए। बड़े गुलाम अली खान फिल्मों में गाने को तौहीन समझते थे लेकिन पैसा देख वह अब कैसे मना करते, मांग उन्होंने ही रखी थी, पूरी के आसिफ ने कर दी।
नौशाद ने खिड़की से बार फेंक दिया ब्रीफकेस
ये अलग बात है नोटों का ऐसा ही एक ब्रीफकेस लेकर के आसिफ जब पहुंचे थे संगीतकार नौशाद के घर तो मामला उल्टा पड़ गया था। के आसिफ ने नौशाद के घर पूरी इज्जत से एंट्री ली, कुर्सी पर बैठे और कहा कि फिल्म मुगल-ए -आजम के गाने उन्हें ही कंपोज करने हैं और ये कहकर उनके सामने ब्रीफकेस खोल दिया। के आसिफ इटावा के रंगबाज थे तो नौशाद भी ठहरे लखनऊ के नवाबी अंदाज वाले संगीतकार। उन्होंने नोटों से भरा ब्रीफकेस उठाया और खिड़की से बाहर फेंक दिया। बेगम उनकी ये देख के सन्न। के आसिफ को काटो तो खून नहीं।
20 गानों में से फिल्म में सिर्फ 12
नौशाद ने उस दिन उनसे बात तक नहीं की। उनको इस बात का ताप कि इसने कैसे पैसे को उनके हुनर का मालिक समझ लिया। नौशाद की बेगम ने बाद में दोनों में सुलह कराई। के आसिफ ने कान पकड़कर माफी मांगी और तब जाकर काम आगे बढ़ा। फिल्म के लिए कुल 20 गाने नौशाद ने बनाए थे। सारे गाने के आसिफ ने शूट भी किए लेकिन फिल्म की एडीटिंग के बाद फिल्म में कुल गाने बचे बारह। इन गानों में से हर गाना बेमिसाल। प्यार किया तो डरना क्या, बनाने के लिए नौशाद के घर की छत पर पूरी राज रतजगा हुआ था। कन्हैया जी वाले गाने को लेकर भी तमाम जिरह और बहसे हुईं।

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