{"_id":"5ef490e98ebc3e42b2400c21","slug":"parwana-this-day-that-year-series-by-pankaj-shukla-25-june-1971-bioscope-amitabh-bachchan-yogita-bali","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"बाइस्कोप: अमिताभ के गुस्से से नहीं बच पाए इस फिल्म के डांस मास्टर, नाचने पर किया कमेंट तो फिर...","category":{"title":"Reviews","title_hn":"रिव्यूज","slug":"movie-review"}}
बाइस्कोप: अमिताभ के गुस्से से नहीं बच पाए इस फिल्म के डांस मास्टर, नाचने पर किया कमेंट तो फिर...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
Link Copied
शमा कहे परवाने से, परे चला जा
मेरी तरह जल जाएगा, यहां नहीं आ..
वो नहीं सुनता उसको जल जाना होता है
हर खुशी से, हर ग़म से, बेगाना होता है...
आनंद बख्शी ने ये गाना राजेश खन्ना की साल 1971 के पहले महीने में रिलीज हुई फिल्म कटी पतंग के लिए लिखा था लेकिन अगर आपने अमिताभ बच्चन की इस फिल्म के पांच महीने बाद रिलीज हुई फिल्म परवाना देखी है तो आपको लगेगा कि ये गाना शायद इस फिल्म के लिए बिल्कुल मुफीद होता। गाने फिल्म परवाना के भी जबर्दस्त रहे। कैफी आजमी की कलम और मदन मोहन जैसे संगीतकार की धुनें। दिल से बस एक ही बात निकलती है, वाह! फिल्म परवाना हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है, लेकिन फिल्म के बारे में चर्चा करने से पहले सुन लेते हैं फिल्म का वो गाना, जो मेरा भी बड़ा फेवरिट है, सिमटी सी शरमाई सी, किस दुनिया से तुम आई हो, कैसे जहां में समाएगा....
2 of 10
परवाना
- फोटो : अमर उजाला मुंबई
किशोर कुमार के अलावा फिल्म में आशा भोसले और परवीन सुल्ताना ने शानदार गाने गाए। लेकिन फिल्म के सबसे हिट गीत का सेहरा सजा उस दोगाने के नाम, जिसमें आवाज़ें रहीं मोहम्मद रफी और आशा भोसले की। कैफी आजमी ने इस गाने में जैसे दिल निकालकर रख दिया हो और मदन मोहन, उनका संगीत तो खैर बेमिसाल होता ही है। फिल्म का बाइस्कोप दिखाने की बजाय मामला अमीन सयानी की संगीतमाला जैसा होता जा रहा है लेकिन ये गाना आपको सुनाए बिना आगे बढ़ने का दिल नहीं कर रहा तो सुनिए, जिस दिन से मैंने तुमको देखा है...
3 of 10
परवाना
- फोटो : अमर उजाला मुंबई
फिल्म के इन बेहतरीन गानों के अलावा फिल्म का एक और गाना जिक्र करने लायक है जिसमें अमिताभ बच्चन ने फिल्म की हीरोइन योगिता बाली के साथ हैदराबादी अंदाज अपनाया है। दिलचस्प बात ये है कि अमिताभ बच्चन ने इस फिल्म के बाद सीधे 1982 में आई फिल्म देशप्रेमी के गाने ‘खातून की खिदमत में सलाम अपुन का’ में ही ये हैदराबादी अंदाज अपनाया। लेकिन इन 11 सालों में समय का पहिया पूरा घूम चुका था। जिस अमिताभ बच्चन के साथ एक फ्रेम में खड़े होने को नवीन निश्चल फिल्म परवाना अपनी तौहीन समझते थे, उन्हीं अमिताभ बच्चन की सिफारिश पर मनमोहन देसाई ने फिल्म देशप्रेमी में उनको सेकंड लीड हीरो का काम दिया था। इसीलिए, गुणी लोग समझाते रहते हैं कि तख्त पाकर तख्त नशीं होने का गुरूर किसी को नहीं पालना चाहिए, शायर हबीब जालिब का मशहूर शेर है...
तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहां तख़्त-नशीं था
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था
विज्ञापन
विज्ञापन
4 of 10
परवाना
- फोटो : अमर उजाला मुंबई
नवीन निश्चल पूना फिल्म इंस्टीट्यूट के गोल्ड मेडलिस्ट थे और उन्हें इसका बहुत गुमान भी था। पहली फिल्म रेखा के साथ थी, सावन भादों। फिल्म सुपरहिट हुई और नवीन निश्चल के पैर जमीन पर नहीं टिक सके। वह खुद को सबसे बड़ा सुपरस्टार समझने लगे। उनकी शोहरत का आलम ये था कि देव आनंद के परिवार में उनका रिश्ता हुआ। फिल्ममेकर शेखर कपूर की बहन नीलू उनकी पहली पत्नी थीं। नवीन निश्चल और योगिता बाली को लेकर बनी फिल्म परवाना के समय अमिताभ बच्चन की हैसियत हिंदी सिनेमा में स्ट्रगलर जैसी तो नहीं थी लेकिन उनके भीतर के अभिनेता को तब तक कम लोग ही पहचान पाए थे। फिल्म परवाना के एक गाने में पियानो पर थिरकती अमिताभ की उंगलियों के बीच उनकी कनपटी की नसों के उठने बैठने पर अगर किसी निर्देशक का ध्यान गया होता तो समझ आया होता कि एंग्री यंगमैन तो इस इंसान के भीतर न जाने कब से कुलबुला रहा था।
विज्ञापन
5 of 10
परवाना
- फोटो : अमर उजाला मुंबई
फिल्म परवाना की कहानी इकतरफा प्यार की कहानी है। बस इसको अंजाम तक पहुंचाने में इसकी पटकथा ने अमिताभ का बहुत ज्यादा साथ नहीं दिया। फिल्म में उनका किरदार कुमार सेन एक शिल्पी और कलाकार का है। वह मन ही मन आशा को चाहता तो है लेकिन कह नहीं पाता। जब तक वो अपने दिल की बात कह पाए, आशा उसे अपना सबसे अच्छा दोस्त मानते हुए अपनी मोहब्बत का किस्सा सुना देती है। उसे एक रईसजादे राजेश से प्यार हो चुका होता है। कुमार की तो जैसे दुनिया ही इसके बाद उजड़ जाती है। आशा के जिन चाचा ने कुमार की शादी आशा से कराने का वादा किया होता है, वह एक दिन मरे मिलते हैं। कुमार और राजेश के बीच फंसी आशा का दिल राजेश के पास है, दिमाग उसे कुमार के पास भेजता है। कुमार और आशा की इस मुलाकात में असली मोहब्बत की शमा जलती है और परवाना अपने अंजाम को पहुंच जाता है।
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।