पुरानी फिल्मों के बारे में रोज लिखने का सिलसिला मैंने कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए सरकार की तरफ से घोषित लॉक डाउन के दौरान शुरू किया। बाइस्कोप नाम का ये कॉलम शुरू तो हुआ था मुंबई में सिनेमा की गतिविधियां कम होने के चलते कम हुई खबरों के चक्कर में लेकिन फिर पाठकों की प्रतिक्रियाओं और उनके लगातार इसे पढ़ते रहने से ये कॉलम एक बार शुरू होने के बाद से अब तक लगातार चल रहा है। जल्द ही ये अपनी सेंचुरी बनाने वाला है।
बाइस्कोप: उड़ान ने कपड़े तो खूब चमकाए लेकिन फायदा न विक्रमादित्य का हुआ न रजत बामरेचा का, वजह ये रही
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फिल्म उड़ान 16 जुलाई 2010 को रिलीज हुई। पिछले 10 साल में इसके मेकर्स ने अपनी अपनी किस्मत का पूरा एक चक्कर लगा लिया है। फिल्मफेयर अवार्ड्स में फिल्म उड़ान ने आधा दर्जन से ज्यादा अवार्ड्स जीते थे और पूरी एक जमात को लगा था कि फाइनली ये पुरस्कार 80 के दशक उस दौर में आ पहुंचे हैं जब जुनून, कलयुग, स्पर्श और अर्ध सत्य जैसी फिल्में बेस्ट फिल्म का फिल्मफेयर अवार्ड पाती थीं और सरगम, काला पत्थर, एक दूजे के लिए, प्रेम रोग, बेताब, अवतार और जाने भी दो यारों जैसी फिल्में बनाने वाले बस दर्शक दीर्घा में बैठे हाथ मसलते रह जाते थे।
फिल्मफेयर की पुरस्कार समिति ने उड़ान को कुल सात पुरस्कार दिए, छह लोकप्रिय पुरस्कार और एक क्रिटिक्स पुरस्कार। एक तरह से फिल्मफेयर ने इन पुरस्कारों के जरिए अनुराग कश्यप एंड कंपनी की देव डी, गुलाल और नो स्मोकिंग जैसी फिल्मों को तवज्जो न देने के अपने दागों को धोने की कोशिश भी की थी।
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उड़ान फिल्म तो विक्रमादित्य मोटवानी की है लेकिन इस पर ठप्पा अनुराग कश्यप का इसलिए लग गया क्योंकि उन्होंने ये फिल्म प्रोड्यूस की है। 5 करोड़ रुपये में बनी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अपनी लागत निकालने जितनी कमाई भी नहीं कर पाई लेकिन इस फिल्म ने अनुराग और विक्रमादित्य दोनों की ब्रांडिंग एकदम से इंटरनेशनल कर दी।
कान फिल्म फेस्टिवल के मुख्य कंपटीशन के समानांतर वहां एक और कंपटीशन होता है, अन सरटेन रिगार्ड। इसमें हर साल दुनिया भर की 20 ऐसी फिल्में चुनी जाती हैं, जिनकी मेकिंग परंपरागत नहीं हैं और जिन्हें बनाने वाले अपनी छाप का एक अलग सिनेमा बनाना चाहते हैं। इसी में उड़ान का प्रदर्शन हुआ। कान फिल्म फेस्टिवल का नियम है कि कहीं और किसी दूसरे फेस्टिवल में दिखाई जा चुकी फिल्म कान में नहीं ली जाती तो जो भी फिल्म वहां चुनी जाती है तो एक तरह से वह उस फिल्म का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन होता है।
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उड़ान का भी प्रदर्शन ऐसे ही हुआ जिसे फिल्म का कान फिल्म फेस्टिवल में हुआ प्रीमियर बताकर हिंदुस्तान में खूब खबरें छपीं। आपको शायद यकीन नहीं होगा लेकिन 10 साल पहले अनुराग कश्यप के आगे पीछे, दाएं बाएं ऐसे पत्रकारों की फौज मौजूद रहती थी जो उनके एक इशारे पर कुछ भी लिखने को तैयार रहते थे। बिना किसी तथ्य की जांच पड़ताल किए। मैं इन्हें तब फैन ब्वॉय पत्रकार कहता था। इनके लिए अनुराग कश्यप वह कंधा थे जिस पर रखकर वह अपनी बंदूक चला सकते थे। ऐसा खूब किया भी गया। अनुराग भी अपनी तारीफें सुनकर झूमा करते थे। सेंसर बोर्ड में उनकी खास पहचान हो चुकी थी और तब वह कुछ भी पास करा लेने का दम भी अनौपचारिक बातचीत में भरा करते थे।
लेकिन, समय का चक्र घूमा। जिनकी मुखालिफत से अनुराग की अलग पहचान बनी, अनुराग ने पहला मौका मिलते ही उन्हीं के साथ बॉम्बे टॉकीज और बॉम्बे वेलवेट जैसी फिल्में और युद्ध जैसी टीवी सीरीज बना डाली। लौटकर उड़ान पर वापस आएंगे तो पाएंगे कि फिल्म उड़ान के नायक रोहन की कहानी अनुराग और विक्रमादित्य जैसी ही कहानी है। उड़ान को लोगों ने पसंद किया था इसके एक किशोर बालक की पितृसत्ता के खिलाफ बगावत के चलते। वह अपने मन का करना चाहता है, बाप उसका निर्दयी है और बच्चे का मन समझता ही नहीं है। रजत बामरेचा ने रोहन के इस किरदार में तारीफों के ढेर लगा दिए थे।
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शाहरुख खान से लेकर अमिताभ बच्चन तक सबने रजत के अभिनय की खूब तारीफ की। तब 21 के रहे रजत अब 31 के हो चुके हैं। उनके बाद फिल्मी परिवारों से आए ईशान खट्टर, विकी कौशल, सनी कौशल तक सब आगे निकल चुके हैं, उनको कोई पूछ ही नहीं रहा। वह वेब सीरीज कर रहे हैं। इंस्टाग्राम पर वीडियो डालकर अपना दर्द भी बता रहे हैं, लेकिन कहानी वही है। मरने के बाद सुशांत सिंह राजपूत को कमाल का कलाकार बताने वाले जिन लोगों ने उसे जीते जी कभी घास नहीं डाली, वे लोग रजत बामरेचा को देख मुंह घुमाकर अब भी निकल जाते हैं।
विक्रमादित्य खुद बताते हैं कि ये फिल्म उन्होंने फिल्म देवदास की मेकिंग के दौरान केन लोच की फिल्म सिक्सटीन देखने के बाद लिखी थी। फिल्म देवदास में वह संजय लीला भंसाली के असिस्टेंट हुआ करते थे। फिल्म लिखने के बाद विक्रमादित्य ने इसे अनुराग को सुनाया। अनुराग ने वादा किया कि अगर इसे कोई दूसरा नहीं बनाएगा तो वह खुद बनाएंगे। देव डी में विक्रमादित्य ने अनुराग कश्यप की राइटिंग टीम में हाथ बंटाया था, यहां अनुराग ने यही काम उड़ान के लिए किया। दोनों का साथ अनुराग की पहली फिल्म पांच के समय से है सो दोनों ने मिल बैठकर यही सोचा कि फिल्म खुद ही बनाई जाए। कांग्रेस के उन दिनों के दमदार नेता कृपा शंकर सिंह के बेटे संजय सिंह ने पैसा लगाया, अनुराग की पुरानी कंपनी यूटीवी के मालिक रॉनी स्क्रूवाला ने इसे बेचने का बीड़ा उठाया और फिल्म ने उड़ान भर ली।
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