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बाइस्कोप: 50 साल पुरानी धुनों ने ‘वीर जारा’ में दिखाया था कमाल, मदन मोहन के बेटे ने सुनाई पूरी कहानी

Thu, 12 Nov 2020 11:00 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Thu, 12 Nov 2020 11:00 AM IST
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veer zaara this day that year by pankaj shukla 12 november 2004 bioscope shahrukh khan yash chopra
वीर जारा - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

शाहरुख खान, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा स्टारर यश चोपड़ा की रोमांटिक फिल्म ‘वीर जारा’ हिंदी सिनेमा की एक ब्लॉकबस्टर फिल्म है। सरहदों से बंटे रिश्तों और एहसासों की इस खूबसूरत कहानी को दर्शकों ने हाथोंहाथ लिया। फिल्म में इसके कलाकारों के अभिनय और यश चोपड़ा के बेहतरीन निर्देशन के साथ ही इसके संगीत ने लोगों का मन मोह लिया। जी हां, ‘वीर जारा’ का संगीत बेमिसाल है। ये संगीत हिंदी सिनेमा में अपनी तरह का अनूठा प्रयोग रहा क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ कि किसी दिवंगत संगीतकार की अतीत में बनाई धुनों को उनके जाने के बाद किसी फिल्म के ओरिजनल संगीत में शामिल किया गया।



veer zaara this day that year by pankaj shukla 12 november 2004 bioscope shahrukh khan yash chopra
वीर जारा फिल्म - फोटो : यशराज फिल्म्स

स्वर्गीय मदन मोहन के इस संगीत ने फिल्म को सफल बनाने में सबसे बड़ा योगदान दिया। जो लोग यश चोपड़ा को करीब से जानते रहे हैं, उन्हें पता है कि फिल्म का ‘तेरे लिए’ गाना उन्हें इतना पसंद था कि उन्होंने इसे आखिरी सांस तक अपनी रिंगटोन बनाए रखा।

यश चोपड़ा इस फिल्म में गुजरे जमाने के संगीत का इस्तेमाल करना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने अलग-अलग संगीतकारों के साथ लंबी बैठकें भी कीं लेकिन काम नहीं बना। संयोग की बात है कि उस समय यशराज फिल्म्स में बतौर सीईओ काम कर रहे मदन मोहन के बेटे संजीव कोहली ने यश जी से जिक्र किया कि उनके स्वर्गीय पिता कुछ बिल्कुल अनछुई धुनें छोड़ गए हैं और उनकी विरासत को घरवालों ने बहुत संभाल कर रखा है। यश चोपड़ा और आदित्य चोपड़ा ने उन धुनों को सुना और तुरंत फैसला कर लिया कि ‘वीर जारा’ में उस्ताद मदन मोहन का संगीत ही इस्तेमाल किया जाएगा।

veer zaara this day that year by pankaj shukla 12 november 2004 bioscope shahrukh khan yash chopra
veer zara

अपनी पुस्तक ‘वीर जारा, द मेमॉयर्स ऑफ अ लव लीजेंड’ में संजीव कोहली लिखते हैं, “वीर-जारा मेरा सपना सच होने जैसा था, एक ऐसा सपना जिसके बारे में मैंने कभी सोचा नहीं था कि यह कभी हकीकत में बदलेगा। जब मेरे पिता संगीतकार स्वर्गीय मदन मोहन 1975 में गुजरे, तब उनकी उम्र मात्र 51 साल थी। जमाना उनको महान संगीतकार मानता था लेकिन बड़े बैनर, बड़े सितारों वाली फिल्में और लोकप्रिय अवॉर्ड उनकी झोली में कभी नहीं आए। दरअसल यह हकीकत उनके दिल में तीर की तरह चुभती रहती थी। उनके टेप सुरक्षित रख दिए गए थे हालांकि पिछले कुछ सालों से वे क्षतिग्रस्त होते जा रहे थे और तकनीकी विकास को देखते हुए वे जल्द ही बेकार हो जाते।“

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वीर जारा - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

वह आगे बताते हैं, “सन 2003 की बात है, एक दिन यश जी ने मुझसे कहा कि छह सालों के बाद उन्होंने कोई फिल्म निर्देशित करने का फैसला किया है, लेकिन यह एक ऐसी फिल्म है, जिसमें गुजरे जमाने के म्यूजिक की जरूरत पड़ेगी, एक ऐसा संगीत जो आजकल घुस आए पश्चिमी प्रभावों से पूरी तरह मुक्त हो। मेरे मुंह से सहज ही यह निकल गया कि मेरे पास गुजरे जमाने की मेलोडी वाले कुछ टेप पड़े हुए हैं, लेकिन उनको 28 सालों से मैंने नहीं सुना। इस सुझाव से वह उत्साहित नजर आए और उन्होंने काफी आश्चर्य जाहिर किया कि इससे पहले कभी मैंने इस बात का जिक्र नहीं किया था! उनके बेटे आदित्य चोपड़ा इस नई फिल्म की स्क्रिप्ट लिख रहे थे। आदि वर्तमान में जीने वाले व्यक्ति हैं और उन्हें कमर्शियल रूप से स्वीकार किए जाने वाले गानों की जरूरत थी। केवल यश जी और आदि को ही पता था कि उन्हें क्या चाहिए।“

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वीर जारा - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

चुनिंदा अनसुनी धुनें अपने कंपोज किए जाने के करीब 50 साल बाद रिकॉर्ड की गईं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था और बिलबोर्ड मैगजीन ने इसके महत्व के बारे में विस्तार से लिखा। उस वक्त सॉन्ग ऑफ द इयर बन जाने वाला ‘तेरे लिए’ गीत की धुन 1975 की फिल्म ‘मौसम’ के गाने ‘दिल ढूंढ़ता है’ की एक किनारे रख दी गई धुन पर आधारित थी। 1981 में यश चोपड़ा की ‘सिलसिला’ से बतौर गीतकार अपना डेब्यू करने वाले जावेद अख्तर ने लगभग दो दशक बाद यश चोपड़ा के साथ दोबारा काम किया। उस वक्त लता मंगेशकर की उम्र 75 वर्ष हो चुकी थी लेकिन इन गीतों को लता की आवाज मिलना ही उचित और उपयुक्त था क्योंकि मूल रूप से मदन मोहन ने ये धुनें दशकों पहले अपनी पसंदीदा गायक लता मंगेशकर के लिए ही कंपोज की थीं।

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