राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता अभिनेत्री प्रियामणि साउथ सिनेमा की उन अभिनेत्रियों में से हैं जिनकी मौजूदगी ने हिंदी फिल्मों को दक्षिण में खूब लोकप्रिय बनाया। ये सिलसिला मणि रत्नम की फिल्म ‘रावण’ से शुरू हुआ और शाहरुख खान की फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ के गाने ‘वन टू थ्री फोर’ में प्रिया मणि की मादकता ने हिंदी फिल्म दर्शकों पर जादू सा कर दिया। कैमरे के सामने अभिनय जीवन के दो दशक पूरे कर चुकी हैं प्रिया मणि। बीते साल उनकी फिल्म ‘जवान’ सुपरहिट रही और अब उनकी नई फिल्म ‘आर्टिकल 370’ भी हिट हो चुकी है। जल्द ही वह अभिनेता अजय देवगन के साथ फिल्म ‘मैदान’ में नजर आने वाली हैं। प्रियामणि से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की खास बातचीत।
Priya Mani Interview: शाहरुख को पता तो हो लोग मुझे उनकी फिल्मों का ‘लकी चार्म’ बुलाते हैं, मुस्तफा का मिलना...
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सिनेमा के बीते दो दशक परिवर्तन के दशक रहे हैं। कैमरे के सामने आपके भी दो दशक पूरे हो चुके हैं, कितना बदला है सिनेमा इस अंतराल में?
सिनेमा की तकनीक भले बदल जाए, लेकिन सिनेमा का मूल भाव जो दर्शकों के साथ दिल का रिश्ता जोड़ता है, वह कभी नहीं बदलने वाला। सिनेमा वही है जो लोगों को हंसा सके, रुला सके और जो भी वक्त दर्शक सिनेमाहाल के अंधेरे में गुजारे, उस वक्त में सिनेमा उसकी सारी तकलीफें भुला सके, यही सिनेमा का मूल मंत्र है।
और, बतौर कलाकार भी आप यही मानती हैं कि जब अभिनेता कैमरे के सामने हो तो वह बाकी दुख दर्द भूल जाए?
जी हां, बिल्कुल। और, ये बात मैंने दिग्गज अभिनेता मोहनलाल से सीखी। हम लोग काफी पहले एक फिल्म ‘ग्रैंडमास्टर’ साथ में शूट कर रहे थे और उन दिनों उनकी मां अस्पताल में भर्ती थीं। वह रात भर अस्पताल में मां के पास रुकते और दिन भर हमारे साथ शूटिंग करते। उन दिनों मैंने उनसे पूछा था कि इससे आपको तनाव नहीं होता। उनकी उस दिन कही बात मेरे लिए गुरुमंत्र बन चुकी है, उन्होंने कहा, ‘कैमरे के सामने हमें दुनिया भूलनी होती है।’
निर्देशकों में आपने भारतीराजा और बालू महेंद्र से लेकर एटली तक के साथ काम किया है। कितना बदलाव देखती हैं आप, अब शागिर्द और उस्ताद के रिश्ते में?
ये बात आपने भी महसूस की होगी कि पुराने तरीके से सीखे लोग अपनी धुन और अपने काम दोनों के पक्के हैं। मुझे फख्र है इस बात का कि मैं पुराने स्कूल की शिष्या रही हूं। अब कोई निर्देशक शूटिंग के दौरान किसी हीरोइन पर चीखने-चिल्लाने की सोचता तक नहीं है, लेकिन बीते जमाने में जब ऐसा होता भी था, तो उसमें उद्देश्य की पवित्रता शामिल होती थी। निर्देशक का सिर्फ अपना आभामंडल जमाने के लिए चिल्लाना और निर्देशक का किसी कलाकार का बेहतरीन निकालने के लिए गुस्सा करना, दोनों अलग अलग बाते हैं।
शाहरुख खान के साथ आपने ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ के बाद ‘जवान’ भी बीते साल की, कहा जाता है कि आप उनकी फिल्मों का ‘लकी चार्म’ हैं?
अच्छा, ऐसा है क्या? ये तो बहुत अच्छी बात है। उम्मीद करती हूं कि ये बात शाहरुख खान तक जरूर पहुंचे। मैं तो मानती हूं कि उनके साथ काम करना मेरा ‘लकी चार्म’ रहा है। मैंने अपना पूरा अभिनय जीवन सीखने में ही बिताया है और अब भी मैं सीख ही रही हूं। शाहरुख से मैंने साथी कलाकारों का, सेट पर काम करने वाले हर कामगार का और अपने काम का सम्मान करना सीखा है। उनसे मैंने समय का अनुशासन सीखा है और ये भी सीखा है कि अपने काम को लेकर जुनून का होना क्या है?