बीते साल दिसंबर में ही केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) का पदभार संभालने वाली भारतीय सूचना सेवा की अधिकारी स्मिता वत्स शर्मा ने इस पद की जिम्मेदारी से खुद को मुक्त कर लिया है। स्मिता वत्स शर्मा ने ये पद उस समय संभाला था, जब सेंसर बोर्ड के मुंबई दफ्तर में रिश्वत की शिकायतों के बाद तत्कालीन सीईओ रविंद्र भाकर से इस्तीफा मांग लिया गया था।
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मार्क एंटनी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
इस पूरे मामले क तार उस जांच से जुड़े हैं जिसमें बीते साल केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) के अनाम अधिकारियों और तीन अन्य लोगों के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने तमिल अभिनेता विशाल की शिकायत पर मुकदमा दर्ज किया था। विशाल ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी सोशल मीडिया पोस्ट पर टैग करते हुए तमिल फिल्म ‘मार्क एंटनी’ के हिंदी संस्करण का सेंसर सर्टिफिकेट हासिल करने में हुइ दिक्कतों का हवाला दिया था और कहा था कि इसके लिए उन्हें 6.5 लाख रुपये रिश्वत में देने पड़े।
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रवींद्र भाकर
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तत्कालीन सीईओ रवींद्र भाकर को इस घटना के बाद इस्तीफा देना पड़ा। सूचना और प्रसारण मंत्रालाय के अधीन काम करने वाले सेंसर बोर्ड के मुंबई दफ्तर को ठीक करने के लिए इसके बाद भारतीय सूचना सेवा की वरिष्ठ अधिकारी स्मिता वत्स शर्मा को सीईओ पद की जिम्मेदारी मिली। लेकिन, हालत सुधरे नहीं। सूत्र बताते हैं कि सेंसर बोर्ड के मुंबई दफ्तर का पूरा काम छह सात कर्मचारियों और अधिकारियों की एक ‘मंडली’ चलाती है और स्मिता वत्स शर्मा को दफ्तर का कामकाज तय समय में पूरा करने के लिए बनाई गई कार्यप्रणाली (एसओपी) लागू कराने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता रहा है।
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जया
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स्मिता वत्स शर्मा ने सेंसर बोर्ड के कामकाज में आ रही दिक्कतों के बारे में सूचना और प्रसारण मंत्रालय में कार्यरत संबंधित अधिकारियों को भी अवगत कराया लेकिन ‘मंडली’ के खिलाफ कोई कदम उठाने की पहल अब तक दिल्ली से हुई नहीं है। हाल के कुछ मामलों के मीडिया में आने के बाद स्मिता वत्स शर्मा ने इसे सीधे अपने कामकाज पर प्रश्नचिन्ह मानते हुए खुद ही अपने पद की जिम्मेदारी से मुक्त होने का फैसला किया है।
हाल फिलहाल के चर्चित मामलों में एक मामला फिल्म ‘जया’ के साथ हुआ जिसके निर्देशक को सेंसर बोर्ड के अधिकारियों ने पुनरीक्षण समिति के पास जाने के लिए हफ्तों तक लटकाए रखा। इन दोनों मामलों में खबरें छपते ही सेंसर बोर्ड के अधिकारियों ने तुरंत पुनरीक्षण समिति बनाकर फिल्मों की स्क्रीनिंग करा दी। लेकिन, यही काम सीईओ के कहने पर नहीं किया गया।
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पंजाब 95
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निर्देशक हनी त्रेहान की फिल्म ‘पंजाब 95’ भी इसी चक्कर में जनवरी माह से लटकी हुई है। फिल्म को सेंसर बोर्ड ने 21 कट्स और फिल्म का नाम बदलने के सुझाव के साथ पारित कर दिया था। फिल्म का नाम पहले ‘घल्लूघारा’ था, जिसे सेंसर के सुझाव पर बदलकर ‘पंजाब 95’ किया गया। सारे बदलाव करने के बाद भी फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट अभी तक नहीं मिला है। मामला अब बंबई उच्च न्यायलय तक पहुंच चुका है। निर्माता के सी बोकाडिया को भी अपनी फिल्म ‘तीसरी बेगम’ के लिए सेंसर सर्टिफिकेट हासिल करने में नाकों चने चबाने पड़े हैं।