लोकप्रिय टेलीविजन अभिनेता सिद्धांत वीर सूर्यवंशी फिर से चर्चा में हैं। वह धारावाहिक 'क्यों रिश्तों में कट्टी बट्टी' में कुलदीप चड्ढा के किरदार में इन दिनों दिख रहे हैं। असल जिंदगी में भी सिद्धांत बहुत पारिवारिक हैं और अपनी जिम्मेदारियों को भलीभांति समझते हैं। उनके मुताबिक, कोरोना वायरस की वजह से हुए लॉकडाउन का समय उनकी जिंदगी का सबसे सुखद समय रहा है। उनका मानना है कि इंसान को अपनी प्राथमिकताएं बदलते रहना चाहिए। तब ही उसकी जिंदगी सुखद बन सकती है। अमर उजाला से खास बातचीत में सिद्धांत ने सुखी जीवन के कुछ और भी सिद्धांत बताए।
Siddhaanth Vir Surryavanshi: ‘हुनर है तो हौसला जरूरी, एक न एक दिन दुनिया को फर्क नजर आ ही जाएगा’
आपका शो 'क्यों प्यार में कट्टी बट्टी' तो लॉकडाउन से पहले ही आने वाला था। क्या तब इसकी शूटिंग शुरू हुई थी?
हमारे इस धारावाहिक के ऑन एयर जाने की बातचीत लॉकडाउन से पहले ही शुरू हो गई थी और 31 मार्च को टीवी पर यह प्रसारित होने वाला था। शूटिंग भी चालू थी लेकिन कोरोना वायरस की वजह से जब लॉकडाउन हुआ तो सारे शोज रोक दिए गए। उसी तरह हमारा भी यह शो फिर रिलीज नहीं किया गया। जब लॉकडाउन खत्म हुआ तो हमने जुलाई के अंत में शो की शूटिंग फिर से शुरू की। और अब आखिरकार 14 दिसंबर को यह टीवी पर प्रसारित होने लगा।
क्या लॉकडाउन की वजह से कहानी में कोई बदलाव भी हुए?
यह कहानी शुरुआत से ही सदाबहार थी। इसे आप चाहे लॉकडाउन से पहले रिलीज करते या फिर लॉकडाउन के बाद रिलीज कर रहे हैं, कहानी वैसी की वैसी ही है। कहानी में कोई बदलाव नहीं किया गया है। लॉकडाउन से पहले एक पति पत्नी के बीच जो जिस तरह का रिश्ता था, उस तरह का ही रिश्ता लॉकडाउन के बाद भी चल रहा है। एक कलाकार के तौर पर मैं कह सकता हूं कि इस शो का विचार बहुत ही खूबसूरत है। यह ऐसा शो है जिससे लगभग हर परिवार की कहानी मेल खाती है। यह शो बच्चों के नजरिए से बनाया गया है। इसमें जो बच्चे हैं वह माता और पिता के बीच किस तरह एक कड़ी बन जाते हैं जिससे कि वह माता-पिता को एक साथ बांधे रखें और उनके रिश्ते को संवारते रहें।
आप कह रहे हैं कि लॉकडाउन से पहले और उसके बाद भी पति पत्नी के रिश्ते में कोई बदलाव नहीं आया। क्या वाकई ऐसा है?
बदलाव आया है। बहुत आया है। और मैं कहूंगा कि यह लॉकडाउन बहुत अच्छा रहा। मेरी परिस्थितियां अलग थीं और हर किसी की परिस्थितियां लग रहीं। बहुत से लोगों को इस लॉकडाउन से बहुत दिक्कतें भी झेलनी पड़ीं। लेकिन, मेरे लिए यह लॉकडाउन बहुत सुखद रहा है। मैं काम करता हूं और मेरी पत्नी भी काम करती है। हम दोनों एक दूसरे को बहुत ज्यादा वक्त नहीं दे पाते। जिंदगी की भाग दौड़ में अक्सर हम अपनी जिंदगी के मूल को भूल जाते हैं। लॉकडाउन ने हमें सिखाया है कि अपनों के साथ वक्त बिताना भी कितना जरूरी है? जब मैंने अपनी पत्नी और बच्चों के साथ वक्त बिताया तो यह मुश्किल समय भी मेरे लिए सुखद हो गया।
बच्चों के सामने माता-पिता की लड़ाइयां उन पर क्या असर डाल सकती हैं?
बच्चे तो कोरा कागज होते हैं। वह अपने आस-पास जो भी होता हुआ देखते हैं, वह उसी से सीखते हैं। उससे ज्यादा वह सीखते हैं अपने मां-बाप, अपने दोस्तों और अपने गुरुओं से। अगर उनके सामने कोई भी लड़ाई झगड़ा भी होता है तो उससे भी कुछ न कुछ सीख लेते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उनकी मां ने ऐसी बात बोली है तो शायद यह अच्छी ही होगी। हालांकि, गुस्से में ऐसा नहीं होता है कि हर बात अच्छी ही निकले। इसलिए, बच्चों के सामने हमें सब बातें बहुत सोच समझकर करनी चाहिए। कहा जाता है कि महाभारत में अभिमन्यु अपनी माता की कोख से ही शिक्षा लेकर पैदा हुए थे। उस हिसाब से देखा जाए तो बच्चा अपनी मां की कोख से ही सीखना शुरू करता है। अगर उसे माता से और पिता से अच्छी शिक्षा न मिले तो आगे चलकर दिक्कत पैदा हो सकती है।
