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EXCLUSIVE: खेमेबाजी पर ये बोले चमन बहार के ‘बिल्लू’, पढ़िए आईआईटी इंजीनियर के हीरो बनने की दास्तां

Sun, 21 Jun 2020 11:29 AM IST
shrilata biswas पंकज शुक्ल
पंकज शुक्ल Published by: shrilata biswas Updated Sun, 21 Jun 2020 11:29 AM IST
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iit kharagpur passout jitendra kumar speaks to Pankaj Shukla on journey in hindi cinema chaman bahar
जितेंद्र कुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

भारत में जब ये सोचना भी मुश्किल था कि सीधे यूट्यूब पर भी कोई सीरीज रिलीज हो सकती है तो आईआईटी पास कुछ युवाओं ने ‘परमानेंट रूममेट्स’ नाम की वेब सीरीज बना डाली। इस सीरीज के गिट्टू ने बाद में कभी अर्जुन केजरीवाल बनकर तो कभी जीतू भैया बनकर युवाओं का दिल जीत लिया। डिजिटल दुनिया के इन दिनों के हीरो नंबर वन जितेंद्र कुमार से ये एक्सक्लूसिव बातचीत की पंकज शुक्ल ने।

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जितेंद्र कुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कहते हैं कि सिनेमा में अब लोकतंत्र है। जो अभिनेता जैसा चाहे वैसे किरदार कर सकता है डिजिटल युग आने के बाद। क्या वाकई सिनेमा में खेमों की जरूरत खत्म हो गई है?

मेरे हिसाब से तो कैम्प्स की जरूरत नहीं होती लेकिन होता ये है कि कोई कैम्प अगर कोई दिलचस्प फिल्म बना रहा होता है और आपको लगता है कि आप उसके लिए बिल्कुल मुफीद हैं तो मन तो करेगा ही कि वह किरदार मुझे मिले। ओटीटी क्या है, ये भी तो अलग तरह के कैम्प्स ही हैं। ये नेटफ्लिक्स, अमेजॉन सब कैम्प हैं। हर लेखक, हर अभिनेता, हर निर्देशक कुछ न कुछ अलग करने की कोशिश करता है। तो यहां जो भी कुछ अलग करना चाहता है, वह अलग अलग समूहों का हिस्सा तो बनता ही है। इस चलन की कुछ अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयां भी हैं।

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जितेंद्र कुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपके घरवालों ने बड़ी मेहनत की आपको आईआईटी में दाखिला दिलाने में। लेकिन आपको हीरो बनना था। एक सीट खराब नहीं की आपने इंजीनियरिंग की?

नहीं, मैंने सीट खराब नहीं की। मैं उस सीट के लिए काबिल प्रतियोगी था। मैंने वह सीट हासिल की थी। हां, आईआईटी जाने के बाद मैंने पढ़ाई नहीं की ठीक से। शायद सिविल इंजीनियर बनता तो ठीक से कर नहीं पाता।

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जितेंद्र कुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

पहले कोचिंग और फिर इंजीनियरिंग। छह साल लगातार पढ़ाई के बाद ये क्रिएटिव कीड़ा कैसे जाग जाता है?

हर साल कोई छह हजार लोग आईआईटी पास करके निकलते हैं। इनमें से इक्का दुक्का ही इधर आते हैं। मेरे हिसाब से देश का जो सबसे बड़ा मध्यम आयवर्ग है, उसके बच्चों को शुरू में पता ही नहीं होता कि साहित्य या कला जैसी चीज भी है दुनिया में। 10-12 साल के होते हैं कि घर वाले डॉक्टर या इंजीनियर बनाना शुरू कर देते हैं। फिर वे आईआईटी आते हैं। यहां स्पोर्ट्स खेलते हैं। ड्रामा क्लब का हिस्सा बनते हैं तो पता चलता है कि अरे ये सब भी है दुनिया में।

और फिर, एक्टिंग में आने के बाद भी उतने ही परेशान हो जाते हैं, जितनी आईआईटी की सीट निकालने में?

क्या होता है इंजीनियरिंग की पढ़ाई बहुत मेहनत का काम होता है। बच्चे से ज्यादा उसके पीछे उसका पूरा परिवार मेहनत करता है। जब यही इंजीनियर एक्टर बनता है तो वह बेसिक प्रोसेस में चला जाता है। ज्यादा मेहनत करने लगता है। हर चीज को ज्यादा विस्तार से समझने की कोशिश करने लगता है। पहले लोग इंजीनियरिंग करके आईएएस बन जाते थे। फिर एमबीए करने लगे। अब नई चीज हुई है, आर्ट।

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जितेंद्र कुमार - फोटो : सोशल मीडिया

घर वालों का क्या रिएक्शन रहा, जब उन्हें पता चला कि जिस बेटे को इंजीनियर बनाने के लिए वह दिन रात एक करते रहे, वह तो हीरो बनने जा रहा है?

बस हाथ ही नहीं उठा उनका। मैंने कोटा में दो साल कोचिंग की 11वीं और 12वीं की। फिर आईआईटी खड़गपुर में चार साल पढ़ाई की। वहीं बिस्वपति सरकार से मुलाकात हुई जो एक साल सीनियर थे और नुक्कड़ नाटक किया करते थे। उन्होंने मुझे बताया कि पढ़ाई खत्म करने के बाद वह इंजीनियर नहीं राइटर बनने वाले हैं मुंबई जाकर। मुझसे बोले, तुम भी आ जाना एक्टिंग करने।

तो फिर कैसा रहा अनुभव जब मुंबई में पहले दिन उतरे?

मैंने मुंबई में लैंड नहीं किया। अलवर से बांद्रा टर्मिनस आया था गरीब रथ से। बांद्रा के प्लेटफॉर्म पर उतरने के बाद आधा घंटा तो मुझे इसी में लग गया कि यहां से बाहर कैसे निकलना है, कोई बताने को तैयार ही नहीं हो रहा था। गलती मुझसे ये हुई कि मुझे बोरीवली जाना था और ट्रेन वहां रुकी भी पर मैं उतरा नहीं। बोरीवली में कॉलेज के समय का एक दोस्त आईआईटी की कोचिंग चलाता है, मुझे वहीं रुकना था। मैंने तय किया था कि मैं हफ्ते में छह दिन एक्टिंग के लिए रखूंगा और एक दिन कोचिंग करूंगा। तो वहीं पहले नौकरी शुरू की और साथ में एक्टिंग।

 

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