आइकोनिक साइट के रूप में मशहूर हिसार के विश्व विरासत स्थल राखीगढ़ी में पुरातत्वविदों की टीम एक बार फिर मानव विकास की यात्रा में नया अध्याय जोड़ने जा रही है। करीब 5000 साल पहले दृषद्वती नदी के किनारे बसे व्यापारिक नगर राखीगढ़ी की पुरावशेषों को शीशे में रखकर हवा और पानी से सुरक्षित करने के साथ पर्यटकों के लिए प्रदर्शित करने की तैयारी है। इनमें तंदूर, मटके, मिट्टी के बर्तन, चूल्हे, ईटें, दीवारें, खिलौने, परिष्कृत भट्ठी आदि शामिल हैं। मौसम ठीक होते ही भारतीय पुरातत्व विभाग के डिप्टी डीजी संजय मुंजाल के निर्देशन में टीम टीले को फिर से खोदने में जुटेगी।
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जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर ऐतिहासिक स्थल राखीगढ़ी में ग्रेटर नोएडा से आई पुरातत्वविदों की टीम में शामिल डा. विजय बताते हैं कि बारिश ने भले ही अब तक खोदाई में खलल डाला हो, लेकिन मौसम ठीक होने के साथ निर्देश मिलते ही प्रोजेक्ट की रूपरेखा के मुताबिक टीम फिर से काम में जुट जाएगी। इस स्थल की चौथी बार खोदाई शुरू होने वाली है। पुरास्थल के टीला नंबर एक से मिट्टी की परतें हटाने के बाद लोगों को तंदूर समेत अन्य ऐतिहासिक वस्तुएं देखने को मिलेंगी। खुदाई में मिली वस्तुओं को सहेजने और सुरक्षित रखने के लिए पुरातत्वविदों की टीम मौका मुआयना करेगी। पुरातत्व विभाग के पास राखीगढ़ी में इस समय 90 एकड़ जमीन है और 9 टीले हैं। टीला नंबर एक के बाद बाकी टीलों की भी खोदाई होनी है। इसमें करीब चार साल का समय लगेगा।
खोदाई में मिली थी परिष्कृत भट्टी
लंबे समय उत्खनन कार्य से जुड़े रहे वजीर सिंह बताते हैं कि उस जमाने में जिस तरह से नापजोख के हिसाब से दीवारें बनाई गई थीं। उससे लगता है कि उस समय के लोग वास्तुशास्त्र के जानकार थे। नगर के चारों ओर सुरक्षा दीवार और चौकियां बनाई गई थीं। मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए परिष्कृत भट्टी भी मिली है। मटके समेत मिट्टी के बर्तन इतने मजबूत थे कि उनसे मेटल जैसी आवाज आती है।
राखीगढ़ी से मिले हैं मिट्टी के फ्रिज
ग्रामीण धर्मपाल बताते हैं कि मानव कंकाल से पता चलता है कि उस जमाने के लोग लंबे कद वाले और दिमागदार थे। बड़ा तंदूर और भोजनालय मिलने से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वे सामूहिक रूप से रहते थे। समृद्ध महिलाएं सोने के मनके की माला और मिट्टी की चूड़ियां पहना करती थीं। छेद वाले जार के जरिये प्रकाश की व्यवस्था होती थी। मिट्टी के फ्रिज भी मिले हैं। आकर्षक पेंटिंग वाले मजबूत मटके, कई तरह के मिट्टी के बर्तनों सहित कई वस्तुओं से उस जमाने की जीवन शैली का पता चलता है।
पर्यटन और रोजगार बढ़ने की उम्मीद
मौजूदा राखी खास और राखी शाहपुर गांव जो अब सामूहिक रूप से राखीगढ़ी के नाम से जाना जाता है। मुख्य स्थल और सबसे ज्यादा 5 टीले राखी खास गांव में हैं, जबकि टीला नंबर 2, 3 और 7 का कुछ हिस्सा राखी शाहपुर गांव में है। टीला नंबर दो और चार सबसे बड़े हैं। बड़े स्तर पर खोदाई हो तो मानव जीवन यात्रा की काफी अहम बातें प्रकाश में आ सकती हैं। राखीगढ़ी को विश्व के पर्यटन मानचित्र पर लाने से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है।
राखीगढ़ी को केंद्र ने लिया गोद
राखीगढ़ी को फोरलेन और रेलमार्ग से जोड़ने के लिए सरकार ने जरूरी प्रक्रिया शुरू कर दी है। राखीगढ़ी को गोद लेकर केंद्र सरकार 80 परिवारों के लिए कुछ दूरी पर अलग कॉलोनी बनाकर उन्हें शिफ्ट करने जा रही है। खोदाई से जुड़े जानकार बताते हैं कि दृषद्वती नदी में आई बाढ़ से राखीगढ़ी का पतन हो गया था। फिर भी उसी नदी के मुहाने पर संग्रहालय का निर्माण किया जा रहा है। विशेषज्ञ इस पर सवाल उठा रहे हैं।