मई महीना हिंदी सिनेमा में अमिताभ बच्चन की फिल्मों के लिए जाना जाता है। जंजीर से लेकर नसीब, त्रिशूल, डॉन, लावारिस और अमर अकबर एंथनी सब मई में ही रिलीज हुईं। इसी मई में रिलीज हुई है एक ऐसे निलंबित पुलिस अफसर हाथीराम चौधरी की कहानी, पाताल लोक, जो पूरे सिस्टम की सच्चाई का बीच चौराहे भांडा फोड़ती है। वेब सीरीज पाताल लोक के इसी इंस्पेक्टर हाथीराम यानी जयदीप अहलावत से पंकज शुक्ल ने की ये खास बातचीत।
INTERVIEW: जयदीप ऐसे बने गैंग्स ऑफ वासेपुर के शाहिद खान, पाताल लोक में की पिता की शख्सियत की ये नकल
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अमूमन 60 या 70 के दशक में पैदा हुए बच्चों को घर पर मार बहुत पड़ी है, आपके पिता आपके लिए कितने सख्त रहे?
हरियाणा के खरकड़ा गांव में मेरे माता पिता रहते हैं। सेवानिवृत शिक्षक हैं दोनों। मेरे पिताजी भी बाहरी तौर पर बहुत सख्त दिखते थे। उस वक्त का समाज ऐसा था कि पिता कभी नहीं बोलता कि बेटा बहुत अच्छा कर रहा है। हमारे पिता बेटों के साथ बहुत जल्दी खुलते नहीं हैं। बेटियों को वे फिर भी बोल देंगे लेकिन बेटों के साथ वह खुलते नहीं हैं। तो इस किरदार की तैयारी में मुझे अपने पिता की शख्सीयत का काफी फायदा मिला। मैंने इस किरदार के लिए अपने पिता दयानंद अहलावत का चलने का तरीका अपनाया है।
पाताल लोक की कामयाबी इसका असल दुनिया के काफी करीब होना है। ऐसी ही हकीकत के काफी करीब की कहानी रही लस्ट स्टोरीज में आपकी वाली कहानी। मनीषा कोइराला के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
मैं अभी 39 का हूं और फिल्म में मेरी हीरोइन मनीषा और निर्देशक दिबाकर दोनों मुझसे काफी बड़े हैं। मैं एक्टिंग सीखकर आया हूं तो मुझे तो होमवर्क करना ही होता है। लेकिन, जिस शिद्दत से मनीषा कोइराला ने इस फिल्म के लिए रिहर्सल की, वह काबिले तारीफ है। वह सीनियर एक्टर हैं, कह देतीं कि एक दिन रीडिंग कर लेते हैं फिर सीधे शूट पर मिलते हैं तो भी हो जाता। लेकिन, सात दिन के शूट के लिए जिस तरह चार दिन तक वह रिहर्सल में शामिल हुईं। उससे बहुत प्रेरणा मिलती है।
साल 2018 एक तरह से आपके करियर का टर्निंग प्वाइंट रहा। रॉ अफसर आप बने राजी में, फौजी अफसर तो आप असल जिंदगी में भी बनना चाहते ही थे?
हां, राजी मेरे लिए एक बड़ा मुकाम लेकर आई। रॉ अफसर का किरदार लोगों ने सराहा। फौज में जाने के लिए मैंने एनडीए का एक टेस्ट दिया था लेकिन पास नहीं हुआ। फिर सीडीएस का फॉर्म भरा। टेस्ट पास किया लेकिन एसएसबी में फेल हो गया। हमारे यहां बोला जाता है कि इलाहाबाद (अब प्रयागराज) रिजेक्शन सेंटर है। हमारा एसएसबी वहीं हुआ। लेकिन मेरे तमाम दोस्त अब फौज में अफसर हैं। किसी का कोई फैमिली बैकग्राउंड नहीं है। फौज में जाने के लिए बहुत कमाल का स्टूडेंट होना जरूरी नहीं है। वहां वे आपकी परवरिश और आपकी सच्चाई परखते हैं। जिस तरह वह चार दिन आपको खंगालते हैं तो आप ज्यादा झूठ बोल नहीं पाते।
जैसे यशराज फिल्म्स की सीरीज धूम की बात चलते ही लोग उसका विलेन देखते हैं, वैसा ही क्रेज आपने कमांडो सीरीज के लिए बनाया, इसका पहला विलेन बनकर। एके 74 बनने की तैयारी कैसे की?
ये एक बहुत ही कमर्शियल फिल्म थी। मेरा रोल भी बहुत बड़ा था। मैंने इसके पहले इतने विस्तार से लिखा हुआ कोई किरदार पहले नहीं देखा था। ये ऐसा किरदार था जिसकी तैयारी के लिए कहीं से कोई संदर्भ उपलब्ध नहीं था। तो यहां चुनौती ये थी मेरे सामने कि मैं खुद को कितना इस किरदार के लिए मना पाता हूं। क्या मैं परदे पर ऐसा आदमी बन सकता हूं जो लोगों को आरा मशीन से काटते समय भी जोक सुना सके? एक बार मेरा इस किरदार पर भरोसा बनने की देर थी, उसके बाद सब होता चला गया।