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इस देश के लोग होते हैं सबसे ज्यादा लेटलतीफ, समय पर पहुंचना माना जाता है असभ्यता की निशानी
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
Updated Thu, 25 Oct 2018 02:52 PM IST
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बचपन से ही हम सब को वक्त की पाबंदी का सबक सिखाया जाता है। किसी को जो टाइम दो उसे पूरा करो। काम समय पर पूरा करो। कहीं जाना-आना हो तो वक्त पर पहुंचो। कोई देर से आता-जाता है तो हम सब को खीझ होती है। ट्रेन देर हो या फ्लाइट इंतजार करने पर गुस्सा आता है पर, एक देश ऐसा भी है, जहां टाइम पर पहुंचना असभ्यता माना जाता है! आप को पार्टी में बुलाया जाए और आप वक्त पर पहुंच जाएं, तो हो सकता है कि मेजबान ही तैयार न मिले।
आदत के मुताबिक मैं दिए गए वक्त पर अपनी मेजबान के घर पर पहुंच गई। उसने हड़बड़ाते हुए दरवाजा खोला, तो, मैंने देखा कि वो बाथरोब में थी। यानी वो तो अभी नहा ही रही थी, जब मैंने उसके घर पर दस्तक दी। उसकी हालत देखकर एकबारगी तो मुझे लगा कि मैं गलत घर में पहुंच गई हूं।
रियो के लोग सबसे लेट
उसने मुझे घर के मेहमानखाने में बैठाया, जहां पर अभी भी पार्टी के लिए खरीदा गया सामान बेतरतीब पड़ा हुआ था। मेरी मेजबान ने मुझे बहलाने के लिए टीवी चला दिया। मुझे कुछ खास बनाना तो आता नहीं था इसलिए मेरा मदद का प्रस्ताव भी बेकार ही था। मुझे करीब दो घंटे, बाकी लोगों के इंतजार में गुजारने पड़े। इस दौरान मेरी मेजबान दोस्त ने ख़ुद को पार्टी के लिए तैयार करने के साथ-साथ दावत का सामान भी तैयार किया।
यूं तो पूरा का पूरा ब्राजील ही लेटलतीफ है। मगर, उनमें भी रियो के लोग सबसे ज़्यादा लेट होते हैं। दक्षिणी ब्राजील की टेक्नोलॉजिकल फेडरल यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली डॉक्टर जैक्लीन बोन डोनाडा कहती हैं कि, "किसी भी पार्टी में समय पर पहुंचना पूरे ब्राजील में बुरा माना जाता है।"
"रियो में तो खास तौर से इसे सामाजिक परंपरा के खिलाफ माना जाता है। जल्दी पहुंचना ठीक उसी तरह है जैसे आप किसी पार्टी में बिना बुलाए पहुंच जाएं। "ब्राजील के लोगों का मोटो है, 'लाइफ इज ए बीच', यानी जिंदगी एक ठहराव है। इस सोच में तब और इजाफा हो जाता है, जब आप रोजमर्रा की जिंदगी ट्रैफिक जाम से जूझते हुए बिताते हैं।
नतीजा ये कि रियो के लोग न तो ख़ुद वक्त के पाबंद होते हैं, न ही वो दूसरों का टाइम पर पहुंचना अच्छा मानते हैं इसीलिए मेजबान भी अगर लेटलतीफ है, तो उसे इसकी इजाजत है। मूल रूप से ब्रिटेन की रहने वाली फियोना रॉय अब ब्राजील में अनुवादक का काम करती हैं।
रियो के लोग सबसे लेट
उसने मुझे घर के मेहमानखाने में बैठाया, जहां पर अभी भी पार्टी के लिए खरीदा गया सामान बेतरतीब पड़ा हुआ था। मेरी मेजबान ने मुझे बहलाने के लिए टीवी चला दिया। मुझे कुछ खास बनाना तो आता नहीं था इसलिए मेरा मदद का प्रस्ताव भी बेकार ही था। मुझे करीब दो घंटे, बाकी लोगों के इंतजार में गुजारने पड़े। इस दौरान मेरी मेजबान दोस्त ने ख़ुद को पार्टी के लिए तैयार करने के साथ-साथ दावत का सामान भी तैयार किया।
यूं तो पूरा का पूरा ब्राजील ही लेटलतीफ है। मगर, उनमें भी रियो के लोग सबसे ज़्यादा लेट होते हैं। दक्षिणी ब्राजील की टेक्नोलॉजिकल फेडरल यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली डॉक्टर जैक्लीन बोन डोनाडा कहती हैं कि, "किसी भी पार्टी में समय पर पहुंचना पूरे ब्राजील में बुरा माना जाता है।"
"रियो में तो खास तौर से इसे सामाजिक परंपरा के खिलाफ माना जाता है। जल्दी पहुंचना ठीक उसी तरह है जैसे आप किसी पार्टी में बिना बुलाए पहुंच जाएं। "ब्राजील के लोगों का मोटो है, 'लाइफ इज ए बीच', यानी जिंदगी एक ठहराव है। इस सोच में तब और इजाफा हो जाता है, जब आप रोजमर्रा की जिंदगी ट्रैफिक जाम से जूझते हुए बिताते हैं।
नतीजा ये कि रियो के लोग न तो ख़ुद वक्त के पाबंद होते हैं, न ही वो दूसरों का टाइम पर पहुंचना अच्छा मानते हैं इसीलिए मेजबान भी अगर लेटलतीफ है, तो उसे इसकी इजाजत है। मूल रूप से ब्रिटेन की रहने वाली फियोना रॉय अब ब्राजील में अनुवादक का काम करती हैं।
टाइम पर पहुंचना क्या होता है
फियोना कहती हैं कि, "यहां का अनलिखा नियम ये है कि मेजबान तब तक इंतजार करते हैं जब पार्टी शुरू होने का वक्त तय होता है। इसके बाद वो नहाना शुरू करते हैं।"लेटलतीफी तो पुर्तगाली भाषा के शब्दों में भी झलकता है। वहां ज्यादा वक्त लगने या देर होने से जुड़े शब्द तो हैं लेकिन, टाइम पर पहुंचने का शब्द ही नहीं है। ऐसे में जो लोग किसी जगह वक्त से पहुंच जाते हैं, तो उन्हें 'होरा इंग्लिसिया' यानी अंग्रेजों की तरह वक्त का पाबंद कहा जाता है।
अगर आप को ब्राजील में कोई कहे कि मैं जल्द ही आ रहा हूं, तो उसकी बात पर झांसा बिल्कुल मत खाएं। रियो के लोग बस यूं ही कह रहे होते हैं को पहुंचने वाले हैं। हो सकता है उस वक्त वो घर में नहाने जा रहे हो! डॉक्टर जैक्लीन डोनाडा कहती हैं कि यूं तो पूरा ब्राजील ही लेट-लतीफ है, मगर रियो के लोग तो इस मामले में कुछ खास ही हैं। वो बताती हैं कि उनका एक बॉस कई बार ये कहता था कि वो ट्रैफिक में फंस गया है, और जल्द ही पहुंचेगा। लेकिन, उस वक्त भी उसके घर में होने की आवाज आती रहती थी।
ब्राजील के लोगों की ये लेटलतीफी कोई नई बात नहीं। पीटर फ्लेमिंग ने 1933 में ही अपनी किताब में लिखा था कि कोई जल्दबाज है, तो ब्राजील में उसका बुरा हाल हो जाएगा।
फियोना कहती हैं कि, "यहां का अनलिखा नियम ये है कि मेजबान तब तक इंतजार करते हैं जब पार्टी शुरू होने का वक्त तय होता है। इसके बाद वो नहाना शुरू करते हैं।"लेटलतीफी तो पुर्तगाली भाषा के शब्दों में भी झलकता है। वहां ज्यादा वक्त लगने या देर होने से जुड़े शब्द तो हैं लेकिन, टाइम पर पहुंचने का शब्द ही नहीं है। ऐसे में जो लोग किसी जगह वक्त से पहुंच जाते हैं, तो उन्हें 'होरा इंग्लिसिया' यानी अंग्रेजों की तरह वक्त का पाबंद कहा जाता है।
अगर आप को ब्राजील में कोई कहे कि मैं जल्द ही आ रहा हूं, तो उसकी बात पर झांसा बिल्कुल मत खाएं। रियो के लोग बस यूं ही कह रहे होते हैं को पहुंचने वाले हैं। हो सकता है उस वक्त वो घर में नहाने जा रहे हो! डॉक्टर जैक्लीन डोनाडा कहती हैं कि यूं तो पूरा ब्राजील ही लेट-लतीफ है, मगर रियो के लोग तो इस मामले में कुछ खास ही हैं। वो बताती हैं कि उनका एक बॉस कई बार ये कहता था कि वो ट्रैफिक में फंस गया है, और जल्द ही पहुंचेगा। लेकिन, उस वक्त भी उसके घर में होने की आवाज आती रहती थी।
ब्राजील के लोगों की ये लेटलतीफी कोई नई बात नहीं। पीटर फ्लेमिंग ने 1933 में ही अपनी किताब में लिखा था कि कोई जल्दबाज है, तो ब्राजील में उसका बुरा हाल हो जाएगा।
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पीटर फ्लेमिंग ने अपनी किताब में लिखा था कि, "ब्राजील में देर होना एक वातावरण है। आप उसी में रहते हैं, उससे पीछा नहीं छुड़ा सकते। इस लेटलतीफी का आप कुछ नहीं कर सकते। ब्राजील के लोगों को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उनकी एक ऐसी आदत है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। कोई और देश ऐसा दावा नहीं कर सकता।"
रियो की रहने वाली सिमोन फोंसेका मैरेक अब जर्मनी में रहती हैं। वो कहती हैं कि जर्मनी के लोगों की वक्त की पाबंदी से उन्हें परेशानी होती है। अपनी पहली ही मीटिंग में जब वो टाइम पर पहुंचीं, तो देखा कि बाकी सभी लोग मौजूद थे और मीटिंग के शुरू होने के वक्त का इंतजार कर रहे थे जैसा कि पीटर फ्लेमिंग ने अपनी किताब में लिखा कि रियो के लोगों की लेटलतीफी पर गुस्सा होना बेकार है क्योंकि इससे आप का ही नुकसान होगा, रियो की जीवनशैली ही आरामतलबी वाली है।
रियो की रहने वाली सिमोन फोंसेका मैरेक अब जर्मनी में रहती हैं। वो कहती हैं कि जर्मनी के लोगों की वक्त की पाबंदी से उन्हें परेशानी होती है। अपनी पहली ही मीटिंग में जब वो टाइम पर पहुंचीं, तो देखा कि बाकी सभी लोग मौजूद थे और मीटिंग के शुरू होने के वक्त का इंतजार कर रहे थे जैसा कि पीटर फ्लेमिंग ने अपनी किताब में लिखा कि रियो के लोगों की लेटलतीफी पर गुस्सा होना बेकार है क्योंकि इससे आप का ही नुकसान होगा, रियो की जीवनशैली ही आरामतलबी वाली है।
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फोंसेका मैरेक कहती हैं कि, "हमें लगता है कि हम इसलिए लेट होते हैं क्योंकि हम हमेशा अच्छी उम्मीदें पालते हैं। हम ये सोचते हैं कि तमाम काम कर के भी हम सही वक्त पर पहुंच सकते हैं और अगर नहीं कर पाते, तो वो भी चलता है।"
हालांकि रियो के लोग भी इस लेटलतीफी की एक सीमा रेखा तय किए हुए हैं। आप के ऊपर टाइम पर पहुंचने का दबाव नहीं होता लेकिन, इसका ये मतलब नहीं कि आप कितनी भी देर से पहुंचें। फियोना रॉय कहती हैं कि एक बार मैं एक पार्टी में इतनी देर से पहुंची कि बार बंद होने वाला था। इतनी देरी करना भी ठीक नहीं है।
फोंसेका मैरेक कहती हैं कि रियो के लोग कारोबारी मीटिंग में समय पर पहुंचने की कोशिश करते हैं लेकिन, कई बार ऐसी बैठकों में भी आधे घंटे तक की देरी को बर्दाश्त कर लिया जाता है। ब्राजील के लोगों की लेटलतीफी को मैंने भी बहुत जल्द अपना लिया था। बाद के दिनों में तो मैं इतनी अभ्यस्त हो गई थी कि कई बार तो मै ख़ुद अपनी दी हुई पार्टियों में सबसे देर से पहुंचने लगी थी। तब मेरे दोस्त मुझे चिढ़ाते थे कि ये तो पक्की ब्राजीलियन यानी 'विरोऊ ब्रासीलिएरा' बन गई है।
हालांकि रियो के लोग भी इस लेटलतीफी की एक सीमा रेखा तय किए हुए हैं। आप के ऊपर टाइम पर पहुंचने का दबाव नहीं होता लेकिन, इसका ये मतलब नहीं कि आप कितनी भी देर से पहुंचें। फियोना रॉय कहती हैं कि एक बार मैं एक पार्टी में इतनी देर से पहुंची कि बार बंद होने वाला था। इतनी देरी करना भी ठीक नहीं है।
फोंसेका मैरेक कहती हैं कि रियो के लोग कारोबारी मीटिंग में समय पर पहुंचने की कोशिश करते हैं लेकिन, कई बार ऐसी बैठकों में भी आधे घंटे तक की देरी को बर्दाश्त कर लिया जाता है। ब्राजील के लोगों की लेटलतीफी को मैंने भी बहुत जल्द अपना लिया था। बाद के दिनों में तो मैं इतनी अभ्यस्त हो गई थी कि कई बार तो मै ख़ुद अपनी दी हुई पार्टियों में सबसे देर से पहुंचने लगी थी। तब मेरे दोस्त मुझे चिढ़ाते थे कि ये तो पक्की ब्राजीलियन यानी 'विरोऊ ब्रासीलिएरा' बन गई है।